कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ४७२ ) बीजक कबीरदास ।
नवारी माया सो जहां रहै है तहँ तोको ये सब कामादिक लैजैहैं जो यह
मानि राख्योहै कि प्राण चढ़ाइकै ब्रह्मांडमें लैगये मायाते भिन्न द्वैगये सो या
पति तिहारी न रहेगी जब समाधिते जीव उतरैगो तब पुनि मायामें परि
जाउगे ॥ ३ ॥
मांझ मँझारिया बसै जो जानै जन हैहै सो थीराहो ।
निर्भय गुरु कि नगरियातहँवां सुख सोवै दास कबीराहो४
सो मांझ जो है माया काहेते कि जीव साहब के बीचमें माया को आवरणहै
तौने के मँझरिया में जो जन बसै जानैहै कि मायाके बीचमें बसोहै औ माया
वाको ग्रहण नहीं करिसकै है जैसे जलमें कमल जल नहीं स्पर्श करि सकै हे
काहेते साहब को जानै है सहज समाधि लगाये है तेई जन थिर रहै हैं। अथवा
साहब औ जीव के मांझ कहे बिचबादक रामनाम तौने मँझरिया कहे जामिन
है साहबके पास पहुंचाइबे को तौने रामनाम में जो कोई बसै जानैहै कि मकार
रूप मैंहौं रकाररूप साहब है मैं सदाको दास हौं औ रामनाम सर्वत्र पूर्ण है
ऐसो जो कोई जानै सो थिर रहै है तामें प्रमाण गोसाईं की चौपाई ॥ "अगुण
सगुण बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी ॥ " फिरि प्रमाण
श्लोक ॥ "रकारश्शेषलोकश्च अकारोमर्त्यसंभवः । मकारश्शून्यलोकश्च त्रयो-
लोकानिराशयाः ॥" तामें प्रमाण कबीर जीका पद् ॥ "क्या नांगे क्या बांधे चाम
जो नहिं चीन्है आतम राम ॥ नांगे फिरै योग जो होई । बनको मृगा मुकु-
ति गो कोई ॥ मूड़ मुड़ाये जो सिधि होई । मूड़ी भेड़ि मुक्ति क्यों न होई ॥
बिंद राखेजो खेलहि भाई । खुसरै कौन परम गति पाई ॥ पढ़े गुने उपनै
हंकारा । अधघर बूड़े वार न पारा ॥ कहै कबीर सुनौरे भाई । राम नाम
बिन किन सिधि पाई ॥ " औ थिर ह्वैकै गुरु कहे सबते श्रेष्ठ श्री रामचं-
न्द्रके नगर कहे साकेतमें कबीर जे जीव ते उनके दासद्वै तहां सुखसों सो वै हैं
वहां और देवके उपासना वारे अहं ब्रह्मास्मिवारे जेहैं ते नहीं जाइ सकैहैं वे
मायाहीमें रहे आवै हैं ॥ ४ ॥
इति सातवां कहरा समाप्त ।
कहरा । ( ४७३ )
अथ आठवां कहरा ॥ ८ ॥
क्षेम कुशल औ सही सलामत कहहु कौनको दीन्हा हो ।
आवत जात दुनौ विधि लूटे सरब संग हरि लीन्हा हो॥१॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया मीरा पैदा कीन्हाहो ।
कहँलौं गिनैं अनंत कोटिलै सकल पयाना दीन्हाहो ॥२॥
पानी पवन अकाश जाहिगो चन्द्र जाहिगो सूराहो ।
वहभी जाहिगो यहभी जाहिगो परत काहुको न पूराहो॥३॥
कुशलै कहत कहत जग विनशै कुशल कालकी फांसीहो ।
कह कबीर सब दुनियांविनशल रहलरामअविनाशीहो॥४॥
क्षेम कुशल औ सही सलामत कहहु कौन को दीन्हा हो ।
आवत जात दुनौ बिधि लूटे सरब संग हरि लीन्हा हो॥१॥
श्री कबीरजी कहै हैं क्षेम कहे कल्याण स्वरूप सदा रहै औ कुशल कहे
सब बातमें कुशल होय अर्थात् सर्वज्ञ होय औ सही सलामत कहे जेहिके सहीतें
जीव सलामत ह्वै जाय अर्थात् जेहिके अपनाय लीन्हेते जीवको जनन मरण
छूटि जाय ऐसे जे अपने गुणहैं ते साहब कौने जीवको अपने बिना जाने दीन्ह
है अर्थात् काहूको नहीं दीन ऐसे जे साहब हैं सरब संग कहे सब के अंत-
र्यामी तिनको या काल जीवको आवत कहे जनन औ जात कहे मरन दूनौ
बिधिमें लूट्यो अर्थात् जब आयो तब गर्भको ज्ञान नाशकै दियो औ जब
जाइगो तब वही को नाश ह्वैगयो साहबते चिन्हारी ना करनदियो ॥ १ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया मीरा पैदा कीन्हाहो ।
कहँलौं गिनैं अनंत कोटिलै सकल पयाना दीन्हाहो॥२॥
( ४७४ ) बीजक कबीरदास ।
औ सुर नर मुनि जे हैं औ पीर जे हैं औ औलिया जे हैं औ मीर जे पादशा-
हहैं तिनको पैदा करत भयो और कहांलौं गिनैं अनंत कोटि जीवनको पैदा
करि पायना कराइ देतभयो ॥ २ ॥
पानी पवन अकास जाहिगो चन्द्र जाहिगो सूराहो ।
वह भी जाहिगोयहभीजाहिगो परतकाहुको न पूराहो॥३॥
कुशलै कहत कहत जग बिनशै कुशल कालकी फांसीहो ।
कहकबीरसबदुनियाबिनशलरहलरामअविनाशीहो ॥४॥
पानी औ पवन औ आकाश औ चन्द्रमा औ सूरा कहे सूर्य औ यहभी
कहे यह जगत् औ वहभी कहे ब्रह्म सो ये सब चले जायेंगे सबको काल खाय
लियो है काहूकी पूर नहीं परी है ॥ ३ ॥ सो कुशलै कहत कहत कहे कुशलै
मानेमाने जग सब मरिगयो कुशल कोई न रहे कुशल कालकी फांसी है जाकी
फांसीमें सब परे हैं सो कबीरजी कहैं हैं कि सब दुनियां बिनशि जाय है जो
राम करिकै जन्म बिनाशी है सोई रहिगे अर्थात् रामके दासई अविनाशी हैं
इनका नाश नहीं होयहै सो या बाल्मीक रामायणमें प्रसिद्ध है अङ्गद हनुमान्
आदिकनको नाश नहीं भयो है ॥ ४ ॥
इति आठवां कहरा समाप्त ।
अथ नवां कहरा ॥ ९ ॥
ऐसन देह निरापन बौरे मुये छुवै नहिं कोईहो ।
डंडक डोरवा तोरि लै आइनि जो कोटिकध नहोईहो॥१॥
उरध इवासा उपंजग तरासा हंकराइनि परि वाराहो ।
जो कोई आवै वेगि चलावै पल यक रहन न हाराहो॥२॥
चंदन चूर चतुर सब लेपैं गल गजमुक्ता हाराहो ।
चोंचन गीध मुये तन लूटैं जंबुक वोदर फाराहो ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो सन्तो ज्ञानहीन मति हीनाहो ।
यक यक दिन यह गति सबही की कहा रावकादीनाहो ॥४॥
ऐसी देह निरानप है कहै अपनी नहीं है और सब अर्थ प्रगटई है श्री कबीरजी
कहैहैं कि जे मतिते हीन मूर्ख परम पुरुष श्री रामचन्द्रके ज्ञानते हीन रहैं तिनके
शरीरकी दशा ऐसे एक दिन सबकी है चाहै रंक होइ चाहै राउ होइहै ॥ ४ ॥
इति नवां कहरा समाप्त ।
अथ दशवां कहरा ॥ १० ॥
हौं सबहिनमें हौं नाहीं मोहिं विलग विलग विलगाई हो ।
ओढ़न मेरे एक पिछौरा लोग बोलहिं यकताई हो ॥ १ ॥
एक निरंतर अंतर नाहीं ज्यों घट जल शशि झाईहो ।
यक समान कोई समुझत नाहीं जरा मरण श्रम जाईहो॥२॥
रैनि दिवस मैं तहँवो नाहीं नारि पुरुष समताई हो ।
नामैं बालक नामैं बूढ़ो नामोरे चेलिकाई हो ॥ ३ ॥
तिरविधि रहौं सबनमें बरतौं नाम मोर रम राईहो ।
पठये न जाउँ आने नहिं आऊँ सहज रहौं दुनियाई हो ।
जोलहा तान बान नहिं जानै फाट बिनै दश ठाईहो ।
गुरुप्रताब जिन जैसो भाष्यो जिन विरले सुधिपाईहो॥५॥
अनंत कोटि मन हीरा वेध्यो फिटकी मोल न आईहो ।
सुर नर मुनि वाके खोज परे हैं किछु किछु कबिर न पाईहो ६
हौं सबहिनमें हौं नाहीं मोहिं विलग विलग बिलगाईहो ।
ओढ़न मेरे एक पिछौरा लोग बोलहिं यकताई हो ॥ १ ॥
( ४७६ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुमुख ।
मैं सबमें हौं औ सब न होउँ ऐसे मोको बिलग बिलग कहे जुदा जुदा
बिलगाइकै बेद कह्यो । इहां दुइबार बिलग बिलग कह्यो सो एकतो चित् कहै
जीव ब्रह्म ईश्वर अचित् कहै माया काल कर्म सुभाव पृथ्वी आदिक मायाके
कार्य सब सो ये दोहुनमे अंतर्यामी रूपते व्यापक है। सो जीव ब्रह्म ईश्वर चित्
तत्त्व में व्यापक हौं तामेंप्रमाण ॥ “विष्णुवायुत्तमदेहेषु प्रविष्टो देवताभवत् ।
मर्त्याद्यधर्मदेहेषु स्थितो भजति देवताः”॥इति श्रुतिः।“एको देवः सर्वभूतेषुगूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतांतरात्मा इति श्रुतिः” ॥ “ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमिति गीता-
याम्॥” अचितौमें व्यापक है तामेंप्रमाण॥ “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थि-
तो जगत् इति गीतायाम्”॥सो चित्अचित्दोऊ व्याप्यपदार्थ हैं व्यापक मैं हौं
सो चित् अचित्रूप पिछौरा दुइ छोरिया मेरो ओढ़नहै सर्वत्र महींहौं सो वेद
को तात्पर्य न जानिकै लोग यकताई बोले हैं कि एकई ब्रह्म है पिछौरा ओटै
याको एकही कहै हैं दूसरा नहीं कहै हैं लोगजो यकताई कहैहैं सो कौनी तरह
ते कहै है सो कहै हैं ॥ १ ॥
एक निरंतर अंतर नाहीं ज्यों घट जल शशि झांईहो ।
यक समान कोइ समुझत नाहीं जरा मरण भ्रम जाईहो॥२॥
वहीं ब्रह्म निरंतर एक सर्वत्र है या लोग बोलै हैं सो कहा अन्तर नहीं है अर्थात्
अन्तरहै कैसे जैसे जलभरे घटनमें शशिकी छाया वामें व्याप्य व्यापक बनो है सो एक
जो मैं सो समान कहे सबमें समव्यापकहौं ताको कोई व्याप्य व्यापक कोई नहीं
समुझै है तौ कहा उनको जरा मरण भ्रम जाइहै अर्थात् नहीं जाइहै सो अंतर्यामी
रूपते व्यापक साहब कहि चुके अब निज रूपते जहाँ रहै हैं तहांकी बात कहै हैं॥२॥
रैनि दिवस में तहँवों नाहीं नारि पुरुष समताईहो ।
नामैं बालक नामैं बूढ़ो ना मोरे चेलिकाईहो ॥ ३ ॥
जहांमैं रहौ हौं तहां न रातिहै न दिनहै औ सब नारी रूपहैं जो पुरुषहू जाईहै
सो नारिन रूपते रासमें प्राप्त होइहै पुरुष महींहौं औ समताई है जैसे सच्चिदानन्दरूप
कहरा । ( ४७७ )
ऐसे ओऊ सच्चिदानंद रूपहैं मैं न बालकहौं न वृद्धहौं सदा किशोररूप बन्यों
रहौहौं औ न मोरे चेलिकाई कहे कोऊ वह उपदेश्य नहीं है अर्थात् अज्ञानी
कोऊ नहीं हैं सब मेरे रूपको जानैं हैं वहां राति दिन नहीं है तामें प्रमाण ॥
“न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम
परमं मम ” ॥ ३ ॥
तिरबिध रहौं सबनमें बरतौं नाम मोर रमराई हो ।
पठये न जाउँ आने नहिं आऊं सहज रहौं दुनियाई हो॥४॥
तिरबिध रहौं कहे जीव ब्रह्म ईश्वरनमें जो अंतर्यामी रूपते रहौहौं औ
सबनमें बरतौं कहे माया काल कर्म सुभाव इन में जो अंतर्यामी रूपते रहौहौं
सो इनमें जो रमनवारो अंतर्यामी मेरो रूप ब्रह्म ताहूको मैं राईहौं सो पठयें
नहीं जाउहौं न आनेते आऊंहौं अर्थात् जो कहूं नहोउं तौ ना आनै आऊँ
न पठये जाउँ सर्वत्रै तो हौं सो यही रीतिते सहजही या दुनियामें अंतर्यामीके
अंतर्यामी रूपते पूर्णहौं ॥ ४ ॥
जोलहा तान बान नहिं जानैं फाट बिनै दश ठाईहो ।
गुरु प्रताप जिन जैसो भाष्यो जन विरले सुधि पाई हो॥५॥
जोलहा जे हैं जीव ते तान बान नहीं जानैं अर्थात् वा हंसस्वरूप पोसाक
बनै नहीं जानैं जो पहिरिके मेरे समीप आवै फाटबिनै दश ठाई कहे दशहैं
छिद्र जिनमें ऐसो जो शरीर ताहीको बिनै है कहे नाना मतनमें परिकै वही
कर्म करैहै जामें अनेक जन्म शरीर धारण करत जायहै जो कहो कोऊ जान-
तही नहीं है तौ गुरुके प्रतापते जो कोऊ मेरो रूप भाष्यो है जैसो सो तौ कोई
बिरला जन सुधि पायो है अर्थात् जाको सत्गुरु मिल्यो है सोई पायों है ॥५॥
अनंत कोटि मन हीरा वेध्यो फिटकी मोल न आईहो ।
सुर नर मुनि वाके खोज परैहैं किछु किछु कबीरन पाईहो ६
अनंत कोटि जे जीव हीराहैं तिनमें मन बेध्यो है सो या हीरारूप
जीवको फिटिकिरिउ को मोल न रहिगयो सो सुर जे हैं मुनि जे हैं नर जेहैं
ते वही अपने स्वरूपको खोजैहैं सो किछु किछु कहे थोरहूते थोर जीव
पाइनहै और कोई नहीं पायो जे आपनो रूप मेरो रूप गुरुप्रताप जानि
शरीरको बिनैया मनको त्याग्यो है तेई पायो है अथवा किछु किछु कबिरन पाई
कहे साकल्य करिकै हमारो भेद तौ कोई जानतही नहीं है जे अपनो रूप मेरोरूप
जानत जे जीव ते किछु किछु भेद पायो है ॥ ६ ॥
इति दशवां कहरा समाप्त ।
अथ ग्यारहवां कहरा ॥११॥
ननँदी गे तैं विषम सोहागिनि तैं निदले संसारागे ।
आवत देखि एक सँग सूती तैं अरु खसम हमारागे ॥ १ ॥
मोरे बापकि दोय मेहरिया मैं अरु मोर जेठानीगे ।
जब हम ऐलि रसिकके जगमें तबहिं बात जग जानीगे २
माई मोर मुवल पिताके संगहि सर रचि मुवल संघातागे।
अपनो मुई और ले मुवली लोग कुटुम्ब सँग साथागे ॥३॥
जौ लौं सांस रहै घट भीतर तौ लग कुशल पर
कियो साहबको ज्ञान हमारे नहीं भयो सो साहब या लोकके
Wait, check:
- "परिबेही": प + र + ि + ब + े + ह + ी
- "कियो": कियो
- "साहबको": साहबको
- "ज्ञान": ज्ञान
- "हमारे": हमारे
- "नहीं": न + ह + ी + ं
- "भयो": भयो
- "सो": सो
- "साहब": साहब
- "या": या
- "लोकके": लोकके
All matched!
Line 15:
मालिक जेहैं तेईहैं जिनके जाने संसार छूटैहै ब्रह्मसाहब नहीं है ॥ २ ॥
Wait, check:
- "मालिक": मालिक
- "जेहैं": जेहैं
- "तेईहैं": त + े + ई + ह + ै + ं
- "जिनके": जिनके
- "जाने": जाने
- "संसार": संसार
- "छूटैहै": छ + ू + ट + ै + ह + ै
- "ब्रह्मसाहब": ब्रह्मसाहब
- "नहीं": नहीं
- "है": है
- "॥ २ ॥": ॥ २ ॥
All matched!
Line 16:
सो पिता जो हमारो धोखा ब्रह्म जौनेके द्वारा हम व्यष्टिभये सो जब
Wait, check:
- "सो": सो
- "पिता":
( ४८० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बारहवां कहरा ॥ १२ ॥
या माया रघुनाथ कि बौरी खेलन चली अहेरा हो ।
चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारै काहु न राखै नेराहो॥१॥
मौनी वीर दिगम्वर मांरे ध्यान धरंते योगीहो ।
जंगल मेंके जंगम मारे माया किनहुं न भोगीहो ॥ २ ॥
वेद पढ़ंता पांडे मारे पूजा करते स्वामीहो ।
अर्थ विचारे पंडित मारे वांध्यो सकल लगामीहो ॥ ३ ॥
शृंगीऋषि बन भीतर मारे शिर ब्रह्माके फोरीहो ।
नाथमछंदर चले पीठदै सिंहलहूमें बौरीहो ॥ ४ ॥
साकतके घर कर्त्ता धर्त्ता हरि भक्तनकी चेरीहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो ज्यों आवै त्यों फेरी हो ॥ ५ ॥
ज्ञानशक्ति कबीर को जवाब दियो मैं कहा करौं मोको कोई जीवनके उदय
होन नहीं देइहै माया सबको बांधि लियो है सो कबीरजी जीवनसों कहै हैं
यह माया छुइ जान न पावै जबहीं आवै तबहीं यासों मुंह फेरिलेउ तबहीं बचौगे
या सबको बांधि लियो है तुम्हहूंको बांधि लेइगी औ इहां रघुनाथकी बौरी जो
माया कह्यो सो रघुहै जीव ताके नाथ जे श्री रामचन्द्र तिनकी या माया है सों
जीवनको धरि धरिकै शिकार खेलै है सो जब अपने नाथको या जीव जानै
जिनकी या मायाहै तब तब या मायाते छूटैगो अपने बल ते जीव न छूटि
सकैगो अथवा या माया रघुनाथकी बौरी है रघुनाथकी बौरी कहै रघुनाथकों
न जानिबो यहै याको स्वरूप है १ ॥ ५ ॥
इति बारहवां कहरा समाप्त
इति कहरा सम्पूर्ण ।
अथ बसंत ।
पहिला बसंत ॥ १ ॥
जहँ वारहि मास बसंत होय।परमारथ बूझै विरल कोय॥१॥
जहँ वर्षै अग्नि अखंड धार।बन हरियर भो अट्ठार भार २॥
पनिया अन्दर तेहि घेरे न कोय।वह पवन गहे कश्मल न धोय३
बिनुतरुवरजहँ फूलो अकास।शिव औविरंचि तहँ लेहिंवास४
सनकादिक भूले भवँर भोय । तहँ लख चौरासी जीव जोय५
तोहिं जो सतगुरु सत सो लखाव।तुम तासु न छांड़हु चरणभाव
वहअमरलोकफललगे चाय।यह हक कबीर बूझै सो खाय७
जहँ बारहि मास बसंत होय। परमारथ बूझै विरल कोय॥ १॥
जहँ वर्ष अग्नि अखंड धार । वनहरियर भो अट्ठार भार २
जाके कहे जौने साहबके लोकमें बारहौ मास बसंत बनो रहै है सो या
परमार्थ कोई बिरला बूझै है। सो वा रूपकातिशयोक्ति अलंकार करिकहै हैं॥१॥
औ बसंत ऋतुमें सूर्यते अग्नि बर्षै है अखंडधार बन जो है अठारह भार बन-
स्पती सो हरियर होतजाइ हैं औ साहबके लोकमें कोटिन सूर्यको प्रकाशहै
परंतु सबको ताप हारि लेनवारो है बहांके सब बन संतानक आदिक हरियर
रहैं ॥ २ ॥
३१
( ४८२ ) बीजक कबीरदास ।
पनिया अंदर तेहि धरे न कोय।वह पवन गहेकश्मल न धोय
बिनु तरुवर जहँ फूलोअकासा।शिव औ विरंचितहँ लेहिंबास
औ बसंत ऋतुमें बृक्षनके अंदरनमें कोई पानी नहीं धरै है चन्द्र जो है सो
अमृतको श्रवै है ताहीको गहे पवन वृक्षनके कश्मलको धोयडारै है ।
औसाहबको लोक कैसो है कि, पनिया अंदर कहे वा रसरूपहै ताको कोई नहीं
जानैहै । वही रसरूप लोकको स्मरण पवनहै ताके गहे कहे कियेते कश्मल जे
पाप हैं ते धोय जात हैं । अथवा कामादि जे कश्मलहैं ते धोय जात हैं
॥ ३ ॥ औ बसंत ऋतुमें जहां तरुवर नहीं हैं ऐसो जो आकाश सोऊ पुहुपन
के परागन करिकै फूलो देखो परै है । कैसो है आकाश जहां शिव विरंचि
बास लेहि हैं अर्थात् वासकीन्हे हैं सुगंधित द्वैरह्यो है । औ साहबको लोककै-
साहै कि जेहिका प्रकाश चैतन्याकाश, बिना तरुवरै जगतरूप फूलफूलैहै शिव
विरंचिआदिक बास लेहिंहैं ॥ ४ ॥
सनकादिक भूले भवँर भोयातहँ लख चौरासी जीव जोय५॥
बसंत ऋतुमें चौरासी लाख योनि जीवनकी कौन गनती । सनकादिक जे
मुनि हैं तेऊ पुष्पमकरंद में भोयकै भवँरकी नाइ भूलि जाहिंहैं । औ साहबको
लोकमकाश ब्रह्म कैसाहै कि, सनक सनन्दन सनत्कुमार जाके भवँर में भोयकै
कहे परिकै भूलै हैं चौरासीलाख योनि जीवनकी कौनगिनती है ॥ ५ ॥
तोहिंजोसतगुरुसतकैलखाव।तुमतासुनछाड़हुचरणभाव६॥
वहअमरलोकफललगेचाय।यहकहकबीरबूझै सोखाय॥७॥
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, ऐसो जो साहब को लोक जहां बरहौ मास
बसंत बनो रहै है तौन जो सतगुरु कहे साहबके बतायदेनवारे तोको सत्यकै-
लखायो होय तो तुम ताके चरणको भाव न छांड़ौ । भाव यहहै कि, वा लोक
के मालिक जो साहब हैं तिनहूंको बताय देइँगे । वह अमरलोक कैसा है कि,
जहां चारिउ फल अर्थ धर्म काम मोक्ष आनंदैकै फल लगेहैं । सो हे जीवो !
या बात जो कोई बूझैहै सोई खायहै । साहब के धाम में बारहा मास बसंत-
रहै है । तामें प्रमाण कबीरजीकी साखी ज्ञानसागरकी ॥ “सदा बसंत होत
बसंत । ( ४८३ )
तेहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ जहँवां रोग शोक नहिं होई ।
सदा आनन्द करै सब कोई ॥ चन्द्र सूर्य दिवस नहिं राती । बरण भेद नहिं
जाति अजाती ॥ तहँवां जरा मरण नहिं होई । क्रीड़ा बिनोद करै सब कोई ॥
पुहुप विमान सदा उजियारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ काया सुन्दरको
परवाना । उदित भये जिमि षोड़श भाना ॥ येता एक हंस उजियारा ।
शोभित चिकुर उदय जनु तारा ॥ बिमल बास जहँवां पौढ़ाही । योजन चार
घ्रान जो जाही ॥ श्वेत मनोहर छत्र शिर छाजा । बूझि न परै रंक अरु
राजा ॥ नहिं तहँ नरक स्वर्गकी खानी । अमृत बचन बोलै भल बानी ॥
अस सुख हमरे घरन महँ, कहैं कबीर बुझाय । सत्य शब्दको जानै, सो
अस्थिर बैठै आय" ॥ ६ ॥ ७ ॥
इति पहिला बसन्त समाप्त ।
अथ दूसरा बसंत ॥ २ ॥
रसनापढ़िभूलेश्रीवसंत । पुनिजाइपरिहौतुमयमकेअंत॥१॥
जोमेरुदण्डपरडंकदीन्ह । सोअष्टकमलपरजारिलीन्ह॥२॥
तबब्रह्मअग्निकीन्होप्रकास । तहँअद्धऊर्ध्ववहतीबतास॥३॥
तहँनवनारीपरिमलसोगावँ।मिलिसखीपांचतहँदेखनजावैँ४
जहँअनहदबाजारहलपूर। तहँ पुरुष बहत्तरि खेलैं धूर ॥५॥
तैंमायादेखिकसरहसिभूलि । जसबनस्पतीबनरहलफूलि६
यहकहकबीरयेहरिकेदास । फगुवामांगैबैकुंठवास ॥ ७ ॥
रसना पढ़ि भूल श्रीबंसत।पुनि जाइ परिहौ तुम यमके अंत १
श्रीबसंत कहे ऐश्वर्यरूप जो बसंत ताको रसना में पढ़िकै मन बचनके
परे जो साहबके लोकको बसंत ताको तुम भूलि गयो । रसनामें पढ़ि जो कह्यो
( ४८४ ) बीजक कबीरदास ।
तामें दुनियाहै कि, औरै देवतन की उपासनामें बड़ों ऐश्वर्य्य प्राप्तिहोइहै यह
पोथिनमें पढ़ि पढ़ि भुलाइगयो । वाहूको जीभैभरेते कह्यो कछु प्राप्ति नहीं भै
सो तुम फेरि यमके अंत कहे संसारमें परिहौ । औ जो लेहू पाठहोय तौ रस-
नामें श्रीबसंतको पढ़िलेहुनहीं तो पुनि यमके अंत कहे फंदमें परिहौ ॥ १ ॥
जो मेरु दंड पर डंक दीन्ह। सो अष्ट कमल परजारि लीन्ह२
औ जो या गुमान करो कि हम योगबारे हैं हम यमके अंतमें न परैंगे ।
सो जो तुम मेरुदंडमें प्राणखैंचिकै मेरुदंडपर डंका दीन्ह्यो, औ अष्टजो हैं आठों
कमल मूलाधार, विशुद्ध, मणिपूरक, स्वाधिष्ठान, अनहद, आज्ञाचक्र, सहस्रा-
रचक्र, अठयें सुरतिकमल जहां परमपुरुषहै तामें पहुंचिकै जारि दीन्ह अर्थात्
योगौ की खबरि भूलिगई ॥ २ ॥
तहँ ब्रह्म अग्नि कीन्हो प्रकास।तहँ अद्धो ऊर्ध्व वहती बतास३
तहँनवनारीपरिमलसोगाँव।मिलिसखीपांचतहँदेखनजावँ४
सो वा ज्योतिमें लीनभयो जीवतहँ ब्रह्मअग्नि प्रकाश करत भई औ बतास-
जो अधोऊर्ध्व श्वास सो वैह बहतभै अर्थात् बहिरे न आवत भै श्वास वहैं रहत
भै याभांति जीव तखतमें बैठि मालिक भयो गांवकारा बसंतदेखैहै ॥ ३ ॥ सो-
यहां परिमल कहे गंधका गांव है शरीरमें पृथ्वीतत्त्व अधिकहै सो गंधका गांव
शरीरहै तौने में नौ नारी हैं कहे नौ राहहैं तहां पांचो जे ज्ञानेन्द्री हैं तेई सखी
देखन जायहैं अर्थात् वहैं लीन ह्वै गई हैं ॥ ४ ॥
तहँ अनहद बाजा रहल पूरि।तहँ पुरुष बहत्तरि खेलैं धूरि॥५॥
तैं माया देखिकस रहसिभूलि।जसवनस्पतीवनरहलफूलि ६
बसंतमें बाजा बजै है सो अनहद बाजा जहां पूरि रह्यो है तहां बहत्तरि
पुरुष जे बहत्तरिकोठाहैं ते धूरि खेलैहैं अर्थात् चैतन्यता न रहिगै ॥ ५ ॥ सो
बसंतमें बनस्पती फूलै हैं ऐसे या माया फूलि रही है । तामें समाधि उतरे
फिरि काहे भूले । अथवा जैसे बनस्पतीफूलैहैं ऐसे गैवगुफामें सुधापीकै नागिनी
फूली है तामैंतैं काहे भूलिरहै है । कहा वा माया के बहिरे है समाधि नागिनि-
हीके आधार तो समाधिउहै ॥ ६ ॥
बसंत । ( ४८५ ) .
यह कह कबीर ये हरिके दास । फगुवा मागै वैकुण्ठ वास॥७॥
सो या हठयोग करिकै जानै कि मैं मुक्त होउँगो, तौ या समाधिमें मायाहीतें
नहीं छूट्यो मुक्त कहां होइगो । ताते श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीवात्मा !
हरिके दास तैं बैकुंठबासको फगुवामागै अर्थात् फगुहार फगुवा खेलाइकै
फगुवामागैं हैं सोतैंहठयोगकियो ताको फल फगुवा राजयोग मांगु जाते बैकुंठ
बासहोई ॥ ७ ॥
इति दूसरा बसंत समाप्त ।
अथ तीसरा बसंत ॥ ३ ॥
मैं आयउँमेहतरमिलनतोहिं।अबऋतुवसन्तपहिराउ मोहिं १
है लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुरा ना खुंटा तीन ॥२॥
शर लागे सै तीनि साठि । तहँ कस न वहत्तरि लागगांठि॥३
खुर खुर खुर खुर चलै नारि।वहबैठिजोलाहिनिपलाथिमारि४
सो करिगहमें दुइ चलाहिं गोड़ा।ऊपर नचनी नचि करै कोड़५
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार । सखी पांच तहँ रचीधमार ॥६॥
वें रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर ॥७॥
मैं आयउं मेहतर मिलन तोहिं।अबऋतुवसंतपहिराउमोहिं १
हैं लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुराना खुंटा तीन ॥२॥
जीव कहैहैं मेह कही बड़ेको औ जो बड़ाते बड़ा होइ ताको मेहतर कहै हैं
फ़ारसीमें । सो ईश्वरनते ब्रह्मते जो बड़े श्रीरामचंद्रहैं तिनसों जीव कहै है कि,
मैं तुमको मिलन आयो हौं । सो जौने लोकमें सदा बसंत रहै है सो मोको
पहिराओ अर्थात् मेरो प्रवेश कराइ दीजे । ताना रूप जो मेरे शरीरकों बसंत
तातें छुड़ाइये ॥ १ ॥ सो लम्बी पुरिया कौन कहावै जो ताना तनै है पूरै है
( ४८६ ) बीजक कबीरदास ।
सों मैं बासननि कारिकै बहुत लम्बा ह्वै रह्यौंहौं । कहैं बासननि
कारिकै मैं संसारमें फैलिरह्योहौं । औ पाई वा कहावैहै जो ताना
साफ करैहै सो या आत्माको साफ करिबो बहुत झीनहै कहै जब कोई बिरलै
संत मिलैं तब आत्मा शुद्ध होइ काहेते कि, यह सूतजीव पुरान कहै अनादि
कालते तीन खूंटा जो हैं सत १ रज २ तम ३ तामें बँधो है ॥ २ ॥
शर लागै सै तीनि साठि। तहँ कसनि बहत्तरि लाग गाँठि३
खुर खुर खुर खुरचलै नारि।वह बैठि जोलाहिनि पलथि मारि४
पाई में शर लागैहै सो शरीरमें तीनि सै साठि हाड़हैं तेई शरहैं बहत्तरि जे
कोठाहैं तिनमें बहत्तरि हजार नसनकी गांठि एक एककोठनमें लागहैं तेई कसनी
हैं ॥ ३ ॥ औ बिनतमें जौन बीच ह्वै चलावै है सो नारि कहावै है सो या
शरीरमें नाड़ी जो है सो खुर खुर खुर खुर चलैहै । औ जोलाहिनि जो है
बुद्धि सो पलथी मारिकै बैठी है अर्थात् देहही में निश्चय करिकै बैठी है ॥ ४ ॥
सो करिगहमें दुइ चलहि गोड़। ऊपर नचनीनाच करै कोड़५
सो यह तरहको जो शरीर है सो कारिगह है जहां जोलाहिनि बैठै है धमारि
महलमें होयहै सो शरीरै महलहै सो कारिगहमें जोलाहिनि दोऊ अंगूठा चलावै
है ऊपर तानामें नचनी कोड़ करै है कहै नाचै है । इहां शरीररूपी करिगहमें
बुद्धिरूपी जोलाहिनि बैठिकै कहूं शुभकर्म में निश्चय करै है कहूं अशुभ कर्ममें
निश्चय करै है यही दोऊ अंगूठाको लचाइबोहै । औ वृत्तिबुद्धिकी कहूंशुभमें
कहूं अशुभमें जायहै यही नचनी है सो नाचै है औ धमारि पक्षमें नाचत में
नचनी को गोड़ चलैहै ऊपर कोड़ करै है कहै भावबतावै है ॥ ५ ॥
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार। सखी पांच तहँ रची धमार ॥६॥
औ कषाय पांच जे हैं १ अविद्या २ अस्मिता ३ राग ४ द्वेष ५ अभि-
निवेश । औ पचीसौ जे तत्त्व हैं १ जीव २ माया ३ महत्तत्त्व ४ अहंकार ५
शब्द ६ रूप ७ रस ८ गन्ध ९ स्पर्श दशौँइंद्रिय एकमन २० पंच भूत
ई २५ औ ताहीमें दशौ द्वार ऐसे शरीर में पांच सखी जे हैं पंचप्राण ते धमारि
रचतभई । औ ताना पक्षमें पांच पचीस तत्त्वकेकेहे सबकोरीकै साजु आइगै
औ धरिकेहे सबअपने अपने धमारमें लगिगे कैड़ावारे माड़ीवारे पुरियावारें
करिगहवारें तानासाफकरैवारे औ धमारिपक्षमें पांच सखी धमारि रचैहैं दुइ
एकबार कियो एकदेखैया भो ॥ ६ ॥
वे रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर॥७॥
पांचो जे सखीहैं पांच तत्त्वनका रंग विरंग चीर पहिरैं । स्वगोदय में लिखे
हैं श्वास तत्त्वनके रंग जुदेजुदे देखे परै हैं औ कोरीके घरके अनेक रंगकेंचीर
पहिरैं हैं । औ धमारि पक्षमें केशरि कस्तूरी करिकै गुलाल झोड़र करिकै चीर
रंग बेरंग होयहैं ते पहिरैं हैं । सो यहि तरहकी धमारि या संसारमें है ताते
हरिको चरण धरिकै कबीर गावै है कहै है । या धमारिको प्रथम या कहि
आये हैं जौने लोकमें सदा बसंत है तहांप्रवेश करावो । औ इहां धमारि कहैं
हैं तात्पर्य यह कि, या शरीरको ताना बाना जनन मरण में परिरह्यो है या
धमारि तुमको देखायो जो रीझे होहु तो मैं फगुवा यही मांगौं हौं कि जहां
सदा बसंत है वा लोक में प्रवेश करावो औ न रीझ्यो होहु तौ तुम हरिहौ
या ताना बाना धमारि हरिलेउ । या कहो कि, “ऐसी धमारि तैं न रचु”
कबीर कहै हैं कि हे जीव हरिके चरणधारि ऐसी बिनयकरु ॥ ७ ॥
इति तीसराबसंत समाप्त ।
अथ चौथा बसन्त ॥ ४ ॥
बुढ़ियाहँसिकहमौँनितहिवारि।मोहिंऐसितरुणिकहुकौननारि १
ये दांत गये मोर पान खात।औ केश गयल मोर गँगनहात २
औ नयनगयल मोरकजल देत।अरुवैस गयलपरपुरुषलेत ३
औ जान पुरुष वा मोर अहार।मैं अन जानेको कर श्रृंगार४
कह कबीर बुढ़ि या आनँद गाय । पूत भतारहि बैठी खाय५॥
( ४८८ ) बीजक कबीरदास ।
बुढ़ियाहँसिकहमैनितहिवारि।मोहिंऐसितरुणिकहुकौनिनारि १
बुड़िया जो मायाहै सो हँसिकै कहैहै कि मैं नित्यही बारीहौं माया अनादि
है यातै बुढ़िहाकह्यो है तामें प्रमाण ॥ “अजामेकांलोहित” इत्यादि । औ
हँसिकै कह्यो यातै या आयो कि साधनकरिकै छोटे छोटे या कहै हैं कि, हमको
माया जीर्ण ह्वैगई है अर्थात् अब छूटि जाइहै मैं नित्यही बारीहौं सबके
कार्य रूपते उत्पन्न होत रहौं हौं । औ मोहिं अस तरुणि कौनि नारि है जो
सब जीवनको संग करौं हौं और बुढ़ाउँ कबौं नहीं ॥ १ ॥
दांत गये मोर पान खात।औ केश गयल मोर गंग नहात॥२॥
औ दांत गये पान खात जो कह्यो सो पान जो है वेद ताको तात्पर्य जो
जानै है यही खाब है । सो वेद तात्पर्यार्थ जानेते कामादिकजे मेरे दांतहैं
जिनते जीव सज्जनन्को ज्ञानखाय लेइहै ते दांत मेरे जातरहे काम क्रोधादिक
मायाके दांतहैं तामें प्रमाण ॥ रत्नयोग ग्रंथ कबीरजीको ॥ “काम क्रोध लोभ
मोह माया । इन दांतनसौं सब जग खाया ” ॥ औ साहबको जो कथा चरित्र
रूप गंगा तामें जो नहायहै अर्थात् सुनै है सो कुमति रूप केश मेरे जातरहे हैं॥२॥
औनयनगयलमोरकजलदेत । अरुबैसगयलपरपुरुषलेत ३
साहबको ज्ञानरूप कज्जल जो कोई दियो तो मेरे नयन जो निरंजनहैं
सो जातरहे हैं । अर्थात् चैतन्यके योग करिकै माया देखै है औ । नयनको
निरंजन कहै हैं । तामेंप्रमाण कबीरजीको ॥ “नयन निरंजन जानि भरममें
मतपरै” ॥ औ बैस जो मोर है सो परम पुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको
लेत अपने बशकै बैस मोर जात रहे है अर्थात् चारिउ शरीर मोर
नहीं रहतेहैं ॥ ३ ॥
औ जान पुरुषवा मोर अहारा।मैं अन जानेको कर शँगार ४
औ जान पुरुषवा कहे जो या कहैहैं कि, हम ब्रह्मको जानिलियो, हमहीं
ब्रह्म हैं । तेतो हमार अहारहीहैं आपने आत्मैको भूलिगये औ अजान जे हैं
तिनको शृंगारै किये हैं नाना विषदैकै लोभाय लेउहौं । अर्थात् जानौ अजानकों
बसंत । (४८९)
विद्या अविद्या रूपीते बशकरि लियोहै धुनि याहै, जिनको साहब आपनों
हंसरूप दियो है तेई बचे हैं या उपसंहार कियो ॥ ४ ॥
कह कबीर बुढ़िया अनँद गाय।पूत भतारहि बैठि खाय॥५॥
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि बुढ़िया जो माया है सो जैसो या पद कहि
आये तैसो आनंदसों गावैहै । वेद शास्त्रादिकनमें वाणीरूपते सबजीव सुनैहैं
परन्तु या नहीं जानैहैं कि, जीव औ ब्रह्म माया के भितरै है । पूत जो जीव
है औ भतार जो ब्रह्महै ताको बैठिखाय है अर्थात जबजीव संसारी भयो तब
संसारमें डारिकै खायो जब ब्रह्म में लीनभयो औ सृष्टि समय आयो तब वा
ब्रह्मज्ञानहूं नहीं रहि जाइहै ब्रह्महूंको खायो ॥ ५ ॥
इति चौथा बसंत समाप्त ।
अथ पांचवां बसंत ॥ ५ ॥
तुम बूझहु पण्डित कौन नारि ।
कोइ नाहिं विआहल रहल कुमारि ॥ १ ॥
यहि सब देवन मिलि हरिहि दीन्ह ।
तेहि चारिहु युग हरि संग लीन्ह ॥ २ ॥
यह प्रथमहि पद्मिनि रूप आय ।
ह्वै सांपिनि सब जग खेदि खाय ॥ ३ ॥
या वर युवती वे वारनाह।अति तेज तिया है रैनि ताह ॥ ४ ॥
कहकबीर सबजगपियारि । यह अपनेवलकवैरहलमारि ॥५॥
तुमबूझहुपंडितकौननारि।कोइनाहिंविआहलरहलकुमारि १
यहि सबदेवनमिलि हरिहिदीन्ह।तेहिचारिहुयुगहरिसंगलीन्ह२
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, हे पण्डित ! तुम बूझौ तौ या शङ्खिनी हस्तिनी
चित्रिणी पद्मिनी चारि प्रकारकी नारिनमें कौन नारिहै या माया है ? अर्थात एकौकें
( ४९० ) बीजक कबीरदास ।
लक्षण नहीं मिलत एकौके लक्षण जो मिलते तौ कुमारि न रहती बिबाहि
जाती याहीते अब तक कुमारि है ॥ १ ॥ जब समुद्र मथिगयो लक्ष्मीकढ़ी सो
सबदेवमिलि हरिको देतभये सो हरि चारिहुयुग सङ्गही राखतभये ॥ २ ॥
यह प्रथमहि पद्मिनिरूपआयाहै सांपिनिसब जग खेदि खाय
याबर युवती बे वार नाह । अति तेज तिया है रैनि ताह ॥४॥
प्रथमतो ब्रह्मजे हैं विष्णु तिनकी नाभिमें कमलिनीहै सो लक्ष्मी रूपहै सो
आय अब धन रूप सांपिनि है संसारको खेदिखाय है ॥ ३ ॥ या माया बरयुवती
है कहै श्रेष्ठ है बार जे लरिका ब्रह्मा विष्णु महेश तेई याके नाह हैं औ ताह
कहै तौन जो संसार रूपी रैनि है तौने में अति तेजहै ॥ ४ ॥
कह कबीर सब जगपियारियह अपने बलकवै रहल मारि ५
. सो श्रीकबीरजी कहैं हैं कि या माया सबजगतको पियारिहै आपन बाल-
क जे जीव तिनको मारि रही है अर्थात् सब जीवनको बांधे है जनन मरण
करावै है ॥ ५ ॥
इति पांचवां बसंत समाप्त ।
अथ छठवां बसंत ॥ ६ ॥
माई मोर मनुष है अति सुजान। धंधा कुटि कुटि करै बिहान १
बड़े भोर उठि अँगन वहार । बड़ी खांच लै गोबर डार ॥२॥
बासी भात मनुष ल खाय । बड़ घैला लै पानी जाय ॥३॥
अपने सैंयां बांधी पाट । लैरे बेंचौ हाटै हाट ॥ ४ ॥
कह कबीर ये हरिकेकाज । जोइयाके ढिंगर कौन है लाज ५
जीव शक्ति कहै है कि, हे माई माया ! मोर मनुष जो मन सो बड़ा
सुजान है ! धंधा जो बाल पौगंड किशोर ताहीको कूटिकूटि कहै कैकै बिहान-
कहै देहांत कै देइहै । सुजान याते कह्यो कि, मोको नहीं जान देइहै । आपही
बसंत । ( ४९१ )
जानै है बड़े भोर कहे जबदूसर भयो तब आंगन बहार कहे गर्भवासमें ज्ञान-
दियो अंतःकरण साफकियो यहीबहारबो है औ बड़ीखांच जो प्रसूत वायु तौनें-
ते गर्भरूप गोबरटारचो अर्थात् बाहर निकारचो । औ बासीभात जो पूर्व कर्म
ताको दुःख सुख आपही भोगै है । औ थैलाजो बुद्धिहै ताको लैके गुरुवन कें
यहां नाना बानी रूप पानी ताको लेनजाइ है अर्थात् बुद्धिते निश्चयकरै है ।
ऐसोजो मोर सैंयां है ताको पाट जो ज्ञान तामें बांधे पाऊं तौ हाट हाट में बेंचौं
अर्थात् साधुनको संगकरिकै अपनो औ याको सम्बन्ध छोड़ायदेउँ । सो श्रीकबी-
रजी कहैं हैं कि, जोइया जो जीव तौनेको ढिंगरा जोमन सो हरि जे श्रीरामचन्द्र
तिनको काज में जो नहीं लागे तौ याको कौन लाज है । धुनि या है जो साह-
बमें लगै तौ यहु शुद्ध होइजाय ॥ १-६ ॥
इति छठवां बसंत समाप्त ।
अथ सातवां बसंत ॥ ७ ॥
घरहीमें बाबुल बढ़ी रारि।अँग उठि उठि लागै चपल नारि १
वह बडी एक जेहि पांच हाथ।तेहि पचहुनके पच्चीस साथ २
पच्चीस बतावैं और और । वे और बतावै कई ठौर ॥ ३ ॥
सो अंतर मध्ये अंत लेइ । झकझोलि झुलावै जीव देह ॥ ४ ॥
सब आपन आपन चहैं भोग । कहु कैसे परिहै कुशल योग ५
विवेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमाशा देख सोइ ६
मुख फारिहँसैं सब राव रंक । तेहि घेरे न पैहौ एक अंक ॥७॥
नियरे बतावैं खोजैं दूरि । वह चहुँ दिशि बागुरि रहल पूरि ८
द्वै लक्ष अहेरी एक जीउ । ताते पुकारै पीउ पीउ ॥ ९ ॥
अबकी वारै जो होय चुकावा। ताकी कबीर कहपूरिदाव १०