कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ बसंत ।
पहिला बसंत ॥ १ ॥
जहँ वारहि मास बसंत होय।परमारथ बूझै विरल कोय॥१॥
जहँ वर्षै अग्नि अखंड धार।बन हरियर भो अट्ठार भार २॥
पनिया अन्दर तेहि घेरे न कोय।वह पवन गहे कश्मल न धोय३
बिनुतरुवरजहँ फूलो अकास।शिव औविरंचि तहँ लेहिंवास४
सनकादिक भूले भवँर भोय । तहँ लख चौरासी जीव जोय५
तोहिं जो सतगुरु सत सो लखाव।तुम तासु न छांड़हु चरणभाव
वहअमरलोकफललगे चाय।यह हक कबीर बूझै सो खाय७
जहँ बारहि मास बसंत होय। परमारथ बूझै विरल कोय॥ १॥
जहँ वर्ष अग्नि अखंड धार । वनहरियर भो अट्ठार भार २
जाके कहे जौने साहबके लोकमें बारहौ मास बसंत बनो रहै है सो या
परमार्थ कोई बिरला बूझै है। सो वा रूपकातिशयोक्ति अलंकार करिकहै हैं॥१॥
औ बसंत ऋतुमें सूर्यते अग्नि बर्षै है अखंडधार बन जो है अठारह भार बन-
स्पती सो हरियर होतजाइ हैं औ साहबके लोकमें कोटिन सूर्यको प्रकाशहै
परंतु सबको ताप हारि लेनवारो है बहांके सब बन संतानक आदिक हरियर
रहैं ॥ २ ॥
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