कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसांखी । ( ५८९ )
चुप ह्वैकै बैठि रहे सो हम पूछे हैं कि तुम कौनके भरोसे बैठि रहे साहबको
तौ जानि बोई न कियो जब उत्पत्ति भई तब ब्रह्मेते माया तुमको धरलै आई
औ पुण्यक्षीण भई तब स्वर्गादिकनते उतरि आये औ जब समाधि छूटी तब
जीव उतरि आयो पुनि जसके तस ह्वैगये औ आपनेहीं को मालिक मान्यो तौ
जब शरीर छूटयो तब यम खूब लूटयो जैसे मेढ़ाको कसाई लूटै हैं तैसे बिना
रक्षक कौन बचावै ॥ १६३ ॥
समुझि बूझि दृढ़ ह्वैरहे, बल तजि निर्बल होय ॥
कह कबीर ता संतको, पला न पकरै कोय ॥ १६४ ॥
सर्वत्र साहबकों समुझिकै औ साहब को रूपबूझिकै कि या भांतिको है
जड़वत ह्वै रहे कि जो करै है सो साहब करै है ऐसे साहब को जो जानै है
ताके बहुत सामर्थ्य ह्वै जायहै जो चाहै सो करिलेइ तौने आपने बलको छपाय
कै आपको निर्बलै मानै है कि हम कहा करै हैं जौन काम करै हैं तौन साहिबै
करै हैं वे समर्थ हैं सो श्री कबीरजी कहै हैं कि ऐसे संतको पला कोई नहीं
पकरै है कहे बाधा कोई नहीं करिसकै है सब साहिबै करै हैं तामें प्रमाण
कबीरजीके ज्ञान संबोधनकी साखी ॥
"पाप पुण्य फल दोय, सबै समर्पै समरथै ॥
निज मन शक्ति न होय,मनसा बाचा कर्मणा" ॥ १६४ ॥
हीरा वही सराहिये, सहै घननकी चोट ॥
कपट कुरंगी मानवा, परखत निकसा खोट ॥१६५॥
हीरा जो है साहबका ज्ञान सोई सराहा जायहै जो घन चोट सहै कहै
नानामत करिकैकोई बादीखंडन न करिसकै औमानुष जे कपटकुरंगी कहे
हरिणी ह्वै रहे हैं अर्थात् चंचल ह्वै रहे हैं सो जब घनकी चोंटलगी कहे गुरु-
वालोग आपनोमत समुझायो तब हृदय फूटिगयो साहबको ज्ञान तो जानो न
रहै तामेंप्रमाण कबीरपरिचयकी साखी ॥