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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 530

( ४८४ ) बीजक कबीरदास ।
तामें दुनियाहै कि, औरै देवतन की उपासनामें बड़ों ऐश्वर्य्य प्राप्तिहोइहै यह
पोथिनमें पढ़ि पढ़ि भुलाइगयो । वाहूको जीभैभरेते कह्यो कछु प्राप्ति नहीं भै
सो तुम फेरि यमके अंत कहे संसारमें परिहौ । औ जो लेहू पाठहोय तौ रस-
नामें श्रीबसंतको पढ़िलेहुनहीं तो पुनि यमके अंत कहे फंदमें परिहौ ॥ १ ॥
जो मेरु दंड पर डंक दीन्ह। सो अष्ट कमल परजारि लीन्ह२
औ जो या गुमान करो कि हम योगबारे हैं हम यमके अंतमें न परैंगे ।
सो जो तुम मेरुदंडमें प्राणखैंचिकै मेरुदंडपर डंका दीन्ह्यो, औ अष्टजो हैं आठों
कमल मूलाधार, विशुद्ध, मणिपूरक, स्वाधिष्ठान, अनहद, आज्ञाचक्र, सहस्रा-
रचक्र, अठयें सुरतिकमल जहां परमपुरुषहै तामें पहुंचिकै जारि दीन्ह अर्थात्
योगौ की खबरि भूलिगई ॥ २ ॥
तहँ ब्रह्म अग्नि कीन्हो प्रकास।तहँ अद्धो ऊर्ध्व वहती बतास३
तहँनवनारीपरिमलसोगाँव।मिलिसखीपांचतहँदेखनजावँ४
सो वा ज्योतिमें लीनभयो जीवतहँ ब्रह्मअग्नि प्रकाश करत भई औ बतास-
जो अधोऊर्ध्व श्वास सो वैह बहतभै अर्थात् बहिरे न आवत भै श्वास वहैं रहत
भै याभांति जीव तखतमें बैठि मालिक भयो गांवकारा बसंतदेखैहै ॥ ३ ॥ सो-
यहां परिमल कहे गंधका गांव है शरीरमें पृथ्वीतत्त्व अधिकहै सो गंधका गांव
शरीरहै तौने में नौ नारी हैं कहे नौ राहहैं तहां पांचो जे ज्ञानेन्द्री हैं तेई सखी
देखन जायहैं अर्थात् वहैं लीन ह्वै गई हैं ॥ ४ ॥
तहँ अनहद बाजा रहल पूरि।तहँ पुरुष बहत्तरि खेलैं धूरि॥५॥
तैं माया देखिकस रहसिभूलि।जसवनस्पतीवनरहलफूलि ६
बसंतमें बाजा बजै है सो अनहद बाजा जहां पूरि रह्यो है तहां बहत्तरि
पुरुष जे बहत्तरिकोठाहैं ते धूरि खेलैहैं अर्थात् चैतन्यता न रहिगै ॥ ५ ॥ सो
बसंतमें बनस्पती फूलै हैं ऐसे या माया फूलि रही है । तामें समाधि उतरे
फिरि काहे भूले । अथवा जैसे बनस्पतीफूलैहैं ऐसे गैवगुफामें सुधापीकै नागिनी
फूली है तामैंतैं काहे भूलिरहै है । कहा वा माया के बहिरे है समाधि नागिनि-
हीके आधार तो समाधिउहै ॥ ६ ॥