सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 628

( ६९० ) बीजक कबीरदास ।
"झूठ जवाहरिकों बनिज, तब लगि परि है पूर ।
जबलगि मिलैं न पारखी, घने चढ़ा नहिं कूर" ॥
सो या मायाके रंगवारे मानुष परखतमें खोटही निकसै हैं ॥ १६५ ॥
हरि हीरा जन जौहरी, सबन पसारी हाट ॥
जब आवै जन जौहरी, तबही रोकी साट ॥ १६६ ॥
हरि जे हैं तेई हीरा हैं औ जन जेहैं तेई जौहरी हैं कहे जाननवारे हैं सो
सब जीव हाट लगावन लगे कहे साहब को जानन लगे ज्ञान कथनलगे गुरुवा-
लोग आपने मतमें खैंचिगये सो जब साहबके जाननवारे जनाय देनवारे साहब
जन जौहरी आये तब सबके मत खंडन करि हीराके समीप कनी जे जीव
तिनको पहुँचाय देतभये अर्थात् जीवनको या जनाय दिये कि तुम साहबके हौ
साहब में लगौ या हीरौ के साटको अर्थ है और मतनमें परे जननमरण न छूटै-
गो ये कनफुक्का संसारही को लैजायगो तामें प्रमाण॥ "कनफुक्का गुरु हदका बेहदकः
गुरु और ॥ बेहदका गुरू जो मिलै, तब पावै निज ठौर ॥ १६६ ॥
हीरा तहां न खोलिये, जहाँ कुंजरोंकी हाट ॥
सहजै गांठी बांधिकै, लगो अपनी बाट ॥ १६७ ॥
जहां कुंजरों की हाट है तहां हीरा न खोलिये काहेते कि वे भांटा खीराके
बेंचनवारे हीराको भेद कहां जानैं अर्थात् जहां आपने आपने मतमें काउ काउ करि
रहे हैं तहां साहबके ज्ञानरूपी हीरा न खोलिये साहब में मन लगायें एकान्त
बैठि रहिये यही आपने बाटमें लगे रहिये ॥ १६७ ॥
हीरा परा बजारमें, रहा छार लपटाय ॥
बहुतक मूरख चलि गये, पारिख लिया उठाय ॥१६८॥
हीरा जो है रामनाम जेहिते साहबको ज्ञान होइहै । सो बजारमें परा है कहैं
सब संसार के लोग कहैं हैं छारमें लपटाय रह्यो है । अर्थात् नानामत नाना-
ज्ञान रामनामहीते निकसे हैं, औ सब मत रामनामही ते सिद्ध होय हैं यह
राम नाम साहबको बतावै है ते कोई नहीं जानै हैं । या नहीं जानैं ते ऐसे जे