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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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बसंत । (४८९)

विद्या अविद्या रूपीते बशकरि लियोहै धुनि याहै, जिनको साहब आपनों
हंसरूप दियो है तेई बचे हैं या उपसंहार कियो ॥ ४ ॥
कह कबीर बुढ़िया अनँद गाय।पूत भतारहि बैठि खाय॥५॥
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि बुढ़िया जो माया है सो जैसो या पद कहि
आये तैसो आनंदसों गावैहै । वेद शास्त्रादिकनमें वाणीरूपते सबजीव सुनैहैं
परन्तु या नहीं जानैहैं कि, जीव औ ब्रह्म माया के भितरै है । पूत जो जीव
है औ भतार जो ब्रह्महै ताको बैठिखाय है अर्थात जबजीव संसारी भयो तब
संसारमें डारिकै खायो जब ब्रह्म में लीनभयो औ सृष्टि समय आयो तब वा
ब्रह्मज्ञानहूं नहीं रहि जाइहै ब्रह्महूंको खायो ॥ ५ ॥
इति चौथा बसंत समाप्त ।
अथ पांचवां बसंत ॥ ५ ॥
तुम बूझहु पण्डित कौन नारि ।
कोइ नाहिं विआहल रहल कुमारि ॥ १ ॥
यहि सब देवन मिलि हरिहि दीन्ह ।
तेहि चारिहु युग हरि संग लीन्ह ॥ २ ॥
यह प्रथमहि पद्मिनि रूप आय ।
ह्वै सांपिनि सब जग खेदि खाय ॥ ३ ॥
या वर युवती वे वारनाह।अति तेज तिया है रैनि ताह ॥ ४ ॥
कहकबीर सबजगपियारि । यह अपनेवलकवैरहलमारि ॥५॥
तुमबूझहुपंडितकौननारि।कोइनाहिंविआहलरहलकुमारि १
यहि सबदेवनमिलि हरिहिदीन्ह।तेहिचारिहुयुगहरिसंगलीन्ह२
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, हे पण्डित ! तुम बूझौ तौ या शङ्खिनी हस्तिनी
चित्रिणी पद्मिनी चारि प्रकारकी नारिनमें कौन नारिहै या माया है ? अर्थात एकौकें