कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४७७ )
ऐसे ओऊ सच्चिदानंद रूपहैं मैं न बालकहौं न वृद्धहौं सदा किशोररूप बन्यों
रहौहौं औ न मोरे चेलिकाई कहे कोऊ वह उपदेश्य नहीं है अर्थात् अज्ञानी
कोऊ नहीं हैं सब मेरे रूपको जानैं हैं वहां राति दिन नहीं है तामें प्रमाण ॥
“न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम
परमं मम ” ॥ ३ ॥
तिरबिध रहौं सबनमें बरतौं नाम मोर रमराई हो ।
पठये न जाउँ आने नहिं आऊं सहज रहौं दुनियाई हो॥४॥
तिरबिध रहौं कहे जीव ब्रह्म ईश्वरनमें जो अंतर्यामी रूपते रहौहौं औ
सबनमें बरतौं कहे माया काल कर्म सुभाव इन में जो अंतर्यामी रूपते रहौहौं
सो इनमें जो रमनवारो अंतर्यामी मेरो रूप ब्रह्म ताहूको मैं राईहौं सो पठयें
नहीं जाउहौं न आनेते आऊंहौं अर्थात् जो कहूं नहोउं तौ ना आनै आऊँ
न पठये जाउँ सर्वत्रै तो हौं सो यही रीतिते सहजही या दुनियामें अंतर्यामीके
अंतर्यामी रूपते पूर्णहौं ॥ ४ ॥
जोलहा तान बान नहिं जानैं फाट बिनै दश ठाईहो ।
गुरु प्रताप जिन जैसो भाष्यो जन विरले सुधि पाई हो॥५॥
जोलहा जे हैं जीव ते तान बान नहीं जानैं अर्थात् वा हंसस्वरूप पोसाक
बनै नहीं जानैं जो पहिरिके मेरे समीप आवै फाटबिनै दश ठाई कहे दशहैं
छिद्र जिनमें ऐसो जो शरीर ताहीको बिनै है कहे नाना मतनमें परिकै वही
कर्म करैहै जामें अनेक जन्म शरीर धारण करत जायहै जो कहो कोऊ जान-
तही नहीं है तौ गुरुके प्रतापते जो कोऊ मेरो रूप भाष्यो है जैसो सो तौ कोई
बिरला जन सुधि पायो है अर्थात् जाको सत्गुरु मिल्यो है सोई पायों है ॥५॥
अनंत कोटि मन हीरा वेध्यो फिटकी मोल न आईहो ।
सुर नर मुनि वाके खोज परैहैं किछु किछु कबीरन पाईहो ६
अनंत कोटि जे जीव हीराहैं तिनमें मन बेध्यो है सो या हीरारूप
जीवको फिटिकिरिउ को मोल न रहिगयो सो सुर जे हैं मुनि जे हैं नर जेहैं