कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८६ ) बीजक कबीरदास ।
कोई न समुझत भयो वेदको अर्थ औरईमें लगाय दियो सब शब्द को सार राम
नाम न जाने सब नरकको चलेगये तामें प्रमाण ॥ “ नाम लिया सो सब
किया, वेद शास्त्रको भेद ॥ बिनानाम नरकै गये, पढ़ि पढ़ि चारौ वेद”॥ १५३॥
गरुके भेला जिव डरै, काया छी जन हार ॥
कुमति कमाई मन बसै, लागु जुवाकी लार ॥१५४॥
कबीरजी कहैं हैं कि गुरुके भेलेमें जिउ डरै है वहगुरुकी भेली कैसी है कि
काया जे हैं पांचौ शरीर तिनको छीजनकहे छोड़ायदेन वारी है सो ये संसारी
जीवनके मनमें कुमतिकी कमाई लगी है ताते जुवाकी लार मानुष शरीर में ला-
गहै न कर्म करतबन्यो तौ नरकगयो कर्म करत बन्यो तौ स्वर्गगये कर्म छूटनको
उपाय नहीं करै हैं लारसंगको कहै हैं पश्चिमकी बोली है ॥ १५४ ॥
तन संशय मन सोनहा, काल अहेरी नित्त ॥
एकै डाँग वसेरवा, कुशल पुछौ का मित्त ॥ १५५ ॥
साहब कहैं हैं संशय जो मन सोई तनमें सोनहाहै जीवन को शिकारखेलै है
औ एक यह काल अहेरी है अर्थात् जब कालमारै है तब मनकी सुरति जहां मर-
तमें जायहै तहां आत्मा जात रहै है तौनै शरीर धारण करै है सो मन सोनहा
काल अहेरी जीव सावज ये तीनों एकैडांग जो शरीर तामें बसै हैं सो हे मित्र!
तुम तौ हमारे सखाहौ भूलिकै यहडाँग जो शरीर तामें कहाँ बसेहौ चारौ शरीरन
का छोड़ि हंसशरीरमें बैठि मेरे पास आवो ॥ १५५ ॥
शाहू चोर चीन्है नहीं, अंधा मतिका हीन ॥
पारिख बिना विनाशैहै, करि विचार हो भीन॥१५६॥
हे अंधा ! हेज्ञाननयनकोहीन तैंतो शाहुरह्यो है चोरजौ है मन ताको तैं न
चीन्हें ताते तैंहूं चोर द्वैगये सो बिचार न कियो कि पारिख बिना बिनाशैहै सो पारि
खतो करु तैंतो चित्तहै औ यह मन जड़हैं तेरो वाकों साथ नहीं बनिपरै है सों
जैसे तैं अणुचित्तहै तैसे साहब विभुचित्तहैं चितचितकों साथहोइहै सो बिचारकरि
यहि मनसे भिन्नह्वै मेरे पास आउ ॥ १५६ ॥