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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

( ५८८ ) बीजक कबीरदास ।
बहुत घर भये न गृहस्थीमें बन्यो न बैराग्यमें बन्यो तामें प्रमाण चौरासी
अङ्गकी साखी ॥
“ घरहु तजिनि तौ अस्थल बाँधिनि अस्थल तजिनि तौ फेरी ॥
फेरी तजिनि तौ चेला मूडिनि यहि बिधि माया घेरी ” ॥ १६० ॥
सेमर सुवना बेगि तजु, घनी बिगुर्चन पाँख ॥
ऐसा सेमर जो सेवे, हृदया नाहीं आंख ॥ १६१ ॥
हे सुवा जीव संसार रूप सेमर को तैं छोड़िदे तैं तो पक्षी है तेरे मेर पास
आवनको पक्ष है कहे तेरे स्वरूपमें मेरे पास आवनकों ज्ञान बनो है जों संसारी
है जायगो माया ब्रह्म में लगैगो तौ मेरे पास आवनेकों तेरे पखना बिगुर्चन
है जायंगे कहे धुवा ऐसो चोंथि डारेंगे नाम नाना ज्ञानमें लगाय देइँगे वाज्ञान
न रहि जायगो सो ऐसे संसाररूपी सेमरको सेवै है जाके हृदयमें आंखी नहीं हैं
मेरो ज्ञान नहीं है ॥ १६१ ॥
सेमर सुवना सेइये, दुइ ढेढीकी आश ॥
ढेढी फूटी चटाक दै, सुवना चले निराश ॥ १६२ ॥
हे सुवना ! जीव संसार सेमरकी दुइ ढेढीकी आश सेवै है सेमरकी दुइ ढेंढी
कौनि हैं एक फूलकी है एक फलकी है औ या संसारमें एक तौ संसारी सुख
है एक परलोक सुख है सो सेमरमें रसकी चाह कियो जब चोंच चहोरचो तब
ढेढी चटाकदै फूटिगई धुवा निकस्योसुवा निराश ह्वैकै चले गये रसकी प्राप्ति न
भई तैसे तैं संसारमें पर्यो जनन मरण छुटावे के वास्ते धोखा ब्रह्ममें लाग्यो
परन्तु जनन मरण न छूटयो ॥ १६२ ॥
लोग भरोसे कौनके, जग बैठि रहे अरगाय ॥
ऐसे जियरै यम लुटै, जस मेढ़ै लुटैं कसाय ॥ १६३ ॥
अरे लोगों यहि संसार में कौनके भरोसे अरगायकै कहे चुपाय कै बैठि रहें
हौ ज्ञान करिकै कि मैंहीं ब्रह्महौं अथवा या मानिकै कि मैंहीं जीवका मालिक हौं
अथवा योग करिकै कुंडलिनी के साथ प्राणको चढ़ायकै ज्योतिमें मिलायकै औ