कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७६ ) बीजक कबीरदास ।
गुरुमुख ।
मैं सबमें हौं औ सब न होउँ ऐसे मोको बिलग बिलग कहे जुदा जुदा
बिलगाइकै बेद कह्यो । इहां दुइबार बिलग बिलग कह्यो सो एकतो चित् कहै
जीव ब्रह्म ईश्वर अचित् कहै माया काल कर्म सुभाव पृथ्वी आदिक मायाके
कार्य सब सो ये दोहुनमे अंतर्यामी रूपते व्यापक है। सो जीव ब्रह्म ईश्वर चित्
तत्त्व में व्यापक हौं तामेंप्रमाण ॥ “विष्णुवायुत्तमदेहेषु प्रविष्टो देवताभवत् ।
मर्त्याद्यधर्मदेहेषु स्थितो भजति देवताः”॥इति श्रुतिः।“एको देवः सर्वभूतेषुगूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतांतरात्मा इति श्रुतिः” ॥ “ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहमिति गीता-
याम्॥” अचितौमें व्यापक है तामेंप्रमाण॥ “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थि-
तो जगत् इति गीतायाम्”॥सो चित्अचित्दोऊ व्याप्यपदार्थ हैं व्यापक मैं हौं
सो चित् अचित्रूप पिछौरा दुइ छोरिया मेरो ओढ़नहै सर्वत्र महींहौं सो वेद
को तात्पर्य न जानिकै लोग यकताई बोले हैं कि एकई ब्रह्म है पिछौरा ओटै
याको एकही कहै हैं दूसरा नहीं कहै हैं लोगजो यकताई कहैहैं सो कौनी तरह
ते कहै है सो कहै हैं ॥ १ ॥
एक निरंतर अंतर नाहीं ज्यों घट जल शशि झांईहो ।
यक समान कोइ समुझत नाहीं जरा मरण भ्रम जाईहो॥२॥
वहीं ब्रह्म निरंतर एक सर्वत्र है या लोग बोलै हैं सो कहा अन्तर नहीं है अर्थात्
अन्तरहै कैसे जैसे जलभरे घटनमें शशिकी छाया वामें व्याप्य व्यापक बनो है सो एक
जो मैं सो समान कहे सबमें समव्यापकहौं ताको कोई व्याप्य व्यापक कोई नहीं
समुझै है तौ कहा उनको जरा मरण भ्रम जाइहै अर्थात् नहीं जाइहै सो अंतर्यामी
रूपते व्यापक साहब कहि चुके अब निज रूपते जहाँ रहै हैं तहांकी बात कहै हैं॥२॥
रैनि दिवस में तहँवों नाहीं नारि पुरुष समताईहो ।
नामैं बालक नामैं बूढ़ो ना मोरे चेलिकाईहो ॥ ३ ॥
जहांमैं रहौ हौं तहां न रातिहै न दिनहै औ सब नारी रूपहैं जो पुरुषहू जाईहै
सो नारिन रूपते रासमें प्राप्त होइहै पुरुष महींहौं औ समताई है जैसे सच्चिदानन्दरूप