सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 528

( ४८२ ) बीजक कबीरदास ।
पनिया अंदर तेहि धरे न कोय।वह पवन गहेकश्मल न धोय
बिनु तरुवर जहँ फूलोअकासा।शिव औ विरंचितहँ लेहिंबास
औ बसंत ऋतुमें बृक्षनके अंदरनमें कोई पानी नहीं धरै है चन्द्र जो है सो
अमृतको श्रवै है ताहीको गहे पवन वृक्षनके कश्मलको धोयडारै है ।
औसाहबको लोक कैसो है कि, पनिया अंदर कहे वा रसरूपहै ताको कोई नहीं
जानैहै । वही रसरूप लोकको स्मरण पवनहै ताके गहे कहे कियेते कश्मल जे
पाप हैं ते धोय जात हैं । अथवा कामादि जे कश्मलहैं ते धोय जात हैं
॥ ३ ॥ औ बसंत ऋतुमें जहां तरुवर नहीं हैं ऐसो जो आकाश सोऊ पुहुपन
के परागन करिकै फूलो देखो परै है । कैसो है आकाश जहां शिव विरंचि
बास लेहि हैं अर्थात् वासकीन्हे हैं सुगंधित द्वैरह्यो है । औ साहबको लोककै-
साहै कि जेहिका प्रकाश चैतन्याकाश, बिना तरुवरै जगतरूप फूलफूलैहै शिव
विरंचिआदिक बास लेहिंहैं ॥ ४ ॥
सनकादिक भूले भवँर भोयातहँ लख चौरासी जीव जोय५॥
बसंत ऋतुमें चौरासी लाख योनि जीवनकी कौन गनती । सनकादिक जे
मुनि हैं तेऊ पुष्पमकरंद में भोयकै भवँरकी नाइ भूलि जाहिंहैं । औ साहबको
लोकमकाश ब्रह्म कैसाहै कि, सनक सनन्दन सनत्कुमार जाके भवँर में भोयकै
कहे परिकै भूलै हैं चौरासीलाख योनि जीवनकी कौनगिनती है ॥ ५ ॥
तोहिंजोसतगुरुसतकैलखाव।तुमतासुनछाड़हुचरणभाव६॥
वहअमरलोकफललगेचाय।यहकहकबीरबूझै सोखाय॥७॥
सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, ऐसो जो साहब को लोक जहां बरहौ मास
बसंत बनो रहै है तौन जो सतगुरु कहे साहबके बतायदेनवारे तोको सत्यकै-
लखायो होय तो तुम ताके चरणको भाव न छांड़ौ । भाव यहहै कि, वा लोक
के मालिक जो साहब हैं तिनहूंको बताय देइँगे । वह अमरलोक कैसा है कि,
जहां चारिउ फल अर्थ धर्म काम मोक्ष आनंदैकै फल लगेहैं । सो हे जीवो !
या बात जो कोई बूझैहै सोई खायहै । साहब के धाम में बारहा मास बसंत-
रहै है । तामें प्रमाण कबीरजीकी साखी ज्ञानसागरकी ॥ “सदा बसंत होत