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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 534

( ४८८ ) बीजक कबीरदास ।
बुढ़ियाहँसिकहमैनितहिवारि।मोहिंऐसितरुणिकहुकौनिनारि १
बुड़िया जो मायाहै सो हँसिकै कहैहै कि मैं नित्यही बारीहौं माया अनादि
है यातै बुढ़िहाकह्यो है तामें प्रमाण ॥ “अजामेकांलोहित” इत्यादि । औ
हँसिकै कह्यो यातै या आयो कि साधनकरिकै छोटे छोटे या कहै हैं कि, हमको
माया जीर्ण ह्वैगई है अर्थात् अब छूटि जाइहै मैं नित्यही बारीहौं सबके
कार्य रूपते उत्पन्न होत रहौं हौं । औ मोहिं अस तरुणि कौनि नारि है जो
सब जीवनको संग करौं हौं और बुढ़ाउँ कबौं नहीं ॥ १ ॥
दांत गये मोर पान खात।औ केश गयल मोर गंग नहात॥२॥
औ दांत गये पान खात जो कह्यो सो पान जो है वेद ताको तात्पर्य जो
जानै है यही खाब है । सो वेद तात्पर्यार्थ जानेते कामादिकजे मेरे दांतहैं
जिनते जीव सज्जनन्को ज्ञानखाय लेइहै ते दांत मेरे जातरहे काम क्रोधादिक
मायाके दांतहैं तामें प्रमाण ॥ रत्नयोग ग्रंथ कबीरजीको ॥ “काम क्रोध लोभ
मोह माया । इन दांतनसौं सब जग खाया ” ॥ औ साहबको जो कथा चरित्र
रूप गंगा तामें जो नहायहै अर्थात् सुनै है सो कुमति रूप केश मेरे जातरहे हैं॥२॥
औनयनगयलमोरकजलदेत । अरुबैसगयलपरपुरुषलेत ३
साहबको ज्ञानरूप कज्जल जो कोई दियो तो मेरे नयन जो निरंजनहैं
सो जातरहे हैं । अर्थात् चैतन्यके योग करिकै माया देखै है औ । नयनको
निरंजन कहै हैं । तामेंप्रमाण कबीरजीको ॥ “नयन निरंजन जानि भरममें
मतपरै” ॥ औ बैस जो मोर है सो परम पुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको
लेत अपने बशकै बैस मोर जात रहे है अर्थात् चारिउ शरीर मोर
नहीं रहतेहैं ॥ ३ ॥
औ जान पुरुषवा मोर अहारा।मैं अन जानेको कर शँगार ४
औ जान पुरुषवा कहे जो या कहैहैं कि, हम ब्रह्मको जानिलियो, हमहीं
ब्रह्म हैं । तेतो हमार अहारहीहैं आपने आत्मैको भूलिगये औ अजान जे हैं
तिनको शृंगारै किये हैं नाना विषदैकै लोभाय लेउहौं । अर्थात् जानौ अजानकों