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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 537

बसंत । ( ४९१ )
जानै है बड़े भोर कहे जबदूसर भयो तब आंगन बहार कहे गर्भवासमें ज्ञान-
दियो अंतःकरण साफकियो यहीबहारबो है औ बड़ीखांच जो प्रसूत वायु तौनें-
ते गर्भरूप गोबरटारचो अर्थात् बाहर निकारचो । औ बासीभात जो पूर्व कर्म
ताको दुःख सुख आपही भोगै है । औ थैलाजो बुद्धिहै ताको लैके गुरुवन कें
यहां नाना बानी रूप पानी ताको लेनजाइ है अर्थात् बुद्धिते निश्चयकरै है ।
ऐसोजो मोर सैंयां है ताको पाट जो ज्ञान तामें बांधे पाऊं तौ हाट हाट में बेंचौं
अर्थात् साधुनको संगकरिकै अपनो औ याको सम्बन्ध छोड़ायदेउँ । सो श्रीकबी-
रजी कहैं हैं कि, जोइया जो जीव तौनेको ढिंगरा जोमन सो हरि जे श्रीरामचन्द्र
तिनको काज में जो नहीं लागे तौ याको कौन लाज है । धुनि या है जो साह-
बमें लगै तौ यहु शुद्ध होइजाय ॥ १-६ ॥
इति छठवां बसंत समाप्त ।
अथ सातवां बसंत ॥ ७ ॥
घरहीमें बाबुल बढ़ी रारि।अँग उठि उठि लागै चपल नारि १
वह बडी एक जेहि पांच हाथ।तेहि पचहुनके पच्चीस साथ २
पच्चीस बतावैं और और । वे और बतावै कई ठौर ॥ ३ ॥
सो अंतर मध्ये अंत लेइ । झकझोलि झुलावै जीव देह ॥ ४ ॥
सब आपन आपन चहैं भोग । कहु कैसे परिहै कुशल योग ५
विवेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमाशा देख सोइ ६
मुख फारिहँसैं सब राव रंक । तेहि घेरे न पैहौ एक अंक ॥७॥
नियरे बतावैं खोजैं दूरि । वह चहुँ दिशि बागुरि रहल पूरि ८
द्वै लक्ष अहेरी एक जीउ । ताते पुकारै पीउ पीउ ॥ ९ ॥
अबकी वारै जो होय चुकावा। ताकी कबीर कहपूरिदाव १०