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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

रकैरहै औ बहै साउज जो है जीव सो शरीरनको पायके आधिदैविक आधिभौतिक
आध्यात्मिक जे तीनों तापहैं तेई घाम हैं तिनहींमें जरै है सो हे पण्डित तुम
बिचारकरिकै असारको त्यागकरायकै सार जे साहब श्रीरामचन्द्रहैं तिनकोबता
ओ तौ तीनों तापते जीव छूटै ॥ १९१ ॥
पायँन पुहुमी नापते, दरिया करते फाल ॥
हाथन परबत तौलते, तेहि धरि खायो काल॥ १९२॥
जे हाथनते पर्वत तौलते रहे औ पायँनते पुहुमी नापते रहे औ समुद्रको
एकफाल करते रहे हिरण्याक्षादिक तिनहूँको काल धरि खायो ॥ १९२ ॥
नव मन दूध बटोरिकै, टिपका किया विनाश ॥
दूध फाटि कांजी हुआ, भया घीव का नाश ॥१९३॥
नवमन कहे नवीन नवीन जामें होते आये मन ऐसो कै तौ देह धरे अब
यहदूध मनुष्यशरीर पायो सो कांजीका टिपका जो धोखाब्रह्ममें लागिवो तोव
दूध जो मनुष्य शरीर सो कांजी भया कहे पशुतुल्य भया घीवजो साहबकोज्ञान
रहै ताको नाशहै गयो ।
अथवा—ऊपरकी साखीमें बड़ेबड़े पराक्रमीको कालखाइ जाइ है ते कहि
आये हैं। अब या साखीमें कहैं हैं हे दूध जीव ! तैं या शरीरको अभिमान
करिके कहा नाना विषयन कहे मतनमें लागि गये । सो हे दूधजीव ! तैं
कहा नौ मनको बटोरचो, अर्थात् नौ कहिय नवीन मन कहिये जनकी मानी हुई
मनते तैं नाना प्रकारके नवीन मतनको गुरुवनते सुनिके वाहीमें लगिके मन
जो है कांजीकाटिपका (बिन्दु) ताको आश्रय कर्योपर वही मुझको मारि
डारचो अपने में मिलायलियो तूहू मनमें मिलिके मन ह्वै गयो । ताते जौने
मनमें साहबको मिलनकी शक्ति होती घीवसो नाश ह्वै गई। सो आगे तैं शुद्धरहै
स्वच्छ रहे तेरो संग कियो सब जीव सुधरि जाते रहे हैं अर्थात् शुद्धरूप
आपनो जानिके जीव साहबको होते रहे हैं सो तोको गुरुवालोग नाना मतनमें
लगायके कांजी (पानी) बनाई डारयो । अथवा जो छाछको घास खेतनमें
डारिदेई तौ घास जरि जाइ है तैसे तेरो संगकरिके जीव जरि जाइहै कहे

( ६०० ) बीजक कबीरदास ।
साहबको ज्ञान त रहित है जाइहै। सोतैं ऐसों बिगरि गयो है कि जो अब
दूध भयों चाहै तो आपने किये ते कौने हू भांति न होइ सकै है फिर जो होन
चाहै तो होइ कैसे ताको या युक्ति है कि, जाको वा छाछ है ताहीको पियाई
देइ तौ फिर वा दूध बनि जाइ है। तैसे जौने साहबको तू है तिनको जो रूप
गुरु बताइ देइ और तैं ओई साहब श्रीरामचन्द्रमें लगि जाई तौ पुनि तैं शुद्ध
जीव है जाइ ॥ १९३ ॥
केत्यो मनावैं पायँ परि, केत्यो मनावैं रोइं ॥
हिन्दू पूजैं देवता, तुरुक न काहुक होइ ॥ ३९४ ॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि केतन्यो हिन्दू ते देवतनके पायँ परि मनावै हैं कि
हमारी मुक्ति ह्वैजाय औ नाना देवतनको पूजते हैं औ केतन्यो जे मुस्लमान
तिनको हाल आवती है औ साहब के इश्कमें रोवते हैं औ मानते हैं कि साहब
बेचून बेचिगून बेसुवा बेनिमून निराकारहैं सो जे देवतनको मनावतेहौ पायँ
परिकै तिनहीं की मुक्ति नहीं भई तिहारी मुक्ति कैसे होयगी देवता तो सब
सगुणहैं विष्णु सतोगुण के ब्रह्मा रजोगुणके रुद्र तमोगुणके अभिमानी हैं
मुक्त नहीं भये तौ तुमको कैसे मुक्त करेंगे सो जौन तीनों देवतनको अधिकार
दिये हैं सबको मालिक श्रीरामचंद्र तिनको भजनकरु तब मुक्ति पावैगो तहां
प्रमाण गोसाईंजीको॥"हरिहि हरिता विधिहिं विधिता शिवहि शिवता जिन दयो।
सो जानकी पति मधुर मूरति मोदमय मंगल भयो"॥ और मुस्लमानौ ! तुम
निराकार तौ मानौ हौ इश्क काकेपर करौ हौ सो जो साहबको रूप न मानौगे
तौ इश्क तुम्हारा झूठा ठहरि जायगा ताते बिचारौ तौ साहब रूप न होता तौ
मूसा पैगम्बर को छिगुनी कैसे देखावता ताते उसके रूपहैं परंतु मायाकृत
पाञ्चभौतिक नहीं हैं दिव्य रूपहैं याते निराकारकहैं हैं सगुण निर्गुणके परे जो
साहब श्रीरामचंद्र ताको बन्दाहोउ आपनेको जो मालिक मानौगे तौ बड़ी मार
सहौगे तामें प्रमाण ॥ “स्वामी तो कोई नहीं स्वामी सिरजन हार ॥ स्वामी
द्वै जो बैठिहैं घनी परैगी मार” ॥१॥ औ साहब निर्गुण सगुणके परे हैं तामें
प्रमाण ॥ सगुणकी सेवाकरौ निर्गुणका करुज्ञान ॥ निर्गुण सगुणके परे तहँ
हमारा जान ॥ १९४ ॥

साखी। (६०१)
मानुष तेरा गुण बड़ा, मास न आवै काज ॥
हाड़ न होते आभरण; त्वचा न बाजन बाज ॥१९५॥
: हे मानुष! जो तैं देहको अभिमान करै है सो नाहक करै है यह देह तेरी
कौने कामकी है तेरो मांस काम नहीं आवै कोई नहीं खायहै हाड़नके आभरण
नहीं होते हैं त्वचाके बाजन नहीं बाजते हैं सो तेरे एकगुण है या देहते साहब
मिलते हैं सो मिलिबे की यतन करु ॥ १९५ ॥
जौलंगि ढोला तवलगि बोला, तौलंगि धनव्यवहार ॥
ढोलाफूटाधनगया, कोई न झांकै द्वार ॥ १९६ ॥
सबकी उतपति धरणिमें, सब जीवन प्रतिपाल ॥
धरती न जानै आपगुण, ऐसा गुरुदयाल ॥ १९७॥
एकको अर्थ प्रकटै हैं एकको कहैं हैं दुःखसुख नीकनागा सबकी उत्पत्ति
धरतीहीते है कहे शरीरहीते है जौने ज्ञानते सब जीवनको प्रतिपाल है ऐसें
ज्ञानको तू जान अपने गुणको धरती जो शरीर ताको न मानु ते पांचो शरीर
दै बाहिरे हैं ऐसे गुरु दयालुहैं साहब छुड़ावन वारे ताको जानु तैं अंशहै साहब
अंशी हैं ॥ १९६ ॥ १९७ ॥
धरती जानतआपगुण, तौ कधी न होतअडोल ॥
तिलतिलहोतोगारुवा, ह्वैरहत ठिकौकीमोल ॥१९८॥
धरती जो शरीर ताके धरैया जो जीव धरती सो आपनो गुण नहीं जानत
कि मोमें साहबकी प्राप्ति होयबो यही गुणह उत्पत्ति जो करौहै सो साहबकी
शक्तिते मेरीशक्ति नहीं है तौ कधी डोल न होतो अर्थात मनादिकनको उत्पत्ति
करि संसारी न होतो शुद्धै बनो रहतो धरती जीव आपनो गुण कहा जानै जो
आपनोगुण साहबको प्राप्त होइबो जानतै । ता तिल तिलमें गरुई होतजातो कहै
तिलतिल वह ज्ञान बढ़तौ औ ठीक जो है शुद्ध साहबके जनैया जीवात्मा ताकें
मोल है जातो कहै यहै अमर है जातो जे साहबसों मेल किये रहै हैं शरीरहू

, धरती हतो न नीर ।
उतपति परलय नाहती, तबकी कही कबीर ॥"
The commentary literally paraphrases:
"कबीरजी कहै हैं कि जब येसबै नहीं भये तबकी कहै हैं ॥"
"येसबै" means "all these" (referring to the five things mentioned in the doha)!
It is 100% "येसबै"! The type for 'स' was just slightly worn/ink-blotted.
Wait, let's look at whether it's "येसबै" or "येहसबै".
There is definitely no 'ह' before 'स'. It's just "येसबै"!

Wait, let's check line 22:
"जौलौं सूर्य नहीं उगै हैं तौ लगि तारा जग मगायहैं ऐसे जौलौं साहबक"
Wait, is it "साहबक" or "साहबको"?
Look at the end of line 22:
"साहबक" - wait, is there an 'ो' matra?
No, the line ends right at the margin with 'क'!
Wait, is there an 'ो' matra at the beginning of line 23?
Line 23 starts with: "पूरो ज्ञान नहीं होयहै"!
Wait! Could it be "साहबको" where the 'ो' matra was omitted by the typesetter, or "साहबका"?

साखी। ( ६०३ )
नाम न जाने ग्रामको, भूला मारग जाय ॥
काल गड़ेगा कांटवा, अगमन कस न खोराय ॥२०२॥
अरे साहबके तो नगरको नामही नहीं जाने है और मतन मारगमें काहे भूला
जायहै यह काल रूप कांटा तेरें गड़ेगा काल तोकों मारि डारैगा तेहिते अगमन
कहे आगे वह खोरिकहे राहमें आवै जेहिते कालते बचिजाय ॥ २०२ ॥
संगति की जै साधुकी, हरै और की व्याधि ॥
ओछी संगति क्रूरकी, आठौ पहर उपाधि ॥ २०३ ॥
जो साधुकी संगति करिये जे साहबकों जनाय देनवारे हैं तौ साहबको
जानिकै औरकी ब्याधि हरै औजो क्रूर जे असाधु तिन की संगति करै तौ
आठौ पहर उपाधिही लगी रहै है ॥ २०३ ॥
जैसी लागी औरकौ, तैसी निबहै थोरि ॥
कौड़ी कौड़ी जोरिकै, पूज्यो लक्ष करोरी ॥ २०४ ॥
और ते जो थोरहूथोर साहबमें लगे भक्ति करै औ तैसे छोरलों निबहिजा
यहै तो जो थोरऊ थोर साहबमें लगे औ साहबकी भक्तिकैरै तौ जैसे कौड़ी
कौड़ी जोरे केतो करोरि है जायहै ऐसे वाकी भक्ति हू हैजायहै अनेक जन्मकी
संसिद्धिते मुक्तहै जायहै ॥ २०४ ॥
आजु काल्हि दिन एकमें, अस्थिर नहीं शरीर ॥
केते दिनों राखिहौ, काचे बासन नीर ॥ २०५ ॥
आजु काल्हि यहि कलिकालमें एको दिनमें शरीर स्थिर नहीं है केतनीबेरधौं
शरीर छूटिजाय आगे तो प्रमाण रह्यो है कि येती आयुर्दाय मनुष्यकी है
अबतो कछू प्रमाणै नहीं है केती बेर शरीर छूटिजाय तेहिते साहब को भजन
करो कच्चे बासन शरीरमें केते दिन नीर राखौगे ॥ २०५ ॥
करु बहियां बल अपनी, छाडुबिरानी आस ॥
जाके आंगन नदी बहै, सो कस मरै पिआस ॥२०६॥

( ६०४ ) बीजक कबीरदास ।
अरै और औरै मतनमें जो लगेहै तिनमें न लागु बिरानी आशा छोड़िदें
तैं काहूके छुड़ायें न छूटैगो अपनी बहियांको बल करु तेरे उद्धार करिबेकों
तेरी बंहियां श्रीरामचन्द्रहैं सो आगे कहिआये हैं कि मोटे की बाँहले औ जाकें
आँगन में नदिया है सो का पिआसन मरै है तेरा तो साहब ऐसो रक्षकबनोहै तैं
काहे साहब को भूलि औरै औरे मतनमें लगे है ॥ २०६ ॥
बहु बन्धनते बाँधिया, एक बिचारा जीव ॥
का बल छूटै आपने, जो न छुड़ावै पीव ॥ २०७ ॥
कबीरजी कहै हैं कि ये बिचारे जीव तें बहुत बंधन ते बंध्यो है बहुत
गरीबहैं सो जो तैं आपने बिचारते छूटा चाहै तौ तैं न छूटैगो बिना श्रीराम-
चन्द्रके छोड़ाये वोई तेरे पीउ हैं उनकी या प्रतिज्ञा है कि जो एकहू बार
मोको जीव गोहरावै तौ मैं वाको छुड़ाय लेवहौं ताते तैं साहबकी शरण जाय
जाते संसार ते छूटि जाय जे साहबकी शरण जाय हैं ते कालहूके माथ पै लात
दै चले जाय हैं तामें प्रमाण श्रीकबीरजीको ॥
कालके माथे पग धरी; सतगुरुके उपदेश ।
साहब अङ्क पसारिकै, लैगे अपने देश ॥ १ ॥
गगन मँडल दृग महलमें, द्वे घाटीके ईश ।
नाम लेत हंसा चले, काल नबावै शीश ॥ २ ॥
औ जे राम नाम नहीं लेइ हैं ते नहीं मुक्त होय हैं तामें प्रमाण ।
यहि औतार चेतो नहीं, पशु ज्यों पाली देह ।
रामनाम जान्यो नहीं, अन्त परा मुख खेह ॥ २०७ ॥
जिवमति मारहु बापुरा, सबका एकै प्राण ॥
हत्या कबहुँ न छूटि है, कोटि न सुनै पुराण ॥२०८॥
जीव घात ना कीजिये, बहुरिलेत वह कान ॥
तीरथ गये न बाचिहौ, कोटि हिरादे दान ॥ २०९॥

साखी । (६०५)
तीरथ गये सो तीन जन, चितचंचल मन चौर ॥
एकौ पाप न काटिया, लादे दशमन और ॥२१०॥
इनके अर्थ स्पष्टई हैं ॥ २०८ । २०९ । २१० ॥
तीरथ गये ते वहि मुये, जूड़े पानी न्हाय ॥
कह कबीर संतौ सुनौ, राक्षस है पछिताय ॥ २११ ॥
तीर्थ में जे जायं हैं ते तीर्थके जूड़े पानी में नहायकै बहि मुये कहे खराबह्वै
मुये काहे ते कि जौन तीर्थजाबे नहाबेकी विधि है सो एकौ न किये काहूकों
धक्का मार्यो काहूपै कोप कियो सो कबीरजी कहै हैं कि हे सन्तौ सुनौ ते
नर राँक्षक होइकै पछिताय हैं कि हम सों न बनी ॥ २११ ॥
तीरथ भै बिष बेलरी, रही युगन युग छाय ॥
कबिर न मूल निकन्दिया, कौन हलाहल खाय ॥२१२॥
तीरथ कहे तीन हैं रथ जाके सतरजतम ऐसी जो त्रिगुणात्मिका माया सो
विष बेलरीभै चारिउयुगमें छाय रही है कबिरन मूलनिकन्दिया कहे मूल जों
रामनाम है ताको कबीरा जे जीव हैं ते निकन्दिया कहे न ग्रहण करते भयें
जो कोई कहबौकियो ताहूको खण्डि डारत भये सो या नाना कुमति रूप
हलाहल खाय जीव क्यों न नरकै जाय जाबेही चाहै ॥ २१२ ॥
हे गुणवन्ती बेलरी, तव गुण वरणि न जाय ॥
जर काटेते हरि अरी, सींचेते कुंभिलाय ॥२१३॥
हे गुणवंती बेलरी माया बाणी तेरो गुण बरणि नहीं जाय है कहांलौं वर्णन
करें जब तेरी जर काटन चलैं हैं तीर्थ करिकै अहंब्रह्मास्मि कैकै तौ अधिक
हरिअरी होय है महीं ब्रह्महौं या अभिमान बढ़्यो अधिक हरि अरी भई
तामें प्रमाण ॥ “ कुशलाब्रह्मवार्तायां वृत्तिहीनाः सुरागिणः ॥ तेपि यान्तित-
मौनूंनं पुनरायान्तियान्ति च ” ॥ २१३ ॥

( ६०६ ) बीजक कबीरदास ।
बेलि कुठंगी फलबुरो, फुलवा कुबुधि वसाय ॥
मूल विनाशी तूमरी, सरोपात करुआय ॥२१४॥
यह मायारूपी जो बेलि है सो कुठंगी है काहेते कि याको दुःख रूपी फल
बुरो है औ कुबुधि जो है सोई फूलहैं वाकी नाना वासना जें हैं सोई बास बसायहै
सो यह मूल विनाशीहै अर्थात् मिथ्याहै याको मूल नहीं है आपहीते उत्पत्ति
भई है औ जेते भर मायिक पदार्थ हैं ते पातहैं तिनमें सबमें करुआई है अर्थात्
साँचे सुख नहीं हैं ॥ २१४ ॥
पानीते अति पातला, धूवाँते अति झीन ॥
पवनहुँते अति उतला, दोस्त कबीरा कीन ॥२१५॥
पानिहुँते पातर धूमाँ ते झीन औ पवनौते चंचल ऐसो जो क्षुद्रमन ताको
कबीराजे जीव ते दोस्त किये हैं सो चौरासी लक्षयोनिमें डारदियो ॥२१५॥
सतगुरुबचनसुनौहोसन्तौ, मतिलीजैशिरभार ॥
होहजूर ठाढ़ारकहौं, अबतें समर संभार ॥ २१६ ॥
साहब कहैं हैं सतगुरु जो कबीर तिनको वचन सुनिकै हे संतौ आपनेमें
मनको भारामति लेहु तुमसों समर ह्वै रह्यो है सो मनको जीति लेहु मैं हजूरमें
ठाढ़कहौं हौं अर्थात् दूरि नहींहौं जो तुम मनको जीतौ तौ मैं अपनायलेहुं २१६
ये करुआई बेलरी, औ करुवा फलतोर ॥
सिंधुनाम जब पाइये, बेलबिछोहा होर ॥ २१७ ॥
हे कल्पणारूप बेलि! तेरा फल बहुतकडुवाहै जो कल्पना करै है सो नरकही को
जायहै सो तब सिंधुनाम पावैगो जौने जगतमुख अर्थवेद शास्त्रमाया ब्रह्मजीव
सब जगत्भरोहै तौनेको जब पावैगो तब साहबमुख अर्थ जानिकै साहब रत्नको
पावैगो तब कल्पना बेलि को बिछोह ह्वै जायगो ॥ २१७ ॥
परदे पानी ढारिया, संतौ करहु विचार ॥
शरमी शरमा पचि मुआ, काल घसीटन हार॥२१८॥

गुरुमुख ॥ परदेते पानी ढरियाकहे गुरुवालोग नये मंत्र बनायकै परदे
परदे उपदेशकियो औ सिखापनदियो कि काहूसों कहियो नहीं सब वेदशास्त्र
झूठे हैं जीवात्मै सत्य है ताही मानो या समुझायदियो सो वही धरे धरे जीव नर
कको गये जो साँचो राम नामहै ताको न जान्यो वही गुरुवनको बताओ मंत्र
ताहीके भरोसे सब पूजापाठ धर्मकर्म सब छांडिदियो कहैहै हमनिष्कर्म हैं और
यहबात नहीं जानैं है कि भगवान् पूजादिक ये कर्मनमें नहीं हैं तामें प्रमाण
श्रीकबीरजीको॥ “और कर्म सब कर्म हैं भक्ति कर्म निष्कर्म। कहैं कबीर पुकारिकै
भक्तिकरौ तजि भर्म”॥ सो देखो तो भाजीके लियेतौ बाजारमें मूड़फोरै हैं भगवा-
नकीभक्ति कारिबेको कहैहैं हम निष्कर्म हैं पिसानकै चौकडारि मालपुवा धरिकै
चौकाकरैं हैं आरतीकरैं हैं औ भगवान्की आरती करिबेको कहै हैं हमहीं मालिक
हैं हमारी आरती सब जने करतेजाउ सो हे सन्तो! विचारते तौ जाउ यह अपने
शरमा शरमीमें पचिमुवाहै या कहैहै कि हम गुरुवन को उपदेश न छांड़ेंगे या नहीं
जानै हैं कि या शरम में हमको औ हमारे गुरुवौ को यम घसीटिडारेंगे नरकमें
डारि देयहैं तब मालिक है कै न बचौगे तब कौन रक्षा करैगो साहबको तो जनबै
न कियो । जिन साहबको जान्यो है हनुमान् अंगद कबीरतैं अबलौं बने है तेहि
ते साहबको भजन करो जेहिते कालते बचिजाउ नहीं तो शरमा शरमीमें नर-
कमें पचिमरौगे । औ तुम भगवान्को नहीं मानौहौ भगवान्के पाछे नहीं चलौ
हौ सो ब्रह्म राक्षस होइगो तामें प्रमाण ॥ “नानुव्रजति यो मोहाद्व्रजन्तं जगदी-
श्वरम् । ज्ञानाग्निदग्धकर्मापि स भवेद् ब्रह्मराक्षसः” ॥ इति पुरुषोत्तम माहा-
त्म्ये॥औ सब झूठा है साहबको भजन साँचा है तामें प्रमाणकबीरजीको॥
“ कञ्चन केवल हरि भजन, दूजी कथा कथीर ।
झूठा आल जंजाल तजि, पकरो साँच कबीर ॥ १ ॥
जो रक्षक है जीवको, नाहिं करो पहिंचान ।
रक्षकके चीन्हे बिना, अंत होइगी हान” ॥ २ ॥
तेहिते तुम साहबको भजनकरो जाते साहब के लोकैजाउ जहां कालकी
गम्यनहीं है तांमें प्रमाण ॥

( ६०८ ) बीजक कबीरदास ।
" जहां कालकी गमि नहीं, मुआन सुनिये कोई ।
जो कोइ गमि ताको करै, अजर अमर सो होइ " ॥ १ ॥
साहबते बिमुख करनवाले गुरुवालोग यम दूतहैं तामेंप्रमाण ॥"॥ नानारू-
पधरा दूता जीवानांज्ञानहारकाः ॥ कालाज्ञांसमनुप्राप्य विचरन्तिमहीतले "॥२॥
औ कबीरजी चौकामेंरघुनाथजीकी पूजा षोड़शही प्रकारकी लिख्यो है तामें
प्रमाण ॥
चौकाविधानका शब्द ।
अगर चंदन घसि चौक पुरावा सत सुकृत मन भावा ॥
भर झारी चरणामृत कीन्हा हंसनको बरतावा ।
पूरन मौज और रखवारा सतगुरु शब्द लखावा ॥
लौंग लायची नारियल आरति धोती कलश लसावा ।
श्वेत सिंहासन अगम अपारा सो अति बर ठहराया ॥
छांड़े लोक अमृतकी काया जगमें जोलह कहाया ।
चौरासीकी बंदि छोड़ाया निर अक्षर बतलाया ॥
साधु सबै मिलि आरति गावैं सुकृत भोग लगाया ।
कहै कबीर शब्द टकसारा यमसों जीव छुड़ाया ॥ १ ॥
पूरण मासी आदि जों मङ्गल गाइये ।
सतगुरुके पद परशि परम पद पाइये ।
प्रथमै मँदिर झराय कै चँदन लिपाइये ॥
नूतन बस्त्र अनेक चँदोवा तनाइये ।
तब पूरण गुरु के हेतु तौ आसन बिछाइये ॥
गुरुके चरण परछालि तहाँ बैठाइये ।
गज मोतिनकी चौक सु तहां पुराइये ॥
तापर नारियल धोती मिष्ठान्न धराइये ।
केला और कपूर तौ बहु बिधि ल्याइये ॥
अष्ट सुगंध सुपारी लो पान मँगाइये ।
पलौ सहित सो कलश सँवारिकै ज्योति बराइये ॥

साखी । (६०९)
ताल मृदङ्ग बजाइकै मङ्गल गाइये ।
साधु सङ्ग लै आरति तबहिं उतारिये ॥
आरति करि पुनि नारियल तबहिं मोराइये ।
पुरुषको भोग लगाइ सखा मिलि खाइये ॥
युग युग क्षुधा बुझाइ तौ पाइ अघाइयें ।
परम अनंदित होइ तौ गुरुहि मनाइये ॥
कहै कबीर सत भाय सो लोक सिधाइये ।
इहां पूजा के मंत्र नहीं लिख्यो सो पुरुष सूक्तनके मंत्र हैं ताते नहीं लिख्यो है॥
“दशौ दिशा कर मेटौ धोखा। सो कड़हार बैठही चोखा।
दशौ दिशा कर लेखा जानै। सो कड़हार आरती ठानै॥
दशइंद्रीकै पारिख पावै। सो कड़हार आरती गावै।
जो नहिं जानै एतिक साजै। चौका युक्ति करै क्यहि काजै॥
हिंस कारण करहिं गुरुआई। बिगरै ज्ञान जो पंथ पराई।
पद साखी अरु ग्रंथ दृढ़ावै। बिन परखन उत्तम घर पावै॥
शब्द साखीसिखिपारस करहीं। होय भूत पुनि नरकहि परहीं।
विना भेद कड़हार कहावै। आगिल जन्म श्वानको पावै॥
पद साखी नहिं करहि बिचारा। भूंकि रजस मरै सियारा।
पद साखी है भेद हमारा। जो बूझै सो उतरहि पारा॥
जबलग पूरा गुरू न पावै। तब लग भवजल फिरिफिरि आवै।
पूरा गुरु जो होय लखावै। शब्द निरखि परगट दिखलावै॥
एक बार जिय परचौ पावै। भव जल तरै बार नहिं लावै।
साखी-शब्द भेद जो जानहीं, सो पूरा कड़हार ॥
कह कबीर धूमक्ष है, सोहं शब्दहि पार ॥ २१८ ॥
आस्ति कहो तो कोइ न पतीजै, बिना आंस्ति को सिद्ध॥
कहै कबीर सुनो हो सन्तो, हीरै हीरा विद्ध ॥ २१९ ॥
३९

( ६१० ) बीजक कबीरदास ।
कबीरजी कहै हैं कि आस्तिकमत जो मैं सबको बताऊं हौं तो कोई नहीं पति
आयहैं काहेते कि गुरुवा लोगनकी बाणी मानि उनको सिद्धजानै हैं या नहीं
जानै हैं कि ये आस्तिकनहीं हैं साहब को नहीं जानै हैं इनते संसार न छूटैगौ
साहबके जाननवारे जे सांचे साधु हैं तिन्हीं ते संसार छूटै है काहेते हीरा ही
रैते बेधि जाय है ॥ २१९ ॥
सोना सज्जन साधु जन, टूटि जुरै सौ बार ॥
दुर्ज्जन कुम्भ कुम्हारके, एकै धका दरार ॥ २२० ॥
सज्जन साधुजन जे हैं ते सोना है जो सैकरनवार टूटै फिरि फिरि जुरिजायहै
औ दुर्जन जे हैं कुम्हारके कुम्भ कहे घड़ा जो फूटा तो फिरि नहीं जुरै है अर्थात्
जो साधुजन कहूं मांगमें भूलिहू जायँ परंतु फिरि समझाये वाहीमें लगिजायहैं
खोटी राह छांड़ि देइ हैं औ दुर्जन जे हैं ते घड़ासे फूटिजायहैं अर्थात् जौने
कुसंगमें परे तौनेहीके भये फिरि नहीं बूझै हैं ॥ २२० ॥
काजर केरी कोठरी, बूडन्ता संसार ॥
बलिहारी तेहि पुरुषकी, पैठिकै निकसन हार ॥२२१॥
यह काजरकै कोठरी मायाहै तौने में यह संसार बूड़िगयो सो वह जीवकी
बलिहारी है जो मायामें आय निकसि जाय ॥ २२१ ॥
काजरही की कोठरी, काजरहीका कोट ॥
तौभी कारा ना भया, रहाजो ओटहि ओट ॥ २२२ ॥
गुरुमुख ।
साहबकहै हैं कि यह माया काया काजरकी कोठरी है याके काजरहीके कोट
बने हैं नाना आशा नानामत माने हैं सो यद्यपि ऐसेहू रह्यो परंतु मोको रक्षक
माने रह्यो मेरी भक्तिकी ओट ही ओट बचि गयो अर्थात् मायाते बचिगयों२२२
अर्बखर्ब लौं दर्व है, उदय अस्तलौं राज ॥
भक्ति महातम ना तुलै, ये सब कौने काज ॥ २२३ ॥

साखी । ( ६११ )
अर्बखर्बलौं द्रव्यभई अथवा अर्बखर्बलौं विद्याको पढजाता भयों साखी शब्द
चौपाई दोहा कंठ भये सब शास्त्र कंठभये औ उदय अस्तलौं राज्यभयो बड़ों
बादशाह भयो सबको अपने बश कैलियों अथवा महंत भयो पंडित भयों
सबको उदय अस्तलौं चेला करिलियो औ शास्त्रार्थ करिकै जीतिलियो औ मन
न जीत्यो तौ कहा कियो भक्तिके माहात्म्यको नहीं तुलैहै ॥ २२३ ॥
मच्छ बिकाने सब चले, ढीमरके दरबार ॥
रतनारी अँखियांतरी, तूं क्यों पहिराजार ॥ २२४ ॥
मनमें लगिकै सबजीव मच्छमायाको अनुभव ब्रह्म है ताहीके हाथ जीव
बिकाय गये औ ढीमरके दरबार सब चले जायहैं अर्थात् काल मनरूपी जालमें
सबको फँदायलेइहै ताहीके दरबार सब चलेजायाँहैं अर्थात् मायाके मारिबेकों
सब उपायकरै हैं कि माया को नाशकैकै ब्रह्महैजायँ मनरूपी जालमें फन्दे
मछरी जो मायाको अनुभव ब्रह्म ताही के साथ बिकाय गये अर्थात् वही में
लीनभये ताहूपै कालते न बचे सो साहब कहै हैं कि तैतो मेराहै तेरे ज्ञान
नयन रतनार रहेहैं कहे मोमें तेरो अनुराग रह्यो है तैं काहे मनरूपी जालमें
परिकै कालके दरबार चलो जायहै जामें मेरो अनुरागहै वे आपनो ज्ञान नयन
खोलु मेरी निर्गुण भक्ति छागुणवारी है सो करु मेरे पास आइकै मन मायाँ
कालते बची जायगो ॥ २२४ ॥
पानी भीतर घरकिया, शय्या किया पतार ॥
पांसापराकरमको, तबमैं पहिरा जार ॥ २२५ ॥
जीवमुख ।
जीवकहै हैं कि मैं वाणीरूप पानीमें घरकियाहै गुरुवालोगँ वाणीको उपदेश
करिकै वही वाणीरूप पानीमें डारि दिये औ संसाररूपी जोपतारहै बन तामें
शय्याकिया तब कर्मको पांसापर्यो तामें मनरूपी जाल मैं पहिरयो अर्थात्
मनरूपजाल में फँदिगयो ॥ २२५ ॥

( ६१२ ) बीजक कबीरदास ।
मच्छ होय ना वाचिहो, ढीमरतेरे काल ॥
जेहि जेहि डावर तुम फिरौ, तहँ तहँ मेलै जाल२२६॥
हे जीव ! जो तुम मच्छ जोहै मायाको अनुभव ब्रह्म सोई ह्वैकै जो बाचा-
चाहौ तौ न बाचौगे तेरो फँदावनवारो ढीमर जो है मन सोई कालहै सो तुमको
फँदायकै कालके घर पहुँचाय देइगो अर्थात् जो ज्ञानकरि ब्रह्महू द्वैजाउगे तबहूं
माया धरिही लै आवैगी अथवा समाधि करिकै प्राणको ब्रह्मांड में पठायकै
ज्योति में लीनौ होउगे तबहूं माया धरि लै आवैगी तेहिते जौने जौने मत
जे डावर तामें फिरौगे कहे मतमें लागौगे तहाँतहाँ या मनरूपी ढीमर जाल
फेंकिकै तुमको धरिही लै आवैगो तेहिते मन वचनके परे जो भक्तियोग तौनेको
जानौ तब वह कालते बचौगे सो भक्तिके गुण पाछे कहिआये हैं औ भक्तियोग
मन बचनके परै है तामें प्रमाण कबीरजीके शब्दावली ग्रन्थको ॥
शब्द ।
अबधू ऐसा योग बिचारा । जो अक्षरहू सों है न्यारा ॥
जौन पवन तुम गङ्ग चढ़ावो करौ गुफामें बासा ।
सोतो पवन गगन जब बिनशै तब कह योग तमाशा ॥
जबहीं विनशै इंगलापिंगला बिनशै सुषुमन नारी ।
जो उनमुनि सो नाड़ी लागी सो कह रहै तुम्हारी ॥
मेरु दण्डमें डारि दुलैचा योगी आसन लाया ।
मेरु दण्डकी खाक उड़ैगी कञ्चे योग कमाया ॥
सोतो ज्योतिगगनमें दरशै पानीमें ज्यों तारा ।
बिनशो नीरनसों जब तारा निसरौगे केहि द्वारा ॥
द्वैतलाग बैराग कठिन है अटके मुनि जन योगी ।
अक्षरलों सब खबरि बतावै जहँलौं मुक्ति वियोगी ॥
सोपद कह्यो कहे सो न्यारा सत्य असत्य निबेरा ।
कहै कबीरताहि लखुयोगी बहुरि न करियेफेरा ॥ २२६ ॥

साखी । ( ६१३ )
बिन रसरी गरसब बँध्यो, तामें बँधा अलेख ॥
दीन्हो दर्पण हाथमें, चशमविना क्यादेख॥२२७॥
गुरुमुख ।
बिनरसरी सबकेंगर बाँधिलियो ऐसो जो है धोखाब्रह्म तामें अलेख जे जीव
हैं ते बँधे हैं साहब कहैं हैं तिनके हाथमें दर्पणदियो रामनाम बताइ दियो सो
चशम तो हैं नहीं कहे रामनामको ज्ञानतो है नहीं; आपनोरूप कैसे देखें किमैं
साहबको अंशहौं मकार स्वरूपहौं जब आपनोरूप न जान्यो तब मोकों
कहां जानै ॥ २२७ ॥
समुझाये समझै नहीं, परहथ आप विकाय ॥
मैंखैंचतहौं आपको, चला सो यमपुर जाय ॥ २२८ ॥
साहब कहैं हैं कि मैं बहुत समझाऊंहौं कि तैं मेरो है मेरे पास आउ आनकें
हाथ कहां बिकान जायहै नानामतनमें लागै है ब्रह्ममें लागै है कि आपहीकों
मालिक मानै है सो मैं बहुत खैंचतहौं अपनी ओर कि तैं मेरे पास आउ यह
यमपुरहीको चलोजायहै ॥ २२८ ॥
लोहे केरी नावरी, पाहन गरुवा भार ॥
शिरमें विषकी मोटरी, उतरन चाहै पार ॥ २२९ ॥
या काया लोहेकी नाव संसारसमुद्र पारजाबेको है मन पाहन ताको
गरुवाभार भरो है तापरं विषयरूप विषकी मोटरी शिरपर लीन्हे है सो जीव
कैसेकै पारजाय ॥ २२९ ॥
कृष्णसमीपी पाण्डवा, गले हेवारहि जाय ॥
लोहाको पारस मिलै, काई काहेक खाय ॥२३० ॥
कृष्णसमीपके बसनवारे पाण्डवा ते हेवारमें गले जाय सो कृष्णचन्द्रकों जौं
वे जानते तो हेवारमें काहेको जाते काहेते जो पारसमें लोहा छुइ जातो है तामें
काई नहीं लगै है अर्थात सोनाहै जायहै साहबको जाननवारो पारसही है जायहै

( ६१४ ) बीजक कबीरदास ।
यामें या हेतुहै कि जे नीकी तरह साहबको जानै हैं ते यही दे है जायहैं सो
गोपी याही देहै गई हैं सो ब्रह्मवैवर्तक में प्रसिद्ध है सो गोपिका नीकी प्रकार
जान्यो है ॥ २३० ॥
पूरबऊगै पश्चिम अथवै, भखै पवनको फूल ॥
ताहूको तो राहुगरासै, मानुषकाढेकभूल ॥ २३१ ॥
पूरबते सूर्य उगै हैं औ पश्चिम अथवै हैं पवनको फूलभखै हैं अर्थात् प्रबल
पवन चलै है वाही भ्रमत रहै हैं ऐसें सूर्य हैं तिनहूं सूर्य को राहुगरासै है अरे
मनुष्य जो तैं भूलै है कि पवनते मैं आत्माको चढ़ाय लेउँगो हजारन वर्षपवनै
खाय जिवोंगो मुक्त है जायगो सो तैं केतेदिन पवनखायगों जे सूर्य केतौदिन
पवनखायो ताहूको कालराहु गरासै है तैं कैसे कालते बचौगे ॥ २३१ ॥
नैनके आगे मन बसै, पलपलकरै जो दौर ॥
तीनि लोक मन भूपहै, मन पूजा सब ठौर ॥ २३२ ॥
ज्ञाननयनके आगे मनहीं बसै है वह धोखाब्रह्म मनहीं को अनुभव है
पलपलमें दौरै है नयन बिषयनमें लगै हैंनाना मतनमें लगै हैं नानाज्ञान बिचा-
रकरै हैं तीनि लोकमें या मनहीं भूपहै मनहीं की पूजा सब ठौर होइहै अर्थात्
मनहीं ब्रह्म है पुजावै है मनहीं जीवात्माको ज्ञान करै है किं मैहीं मालिकहौं
जों मनके परे साहब हैं ताको कोई नहीं जानै हैं ॥ २३२ ॥
मन स्वारथ आपहि रसिक, विषय लहरि फहराय ॥
मनके चलतै तन चलत, ताते सरवसुजाय ॥ २३३ ॥
या आपनो स्वारथ मनहींको मानिलियो मनको रसिक आपही भयो अर्थात्
मनको रस आपही लेइ है मनके किये जे पाप पुण्य तिनको भोगैया आपही
बन्यो है याही हेतुते याके बिषय लहरि फहरायरही है सोई विषयनको जब
मनचल्यो तब जीवहु चल्यो मनके चलते तनहूं चल्यो जाय है बिषय करनकों
ताते सरबसुहानि या जीवकी होती है अर्थात् बिषय लिये पापादिक कर्मकियो
नरकको गयो औ येई बिषयन लिये अप्सरनको भोगकरै है नानायज्ञादिक कियों

साखी। (६१६)
स्वर्गको चलो गयो सो सर्बसु याको साहबहै तिनके ज्ञानकी हानि हैगई
पाण्डवनके दृष्टांतते उपासनाकाण्ड औ सूर्यके दृष्टांतते योगकाण्ड औ मनके
अनुभवके दृष्टांतते ज्ञानकाण्ड औ बिषय लहारिकें दृष्टांतते कर्म काण्ड कह्यो सों
इनमें लगिकै नित्यबिहारी साकेत निवासी जे श्रीरामचंद्र तिन को जीव
भूलिगये याहीते जीवनको जरा मरण नहीं छूटै है ॥ २३३ ॥
ऐसी गति संसारकी, ज्यों गाडरकी ठाट ॥
एक पराजो गाड़में, सबै जात तेहिबाट ॥ २३४ ॥
या संसारकी ऐसी गति है जैसे गाडरकी पाँति जो एक गाड़में गिरै तौ
वाहीराह सिगरी गिरंती जायहैं सो या संसारको भेड़ियाधसान यही है एक
जो कौनौ मत गहै तौ सिगरे वा मतगहैं नीकनागा को बिचार न करैं ॥ २३४ ॥
वा मारगतो कठिनहै, तहँ मति कोई जाय ॥
जे गै ते बहुरे नहीं, कुशलकहै को आय ॥ २३५ ॥
वामारगतो महाकठिन है जे साहबके पास जायहैं ते नहीं लोटैं हैं उनको
जनन मरण नहीं होयहै यहां फिरि आइकै वा मार्गकी खबरिको कहै अर्थात्
कुशल को बतावै रहिगे कुसंगी तिनको संग करिकै जीव नरक को चले जाय
हैं साहबको न जाने ॥ २३५ ॥
मारी मरै कुसंगकी, केराके ढिग बेर ॥
वह हालै वह अँगचिरै, बिधिने संगनिबेर ॥ २३६ ॥
केराके साथ बैर जामै है तौ जैसे बैरके हाले केराको अंग फटिजाय है
वाके काँटाते तैसे कुसंगीकिन्हे साहबको ज्ञान जातरहै है गुरुवन के बचनजे हैं
तेई काँटाहैं गुरुवालोग बैरहैं ॥ २३६ ॥
केरा तबहिं न चेतिया, जब ढिगलागी बेरि ॥
अबके चेते क्या भया, काँटन लीन्हो घेरि ॥ २३७ ॥

( ६१६ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुमुख ।
साहब कहैं हैं कि अरेकेरा ! अरेजीवौ तैंतो बड़ोकोमल है तब न चेतकियो
जब तेरे समीप बैरलागी अर्थात् गुरुवा लोग उपदेश करनलगे अब तेरे चेते
कहाभयो अबतो उपदेश रूप काँटा तोको घेरिलियो मेरे ज्ञानको फारिडार्यो
अब कहा चेतै है तामै प्रमाण ॥ “आछे दिन पाछे गये कियो न हरिसोंहेत” ॥
अब क्या चेते मूढ़तैं, चिड़िया चुनिगइँ खेत ॥ २३७ ॥
जीव मरण जानै नहीं, अंधभया सब जाय ॥
वादीद्वारेदादिनहिं, जन्मजन्मपँछिताय ॥ २३८ ॥
सों कबीरजी कहै हैं कि साहब या प्रकारते उपदेश करै हैं पै जीवको
कोई मरण नहीं जानै है कि हम मरि जायँगे हमारो जनन मरण न छूटैगो
सो एकतौ आंधरही रहे साहबको ज्ञान नहीं रह्यो तौपै गुरुवनको उपदेश भयो
आँधरते आँधर होत जायँ हैं बादीके द्वारे दादि नहीं पावै अर्थात् जासों पूछै
हैं कि हम कौनके हैं हमारो जनन मरण कैसे छूटै नरकते कौन हमारी रक्षा
करै तौ बेतौ बादी हैं साहबको कैसे बतावैं और और मतमें लगाय दियो
फिरि यादिहू किये साहबको न पायो तातें जगतमें २ पछितायहैं जनन मरण न
छूट्यो गुरुवासाहबको ज्ञान भुलाय दियो तामै प्रमाण ।
बिप्रमतीसीको ।
बिन परशन दरशन बहुतेरे द्वै हैं ब्रह्म ज्ञानी ।
बीज बिना बिज्ञान कथैगो धोखाकी सहिदानी ॥
कृतिम उपासी कर्म्म बिलासी जायँ ते जन यमद्वारं ।
हम करता भजि करता द्वैरहे औरै के उपकारं ॥
राम कहैगा सो निबहैगा उलटि रहै जो गाड़ा ।
धोखा दुंदुर बहुत उठैगा राम भक्तिके आड़ा ।
हिंदू तुरुक दोऊ दल भूले लोक बेद बटपारं ॥
सत गुरु बिना सिद्धि नहिं कोई खिरकी कैन उघारं ॥ २३८ ॥

साखी । ( ६१७ )
जाकोसतगुरुनामल्यो, ब्याकुलचहुँदिशिधाय ॥
आँखिनसूझैबावरा, घरजारैघूरबुताय ॥ २३९ ॥
गुरुमुख ।
जाको सतगुरु नहीं मिले हैं सो ब्याकुल ह्वैकै चारों ओर धावै है कहूंब्रह्ममें
कहूंनाना ईश्वरनमें नानामतनमेंलागै है कि हमारी मुक्ति ह्वैजाय सो अरे बावरे
तेरी आंखिनमें नहीं सूझै है औरै औरै मतनमें निश्चय करै है सो घूरहै ताकों
कहा बुतावैहै मेरोरूप औ आपनोरूप ताको तौ जानु या घरतो जरोजाय है ताको-
बुताउ जातें जनन मरण छूटै घूर बुताये कहा है ॥ २३९ ॥
अनतवस्तुजोअनतैखोजै, केहिविधिआवैहाथ ॥
ज्ञानीसोईसराहिये, पारिखराखैसाथ ॥ २४० ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि अनतकी बस्तु अनतै खोजै है कहेयह जीव साहबको
अंशहै सदाको दास है तौनेको कहै हैं कि ब्रह्म को है देवतनको है ईश्वरनकों
दासहै सो जौने साहबको दासहै ताको तो जानबही न कियो आपनो स्वरूप
कौनी रीतिते जानै सो हम तौ सोई ज्ञानीको सराहते हैं जो पारिख अपने साथ
राखै है कि हम साहबके हैं दूसरे के नहीं हैं न ब्रह्मके न मायाके न ईश्वरन के
हैंसोई सांचे ज्ञानीको हम सराहते हैं ॥ २४० ॥
सुनिये सबकी, निबेरिये अपनी ॥
सिन्धुरको सेंदोरा, झपनीकी झपनी ॥ २४१ ॥
जहाँ जहाँ सुनिये तहाँ तहाँ साहबहीकी बात निबेरि लीजिये और मत खण्डन करि
डारिये काहेते कि वेदशास्त्र सोई है जामे साहबको परत्वहोइ जोकहूं वेदशास्त्रक-
रिकै साहबको न जान्यो ताको उपदेश यहि रीतिते जैसे सिंधुर जो हाथी ताको
सेंदुर शृङ्गारिकियो वे शुण्डते धूरिभरियो झपनीकी झपनी कहे जैसे रज झपिगई
तैसे जबलौं उपदेश सुन्यो तबलो ज्ञानरह्यो। फिरि नहींरहै जौने वेद शास्त्रमें साहबको
परत्वहोइ सोई अर्थ । तामें प्रमाण चौरासी अंगकी साखी ॥ "राम नाम निज
जानिले, येही बड़ा अरत्थ॥ काहेको पढ़ि पढ़ि मरै, कोटिन ज्ञान गरत्थ"॥२४१॥

( ६१८ ) बीजक कबीरदास ।
बाजनदेवायंतरी, कलिं कुकुरी मति छेर ॥
तुझे बिरानी क्या परी, तू आपनी निबेर ॥ २४२ ॥
जे और और बातें सबकहैं हैं सो या शरीर यंत्रकहे बीणा है जैसों बजवैया
बजावै है तैसो बाजै है ऐसे या शरीरमनके आधीन है जहां चलावैहै तहां चलै है
कहूं बक बक करावै है कहूं ब्रह्ममें लगावै है नानामतनको सिद्धांतकरै है सो
वा यंत्रकों बाजनदे मन बैकळकुकुरिया है वाको विष जो तेरे चढ़ैगो तै
तुहूं बैकळह्वैमरि जाइगो अर्थात् चौरासी योनिमें परैगो सो तोको बिरानी कह
परी है तैं आपनी निबेरु जो तेरे यन्त्र बाजै है सुरति कमलमें गुरु राम
नाम ध्वनि उपदेश देइँ हैं ताको ध्यान करु राम नाम शब्द सब शब्दतें
अलगहै सोई साँचहै और सब मिथ्याहै सो तैं राम नाम ते सनेहकरु राम
नामको स्नेही मरत नहीं है तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ “शून्य मरै अजपा मरै
अनहदहू मरि जाय ॥ राम सनेही ना मरै, कह कबीर समुझाय” ॥ २४२॥
गावैं कथैं विचारैं नाहीं, अन जानैको दोहा ॥
कहकबीरपारसपरशेबिन, ज्योंपाहनविचलोहा ॥२४३॥
नाना पुराण नाना शास्त्र नाना मत गावै हैं औ उनको कथनी करै हैं और
औरको समुझावै है परन्तु सर्व शास्त्रको अर्थ साहबही हैं यह नहीं बिचारै हैं
जैसे शुक चित्रकूटी राम कहि दियें न चित्रकूटको अर्थ न रामको अर्थ जानै है
आने में आन साजै है रसाभाव करि देयहै ऐसे सब शास्त्रको सिद्धांत जो जो
साहब पारस रूप तिनको तो जानतही नहीं है कौनी रीति जीव लोहा कञ्चन
होइ अर्थात् जब स्पर्श होय उनको जानि उनमें लगै भजन करै तब कञ्च-
न होय ॥ २४३ ॥
प्रथममैं एक जो हौ किया, भयासो बारह बाट ॥
कसत कसौटी ना टिका, पीतर भया निराट ॥२४४॥
प्रथममें यह जीवको एक कियो कहे एक राहमें लगायो कि मेरी भक्ति करै
गो तौ संसारते छूटि जायगो औ यह बारह बन भयो कहे आपने रूपी बाणकों