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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 619

साखी । ( ५८१ )
कहूंसांझ होइ है कहूं सकार होइहै अर्थात् कबँहूं मरिजयहै कबँहूं उत्पत्ति
होइहै औ बाठकहावै बरेठ सो मनमायामें मिलो जो आत्मा सो बरेंठ होइगयो
बरेठमें तीनलहर होयहैं यामें त्रिगुणात्मिका माया बरिगई है सो एककैतिपुण्यकी
गैलहै जप यज्ञ दानते खैंचिकै स्वर्गको लैजायहैं औ एककैति पापकी गैलहै
कामक्रोधादिकते खैंचिकै नरकमें डारिदेईं हैं जब बरेठ टूटिजायहै तब ख्याल
गुलहैजायहै अर्थात् मुक्ति ह्वै जाय है ॥ १३६ ॥
बड़े ते गयो बड़ापनो, रोम रोम हंकार ॥
सतगुरुकी परिचय बिना, चारयो वर्ण चमार॥१३७॥
सबते बड़े को हैं साधु जे संसारको त्याग कीन्हे हैं तिनमें और दोषतों हई-
नहीं हैं काहेते कि संसारको छोडे हैं परन्तु ये चित्अचित् रूप साहबको नहीं
देखै हैं सर्वत्र ते आपने बड़ापनहीं में गये कि हमारी बराबरीको साधु कोई नहीं
है या अहङ्कार रोमरोम बेधि गयो सो सतगुरुतो पायोइ नहीं जो रामनामकों
बतायदेइ जाते साहब याकी रक्षा करें सो साहबके जाननवारे जेसाधु तिनके
बिना परिचय चारिउं वर्ण चमारके तुल्यहैं ॥ १३७ ॥
मायाकी झक जग जरै, कनक कामिनी लागि ॥
कह कबीर कस बाचिहौ, रुई लपेटी आगि ॥ १३८ ॥
झकवाको कहैं हैं कि जैसे या कहैं हैं कि भूतकी झकलगी है सो कनक
कामिनी में लगि मायाकी झकमें बैकलायकै जरै है सो श्री कबीरजी कहैं हैं कि
कनक कामिनीरूप रुई में लपटिकै बिषय आगिसेवन करौ हौ सोकैसे बाचिहौ
अर्थात् जारिही जायगो ॥ १३८ ॥
माया जग साँपिनि भई, विष लै बैठी बाट ॥
सब जग फंदे फंदिया, गया कबीरा काट ॥ १३९ ॥
संसारमें माया साँपिनिभई है सो बिषलैके संसार की जे हैं सबराहै तन
धन कर्म्म तिनमें बैठी है सो सम्पूर्ण जग वाके फंदे में फंदिगयो जोई कबीर
कहैं जीव वे राहनमें चलै है सोई काटा जाय है अथवा कबीरजी कहैं हैं कि