कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ४५२ ) बीजक कबीरदास ।
यकतो अनिष्ट पांय परि विनवै विनती किये न मानै हो ।
अनचिन्ह रहे कियो न चिन्हारी सो कैसे पहिचानै हो ७
एक जे साहब हैं सबके रक्षक तिनते ये अनिष्ट रहे कहे उनको इष्ट न
मानत रहे । औ वहां यमदूतनसों पांय परि परि विनवै है, सब देवननते विनवै
हैं, वे बिनतीहू किये नहीं मानैहैं । काहेते कि, दयाहीन हैं । औ साहब जें
दयालु छुड़ावनवारे तिनसों अन चिन्हार रहे चिन्हारी न कियो सो कैसे अब
पहिचानै । भाव यह है कि जो, अजहूं स्मरणकरो तौ साहब छुड़ाइही
लेइगो ॥ ७ ॥
लेइ बुलाय बात नहिं पूछै केवट गर्भ तन बोलै हो ।
जेकरी गांठि सबल कछु नाहीं निराधार है डोलै हो८
औ केवट जे गुरुवा लोगहैं ते तब तो गर्भ कहे अहंकार तनमें कैकै तुमको
बोलाय अपने मतमें मिलाय लीन्हेनि । अब जब यमदूत मारन लगे तब
तुमको बात नहीं पूछै हैं । गुरुवा लोग सो जाके सबल कहे खर्च राम नाम
रह्यो सो पार भयो औ जाके राम नाम सबल कछु नहीं रह्यो सो निराधार
कहे रक्षक रहित यमपुरमें डोलैहै अथवा निराधार जो ब्रह्म ताहीम डोलैहै॥८॥
जिन सम युक्ति अगमनकै राखिन घरणि मांझ घर डेहरिहो।
जेकरे हाथ पाउँ कछु नाहीं धरन लागु तन सेहरि हो ॥ ९ ॥
जौने स्त्री पुत्रादिकन को नाना युक्तिकैकै पालन कियोहै तौन घरणि कहे स्त्री
शरीर छूटे डेहरी भरि जायहै आगे नहीं जायहै । सम जो पाठहोय तौ जिनका
अपने सम बनाय राखिन तौन स्त्री डेहरीलौं पहुंचाई है । धुनिते या आयो कि
पुत्र चिता लौं जायहै सो जेकरे हाथ पाउँ कछु नाहीं कहे जेकरे हाथपाउँ नहीं
है ऐसो जो जीवात्मा ताको जब यमदूत धरनलागु तब तनमें सेहरि है आवै है
तन विकल है जाइहै, वे कोऊ नहीं सहाय करैं हैं । ताते साहबको जानौ जो
कहो यमदूतै कैसे धरेंगे ? तौ लिंग शरीरते धरेंगे अर्थात् जाको जैसो कर्म है
बाके संस्कारते वा लोकमें कर्म शरीर बनैहै ॥ ९ ॥
कहरा । ( ४५३ )
पेलना अक्षत पेलि चलु बौरे तीर तीर कहँ तोवहु हो ।
उथले रहौ परौ जनि गहिरै मति हाथै कै खोवहु हो १०
: सो कबीरजी कहैहैं कि, पेलना जो राम नाम सो अक्षत बनै है ताकों संसार
समुद्रमें पेलिकै हे जीव ! संसारसमुद्र उतरिजा । तीर तीर कहे नाना मतनको
का टोवत फिरै है उथले में रहौ अर्थात् साहब को ज्ञान कीन्हे रहौ । गहिर
जो धोखा ब्रह्म कठिन तामें न जाउ । वहां गये तुम्हार हाथहुको जीवत्त्व सों
जातरहैगो ताते तुम न खोवौ उथले कहे साहबको ज्ञान जानौ ॥ १० ॥
तरकै घाम ऊपरकै भूभुरि छांह कतहूं नहिं पावहु हो ।
ऐसो जानि पसीजहु सीजहु कस न छतरियाछावहुहो ११
तरके घाम कहे नाना कर्म जे नीकौ नागा कियो ताकी जो ताप संसारमें
ऊपरकी भूभुरि कहे नरक में गये तौ वहौं तपै है, स्वर्ग में गये तौ गिरनकी
भय बनी है, काहू को अधिक ऐश्वर्य देख्यो तो ईर्षा बनी रहैहै कि, ऐसो
कर्म हम न किये । ये दोऊ तापमें साहबको ज्ञान रूप छांह कतहूं नहीं पावैहै
ऐसो तुम जानतौहौ पै वही में पसीजौ हौ कहे श्रम करौ हौ पसीना चलैहै औ
छीजौहौ साहबकी ज्ञान रूप छतरिया काहे नहीं छावहुहौ ॥ ११ ॥
जो कछु खेल कियो सो कीयो बहुरि खेल कस होई हो ।
सासु ननँद दोउ देत उलाटन रहहु लाज मुख गोई हो १२
जो कछु खेल कियो कहे जो कछु कर्म कियो सोई भोग कियो । अथवा
जौन खेल माया ब्रह्मको साथ करिकै कियो सोई फल भोग कियो । सो बिना
राम नाम लीन्हे इनको छोड़िकै फेर खेल कियो चाहौ मुक्तिवाला सो कैसे
होइगो । सासु जो है मूल प्रकृति औ ननँदि जो है विद्या माया सो ये दोनों
तुमको उलाटन कहे उलटिकै जवाब देइहै कि, बिद्या माया करिकै मुमुक्षुहै
मुक्तिकी इच्छा करत रह्यो । सो अब हम तुमहींको लपेटि लियो तुम हमकों
त्यागत रह्यो है अब नहीं छूटि सकौहौ । या जवाब सुनि तुम लाजिकै मुखगोइ
रहौहौ लाचार ह्वै छूटि नहीं सकौहौ ॥ १२ ॥
( ४५४ ) बीजक कबीरदास ।
गुरु भो ढील गोन भो लचपच कहा न मानहु मोरा हो ।
ताजी तुरकी कबहूं न साजेहु चढ़े न काठके घोरा हो ॥१३॥
जो गुरुवा लोग तुमको उपदेश कियो ते गुरु ढील है गये काहेते कि, जौन
जौन उपासना की गोन तुम्हारे ऊपर लादि दियो तेते देवता लचपच हैगयें
कहे उनके छुड़ायेते ना छूटे संसारमें परे जाय । देवता के फुरते न उत फुर होइहै
नइत; जब देवतै न फुरे तब गुरुवा ढील परिगयो । सो कबीरजी कहै हैं कि,
जो मैं कहत रह्यो सो तुम ना मान्यो कि, रकार मकार जपौ याहीते छूटौगे
ताजी तुरकी जो रकार मकार ताको कबहूं न साज्यो कहे कबहूं राम नाम
ना लियो जो साहबके पास लैजाय । काठको घोरा जो है मन जड़ तामें चढ़यो
सो कूदिकै संसार गाड़में डारि दियो जो ताजी तुरकी रामनाम तामें चढ़त्यो
तौ तुमको कूदिकै साहब के पास पहुंचावतो ॥ १३ ॥
ताल झांझ भल बाजत आवै कहरा सब कोइ नाचै हो ।
जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये तेहि रंग दुलहिनि राचै हो १४
गुरुवा लोगनकी ओठ झांझ है औ जीभ ताल देइहै वही ब्रह्मही में ताल
देइहै कहे नाना बाणी करिकै नाना मतन करिकै वही ब्रह्ममें चुवावै है ।
अथवा जाको जौन उपासना बतावै है ताको तौन इष्ट देवता है ताहीको ब्रह्म
कहैं हैं ताहीको सब कुछ कहैं हैं, उहै तालको मान देइहैं अर्थात् सब शास्त्रको
अर्थ वाहीमें पर्यावसानकरै हैं । और गुरुवनमें लगिकै सुखबाचक जौ कतौ न
हरा गये कहे परम पुरुष श्रीरामचंद्र को भूलि गये । संसार में सब जीव दुखि-
या है नाचन लगे । कोई रजोगुणी उपासनामें रचत भये, कोई तमोगुणी उपा-
सनामें रचत भये, कोई सतोगुणी उपासना में रचत भये । जेहि रंग दुलहा
जे उपासना वारे जीव ब्याहन आये कहे गुरुवा लोग जौन रंगमें लगायो तेहि
रंगमें दुलहिनि बुद्धि रचत भई ॥ १४ ॥
नौका अक्षत खेवै नहिं जान्यो कैसेहु लागहु तीरा हो ।
कहै कबीर राम रस माते जोलहा दास कबीरा हो ॥ १५ ॥
कहरा । ( ४५५ )
अक्षत नौका जो राम नाम है ताको खेवै न जान्यो कहे जौनै बिधिते संसार
सागरते पार कै देइ है सो विधि राम नाम जपिबेकी न जान्यो । सो कैसे
संसार सागरते पार ह्वैकै तीर लागौगे ? सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जोलहा
कहे जो कोई राम रस लहाहै अर्थात् राम रस पाय मातो है सोई संसार साग-
रको पार पायो है, सोई कायाको बीर जीव परम पुरुष श्रीरामचन्द्रको दास
भयो है । १ जो “ माते ” पाठ होय तो या अर्थ है कि, कबीरजी कहै हैं कि,
जातिको मैं जोलहा सो राम के रसमें मातेते मैं दास कबीर कहवावन लग्यो ।
पार्षदस्वरूप जो हंस स्वरूप याही शरीरमें पाय गयो, संसारको पार ह्वैगयो ।
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको दास ह्वै गयो । तुम ब्राह्मणादिक जो रामरस में मतौगे
तौकैसे संसारसागरते ना पार होउगे, पारही ह्वै जाउगे । कबीरजी रामरसमें
मतिकै बचिगये तामें प्रमाण ॥ सायरबीजकको ॥ “हम न मरैं मरिहै संसारा ।
हमको मिला जियावन हारा ॥ अब ना मरौ मोर मन माना । तेई मुवा जिन
राम न जाना ॥ साक्त मरै संत जन जीवै । भरि भरि राम रसायन पीवै” ॥ १५॥
इति पहिलाकहरा समाप्त ।
अथ दूसरा कहरा ॥ २ ॥
मति सुनु माणिक मति सुनुमाणिक हृदया वंदि निवारौहो १
अटपट कुम्हरा करै कुम्हरिया चमरा गाउ न बांचैहो ।
नित उठि कोरिया वेट भरतुहै छिपिया आंगन नाचैहो॥२॥
नित उठि नौवा नाव चढ़त है बरही वेरा वारिउ हो ।
राउरकी कछु खबरि न जान्यो कैसे झगर निवारिउहो॥३॥
१ याग्रन्थमें भी और और ग्रन्थनमें भी टीकाकार वारवार कबीरजीको अजन्मा कह
गये हैं संसारमें केवल साहबकी आज्ञाते आवै हैं ते कोई गर्भ ते उनको आवनो होय नही
है याते ऊपर को अर्थ ही ठीक है नीचे को अर्थ क्षेपक जानपरत है पीछे से कोई लिखि
दियो है ।
( ४५६ ) बीजक कबीरदास ।
एक गांवमें पांच तरुणि बसैं तिनमें जेठ जेठानी हो ।
आपन आपन झगर पसारिनि प्रियसों प्रीति नशानीहो ४
भैंसिन माहँ रहत नित बकुला तकुला ताकि न लीन्हाहो।
गाइन माहँ बसेउं नहिं कवहूं कैसेकै पद चीन्हा हो ॥५॥
पथिका पंथ बूझि नहिं लीन्हो मूढ़हि मूढ़ गवाराहो ।
घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु कैसे लगबेहु पाराहो ॥ ६ ॥
जत इतके धन हेरिनि ललइच कोदइतके मन दोराहो ।
दुइ चकरी जिन दरन पसारिहु तब पैहौ ठिक ठोराहो॥७॥
प्रेम बान एक सतगुरु दीन्ह्यो गाढो तीर कमानाहो ।
दासकबीर कियो यह कहरा महरा माहि समानाहो ॥८॥
मति सुनु माणिक मति सुनु माणिक हृदया बंदिनिवारोहो १
श्री कबीरजी कहैहैं कि हेजीव ! तैंतो माणिक है माणिक लाल होयहैं सोतैं
कहां संसारमें अनुराग करिकै लाल हैरहे साहब में अनुराग करि लाल होइ
गुरुवा लोगनकी वाणी तैं मति सुनु मतिसुनु आपने हृदयकी जो संसाररूपी
बंदि ताको निवारु ॥ १ ॥
अटपट कुम्हरा करै कुम्हरिया चमरा गाउ न वाचैहो ।
नित उठिकोरिया बेट भरतुहै छिपिया आंगन नाचैहो २॥
काहेते कि अटपट कुम्हरा जो या मन है सो कुम्हरिया करै है कहे नाना
शरीर रचैहै जैसे कुम्हार नाना बासन बनावै है ऐसे या मन नाना शरीर रचैहै
सो शरीर जो गाउं है तौन चमरा कालके मारे नहीं बचैहै मन रचत जाइहै
शरीर काल खात जाइ औ कोरिया जे मुनि लोग हैं सत रज तम ग्रन्थ प्रवर्त्त-
नवारे ते बेट भरतं हैं कहे बनावत जाइहैं तेई ग्रन्थनको लैके छिपिया जे
गुरुवा लोगहैं ते आंगन आंगन नाचै हैं अर्थात् चेला हेरत फिरै हैं नाना मतमें
होकै औरनको नाना मतमें लगावत फिरै हैं ॥ २ ॥
कहरा । ( ४५७ )
नित उठि नौवा नाव चढ़तहै वरही बेरा वारिउ हो ।
राउरकी कछु खबरि न जान्यो कैसेकै झगर निवारिउहो ३
नौवा जो संन्यासी जौन आपनो मूड मुड़ावैहै आनौ को मूड़ि कै चेला
बनाइ लेइहै सो वेषमात्र जो नाव तामें चढ़िकै संसार समुद्र पार होवा चाहै है
औ नाना देवतन प्रतिपाद्य जे ग्रन्थ तेई हैं बरही कहे बोझा ताहीको बेरा
रचि वारी जे नाना उपासना वारे हैं ते संसार समुद्रको पार होवा चाहै हैं । राउर
जो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्रको घर ताको जानतई नहीं या झगरा कैसेकै
निवारण होई । साहेबते तो चिन्हारिनि नहीं है कबहूं माया पकरि लेइहै कबहूं
ब्रह्म पकरि लेइहै कबहूं मन पकरिलेइ है इत्यादिक जेई पावैहैं तेई धरि
लेइ हैं सो कैसेकै झगड़ा निवारण होइ ॥ ३ ॥
एक ग्राममें पांच तरुणि बसैं तिनमें जेठ जेठानी हो ।
आपन आपन झगर पसारिनि प्रियसों प्रीति नशानीहो ४॥
एकगांव जो या संसार तामें पांच तरुणि जे ज्ञानेंद्री ते बसै हैं ज्ञानेंद्री कहेते
कर्मेंन्द्रिउ आइ गईं, तिनमें जेठ मन जेठानी माया है सोई दशौ इंद्री आपन
आपन झगर कहे अपने अपने विषय ओर मनको खैंचत भई सो मनके अधीनहै
जीव सोऊ वही कत चलो गयो परम पुरुष पर जे श्री रामचंद्र प्रीतम हैं तिन
सों प्रीति नशाइ गई ॥ ४ ॥
भैंसिन माहँ रहत नित बकुला तकुला ताकि न लीन्हाहो ।
गाइन माहँ बसेहु नहिं कबहूं कैसेकै पद चीन्हाहो ॥ ५ ॥
सो भैंसीजे दशौ इंद्री हैं तिनमें बकुला जो मन सो रहैहै जैसे भैंसी जब
जलमें पैरहैं तब बकुला वाके ऊपर बैठ रहैहै जो मछरी भैंसिनके किलनी
खाबेको आई सो बकुला खाय लीनो ऐसी इन्द्री जब विषय ओर चली तब
मनहीं भोग करै है इंद्रीद्वारा ताते मनको बकुला कह्यो है सो हे जीव ! तैंतो
तकुलाहै कहे ताकनवारो है काहे न ताकि लीन्हा औ साहब के गावन वारे
जे संत तिन गाइन में कबहूं बसबै न कियो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र को
पद कैसेकै चीन्हो ॥ ५ ॥
( ४५८ ) बीजक कबीरदास ।
पथिका पंथ बूझि नहिं लीन्हो मूढ़हि मूढ़ गवांराहो ।
घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु कैसेकै लगिहौ पाराहो ॥ ६ ॥
साहब जे श्रीरामचन्द्र तिनके पंथके चलनवारे जे पंथी संतजन तिनसों तौ
पंथ बूझि न लीन्हेउ मूढ़ जे गुरुवा लोग तिनकी बाणीमें परिकै मूढ़ हैगयो
गवांर हैगयो सो साहबके पहुंचबे को जो घाट ताको छोड़ि औघट जो माया
ब्रह्म तामें चलौहौ सो कैसे कै पार लागौगे ॥ ६ ॥
जतइतके धन हेरिनि ललइच कोदइतके मन दौराहो ।
दुइ चकरी जिन दरन पसारेहु तहँ पैहहु ठिक ठोराहो ॥७॥
जत इतके कहे जिनके जतदा चलै है सो जतइत कहावै है सो धोखा ब्रह्म
है जो सबको दरि दारै है सबको मिथ्यै मानै है तहां ललइच जे लालची हैं
ते धन जो मुक्ति ताको हेरिनि सो उहाँ न पाइन तब कोदइत जे गुरुवालोग
जिनके नाना उपासनारूपको दौरा जाय है तिनके इहांगये कि यहां मुक्तिधन
मिलैगो सो कबीर जी कहैं हैं कि जतइत के तो धनको ठिकानै न लग्यो तौ कोद-
इत जे माटीके दुइ चकरी बनाइ दरना पसारै हैं तहां ठीकठौर पैहौ ? अर्थात् न
पैहौ साहब को जानोगे तबहीं ठिकान लागैगो ॥ ७ ॥
प्रेम बाण यक सतगुरु दीन्हो गाढ़ो खैंचि कमाना हो ।
दास कबीर कियो या कहरा पहरा माहिं समाना हो ॥८॥
श्री कबीरजी कहैहैं कि हे जीवौ ! तुम यामें पार न जाउगे जब ऐसो करौ
तब पारै जाउगे।प्रेमको तो बाण करु औ सतगुरु जो ज्ञान दीन्हो है ताको कमान
करि गाढ़ो खैंचि साहबरूप जो निशान है तामें प्रेमबाण मारु अर्थात् प्रेम
लगाउ । हे साहब को सदाको दास ! कायाकेबीर जीव या कहरा में संसार को
कहर है सो कहा कियो है, महरा माहिं समाना कहे जे साहब के महरमी हैं
तेहीमें समाय अर्थात् उन्हींको सत्संग करु । कहू गाढ़ो खैंचि कमाना यही पाठ
है।अथवा हे कबीर ! कायाके बीर जीव मन माया ब्रह्मके दास हैं यहि संसार तें
कहरा । ( ४५९ )
किये सो कहरा कहे कहर करनवारो है सो तैं आपनो रूपतौ विचारु कहाँ
माया दास ह्वैरहै है तैं महरा कहे मायाके हरनवारे जे हैं साधु तेही माहिं समाना
कहै तैं तिनके बरोबर है जो तैं आपने स्व स्वरूपको जानै है ॥ ८ ॥
इति दूसरा कहरा समाप्त ।
अथ तीसरा कहरा ॥ ३ ॥
रामनामको सेवहु वीरा दूरि नहीं दुरि आशाहो ।
और देव का पूजहु बौरे ई सब झूठी आशाहो ॥ १ ॥
उपरके उजरे कहभो बौरे भीतर अजहूं कारोहो ।
तनको बृद्ध कहा भो बौरे ई मन अजहूं बारोहो ॥ २ ॥
मुखके दांत गये का बौरे अंदर दांत लोहेके हो ।
फिरि फिरि चना चवाउ विषयके काम क्रोध मद लोभेहो ३
तनकी शक्ति सकल घटि गयऊ मनहिं दिलासा दूनीहो ।
कहै कबीर सुनो हो संतो सकल सयानप ऊनीहो ॥ ४ ॥
राम नामको सेवहु वीरा दूरि नहीं दुरि आशाहो ।
और देव का पूजहु बौरे ई सब झूठी आशाहो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हे कायाके वीरौ जीवो ! रामनाम को सेवन करो
राम नाम दूरि नहीं है तुम्हारी आशा दूरिहै और देवको हे बौरे का पूजहुहौ
इनकी आशा सब झूठी है ॥ १ ॥
ऊपरके उजरे कह भो बौरे भीतर अजहूं कारोहो ।
तनको वृद्ध कहाभो बौरे या मन अजहूं वारोहो ॥ २ ॥
मुखके दांत गयेका बौरे अंदर दांत लोहेके हो ।
फिरि फिरि चना चवाउ विपयके काम क्रोध मद लोभेहो ३
( ४६० ) बीजक कबीरदास ।
हे बौर जो ऊपर बहुत ऊजर बनेरह्यो बहुत आचार कियों तौ कहा भयों
भीतर तो अजहूं करिये हो औ तनकी बड़ी वृद्धता मान्यो तौ हे बौरे ! कहा भयो
मनतो अजहूं बारो कहे लरिकवा बनाहै वही चाल चलैहै ॥ २ ॥ औ मुखकें
दांत गिरिगेये तौ हे बौरे कहा भयो अन्तःकरणके जे बिषय के चना चाबन-
वारे ऐसे लोहेके दांततो गैषे न भये काम क्रोध मद लोभ बनेनहैं मिटबै न भये ॥ ३ ॥
तनकी शक्ति सकल घटि गयऊ मनहिं दिलासा दूनीहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतौ सकल सयानप ऊनीहो ॥ ४ ॥
हे बौरे ! तनकी सकल कहे रूप बिषय करनवाली सामर्थ्य घटिगई औ संगी
मरिगये पै दिलकी दिलासा जो तृष्णा सोतौ घटिबे न भई सो कबीरजी कहै
हैं कि हे संतो ! तुम सुनो या सब जीवनकी सयानपऊनी है अर्थात् तुच्छ है
बिना रामनाम के जाने जनन मरण न छूटैहै तामें प्रमाण कबीरजीका ॥
“ जोतै रसना राम न कहिहै । उपजत बिनशत भरमत रहिहै ॥ जस देखी
तरुवरकी छाया । प्राणगये कहु काकी माया ॥ जीवत कछु न किये परमाना ।
मुये मर्म कहु काकर जाना । अंत काल सुख कोउ न सोवैं । राजा रंक दोऊ मिलि
रोवैं ॥ हंस सरोवर कमल शरीरा । राम रसायन पिवै कबीरा ॥ ४ ॥ ”
इति तीसरा कहरा समाप्त ।
अथ चौथा कहरा ॥ ४ ॥
ओढ़न मेरा रामनाम मैं रामहि को बनिजारा हो ।
रामनामका करौं बनिजमैं हरि मोरा हटवाराहो ॥ १ ॥
सहस नामको करौं पसारा दिन दिन होत सवाईहो ।
कान तराजू सेर तिन पौवा डहकिन ढोल बजाईहो ॥ २ ॥
सर पसेरी पूरा करि ले पासंघ कतहुं न जाईहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो जोरि चले जहडाई हो ॥ ३ ॥
कहरा । ( ४६१ )
ओढन मेरो रामनाम मैं रामहिंको बनिजारा हो ।
रामनामको करौं बनिजमैं हरि मोरा हटवारा हो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि पांखण्डी लोग जे हैं ते कहै हैं हमारो ओढ़न राम-
नामही है अर्थात् राम नामही के ओढ़नते ठगि लेहिंहैं । परम तत्त्व जो रामनामहैं
तौनेको ठगिवेको ओढ़र बनाये हैं काहे न मारे परैं ? कौन तरहते कि बड़े बड़े
टीका दैलिये माला जपै हैं न रामनाम को तत्त्व जानैं न अर्थ जानैं न जपैके
विधिजानैं न नामापराध दश जानैं औ या कहै हैं कि हम रामनामको बनिजारा
हैं औ रामनामकी बनिज करैहैं औ हरि जे हैं तेई हमारे हटवारे हैं कहे दलालहैं
अर्थात् हम उनहींके द्वारा सब रामनामको सौदा लेहिहैं उनकी प्रेरणाते हम
मन्त्र देइ हैं जो वाके भागमें होयगो सो होयगो हमारो पैसा धोतीतो हाथकों
न जायगो। जो कोई कहै है कि शिष्य परीक्षा कै लेउ तो या कहै हैं कि कहांको
बखेड़ा लगायो है हम मन्त्र दैदियो वह जो चाहै सो करै मुक्त होइ जाइगो ॥ १ ॥
सहस नामको किये पसारा दिन दिन होत सवाईहो ।
कान तराजू सेर तिन पौवा डहकिन ढोल बजाईहो॥२॥
औ या कहै हैं कि एक नामके लीन्हेते सर्व कर्म छूटि जाइहैं हम तो हजा-
रन नाम लेइहैं कर्म कहां रहेंगे सब छूटि जायेंगे हमारे सुकर्म दिन दिन सबाई
बढ़ेंगे। सो दोउ गुरु चेलनको ऐसो हवालहै चेलनके कान जे हैं तेई फेरहा तर
जुवा है औ तीनपावका सेरहै अर्थात् त्रिगुणात्मक मन है सो मन बचन के परें
जो रामनाम सो गुरुवालोग तौलि दियो अर्थात् मन्त्र दियो। डहकिन ढोल बजा
ई कहे चेला लोग चारिउ ओर कहि आये कि हम मन्त्र लियो है कै डहकाइ
गये ढोल बजाइ ॥ २ ॥
सेर पसेरी पूरा करिले पासँघ कतहुं न जाईहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो जोरि चले जहडाईहो ॥३॥
गुरुवनके उपदेशते सेर जो है मन पसेरी जो है ब्रह्मज्ञान सो पूरो करीलै
अर्थात् सर्वत्र ब्रह्मको पूर्णे मानै परंतु पसंघा जो मूलाज्ञान सो कतहूं न जायगो
वाहीमें परिकै अन्तकाल में जहडायकै कहे डहकाय चले जायँगे ॥ ३ ॥
इति चौथा कहरा समाप्त ।
( ४६२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ पांचवां कहरा ॥ ५ ॥
राम नाम भजु राम नाम भजु चेति देखु मन माहींहो ।
लक्ष करोरि जोरि धन गाड़े चले डोलावत बाहींहो ॥ १ ॥
दाऊ दादा औ परपाजा उइ गाड़े भुइ भांडेहो ।
अँधरे भये हियाकी फूटी तिन काहे सब छांड़ेहो ॥ २ ॥
ई संसार असार को धन्धा अंतकाल कोइ नाहींहो ।
उपजत बिनशत वार न लागै ज्यों बादरकी छाहींहो ॥ ३ ॥
नाता गोता कुल कुटुम्ब सब तिनकी कवनि बड़ाईहो ।
कह कबीर एक राम भजे बिन बूड़ी सब चतुराईहो ॥ ४ ॥
राम नाम भजु राम नाम भजु चेति देखु मन माहींहो ।
लक्ष करोरि जोरि धन गाड़े चले डोलावत बाहींहो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हे मूढ़ ! परमपुरुष श्री रामचन्द्रको रामनाम है
ताको भजु भजु। भज सेवायां धातुहै सो याही रामनामको सेवा करु । रामनाम
मन बचनके परै है सो आगे लिखि आये हैं आपने मनमें चेति कहै बिचारिकै
देखु तो लाखन करोरिन धन जोरिकै गाड़ी २ धरयो जब मरन लाग्यो यमदूत
लै जान लगे तब बाहीं डोलावत चलौहो कि वे धन हमारे नहीं हैं ॥ १ ॥
दाऊ दादा औ परपाजा उइ गाड़े भुइँ भांडेहो ।
अँधरे भये हियोकी फूटी तिनकाहे सब छांड़ेहो ॥ २ ॥
जो कहो वा जन्म कब देख्योह तो तेरे दाऊ दादा औ परपाजा वे भुइँ
में केतौ भांड़े गाड़ी गाड़ी मरिगये हैं उन्हीं के साथ कबै धन गयो है सो तैं
आँधरे ह्वैगये तेरे हियोकी फूटि गई हैं जैसे सब धन छोड़िकै वे चले गये हैं
धनको मालिक तुहीं भयो ऐसे तुहूं धन छोड़िकै चलो जायगो तेरों धन औरही
कों होयगो तेरे हाथ कछु न लगैगो ॥ २ ॥
कहरा । ( ४६३ )
या संसार असारको धंधा अन्तकाल कोइ नाहींहो ।
उपजत विनशत बार न लागै ज्यों बादरकी छाहींहो॥३॥
या संसार असार कहे झूठहीको धंधाहै अंतकालमें कोई आपनो नहीं है
जोकहो कि हम जाबही न करेंगे बनेही रहेंगे तो शरीरके उपजत विनशत में
बार नहीं लगैहै जैसे बादरकी छाहीं भई औ पुनि मिटिगई ॥ ३ ॥
नाता गोता कुल कुटुम्ब सब तिनकी कवनि बड़ाईहो ।
कह कवीर यक राम भजे विन बूड़ी सब चतुराईहो॥४॥
बड़े गोतके भये बड़े कुल के भये बड़ी बड़ी जातिके नात भये तिनकी
कौन बड़ाईहै ये तो सब शरीरही के हैं जब तेरो शरीर छूटि जायगो तब तेरो
शरीरही कोई न छुवैगो ताते ये सब नात गोत जबभर शरीर बनोहे तबहीं
भरेके हैं शरीर छूटे ये सब छूटि जाइहैं इनकी कौन बड़ाई है। सो श्री कबीरजी
कहै हैं कि, एक जे परमपुरुष पर श्री रामचन्द्रहैं तिनके रामनाम के भजे कहे सेवा
किये बिन सब चतुराई तिहारी बूड़ि जायगी नरकहीको जाउगो। जेजे अपनी २
कल्पना ते नाना उपासना कैलियेहो तिनते चाहोहो कि हमारी मुक्ति है जायगी
ते एकहू काम न आवैगो तामें पमाण श्री गोसाईंजी को पद ॥ “ राम
कहत चलु राम कहत चलु राम कहत चलु भाईरे। नाहिंतो भव बेगारि में परिहौ पुनि
छूटब अति कठिनाईरे । बाँस पुरान साजु सब अटपट सरल त्रिकोण खटोलारे ।
हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद मंद मोल विन डोलारे। बिषम कहारमार मद-
माते चलैं न पाय बटोरैरे । मंद बेलंद अभेरा ढलकनि पाई दुख झकझोरैरे ।
कांट कुराय लपैटन लोटन ठामहिं ठाम बझाऊरे । जस जस चलिये दूरि निज
तस तस बांसन भेंट लकाऊरे । मारग अगम संग नहिं संबल नाम गामकर
भूलारे । तुलसि दास भवआश हरहु अब होहु राम अनुकूलारे ॥ १ ॥
अर्थ—राम कहत चलु राम कहत चलु राम कहत चलु भाई रे॥ गोसाईंजी
जीवन को उपदेश करैहैं यहां राम कहतचलु तीनि बारकह्यो सो मुक्त मुमुक्षु
विषयी तीनों जीवन को कहैहैं सो गोसाईंजी अपनी रामायणमें कह्योहै चौ०॥
“विषयी साधक सिद्ध सयाने । त्रिविध जीव जग वेद बखाने ॥ राम सनेह
( ४६४ ) बीजक कबीरदास ।
सरस मन जासू। साधुसभा बड़ आदर तासू ॥ सिद्ध विरक्त महामुनि
योगी । नाम प्रसाद ब्रह्म सुखभोगी" ॥ या ते यह कि राम बिना मुक्तहुनकी
गति नहीं है अरु भाई जो कह्यो सो जीवके नाते कहैं हैं कि हम सब यकीहैं
अरु इहां एकबचन कहैहैं सो प्रति जीव सो पृथक् २ कहै हैं कि हे भैया या
दुःखमार्ग त्यागि देउ यामें दुःख पावोगे ताते राम कहते चलो ॥ नाहिंतो
भव बेगारिमें परिहौ पुनि छूटब अति कठिनाईरे ॥ नहीं तो भव जो संसार
है ताके बेगारिमें परोगे बेगारि परिबो कहाहै जाते संसारते कबहूं न उद्धार
होइ ऐसे कर्म माया तुमको धरिकै करावैगी जो शरीररूप डोलाको गुमान
कियेहोहु कि डोला चढ़ि बेगारि न परेंगे तो धरनवारो समरथ है डोलामें
चढ़ेहू धरि लैगो तब कठिन ह्वै जायगो जैसे फिरङ्गी म्याना पालकिनवाले
को बेगारि पकरै है तब कोई कहै हैं किं येतो बड़े आदमी हैं इनको सड़क
खोदना चाहिये तब अंग्रेजलोग कहैहैं कि हमारे इहां दस्तूरहै म्याना चढ़े जाइ
वहीं में फरुहा कुदारी धरे जाइ सो पालकिउ चढ़े बेगारि धरि जाइ है औ डोलहू
तिहारो जर्जरहै सो कहैं हैं ॥ "बांस पुरान साजु सब अटखट सरल तिकोन खटो-
लारे। हमहिं दिहलकारि कुटिल करमचंद मंद मोल बिन डोलारे ॥ प्रारब्ध जो है
सोई पुरान बाँस है काहे ते कि संचित तो प्रारब्ध भै है तेहिते महापुरानहै।
औ सब साज अटखट कह्यो सो आठ औ षट कहै चौदह साज हैं शरीररूपी
डोलाकी सो कहैहैं "त्वचा, रुधिर, मांस, अस्थिं, मेद, मज्जा, शुक्र, केश, रोम,
नस, नख, दंत, मल, मूत्र, सो त्वचा डोलाको वोहारहै रुधिर वोहार को रंग औ
मांस वोहारकी तुई है औ अस्थिडोलाको काठहै औ मेद मज्जा डोलाको तकिया
बिछौनाहै औ नस रसरीहै औ नख लोहेकी पतुरी है औ दांत खीला है औ
मलमूत्र लघुत है औ घुनको कीरा है काहेते कि कीरनहू में पानी होय है।
अथवा साजु सब अटखट जो यह पाठ होइ तौ पुरजा पुरजा जो रै है यही
अर्थ है औ सरल जो कह्यो सो सरौहै कहे रोगनते ग्रसितहै औ तिकोन खटो-
ला जो कह्यो डोलामें सो शरीर की तीन अवस्था हैं जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति याहीमें
परोरहै है सोई तिकोन खटोला है अथवा बालपन युवापन वृद्धापन ई तीनों-
पन तिकोन खटोलाहैं शरीर रूपी डोलामें सो ऐसो डोला कुटिल करमचंद
कहरा। (४६६.)
कहे कुटिल कलंकी करम करिकै कहे बनाइकै हम सबको दीन्हो है औ ऐसो
निबल डोलाहै। औ मंद मोलबिन जो कह्यो सो औरको मांस भोजनहूंमें काम
आवै है यह मानुष शरीरको मांस बेचबेहूते कोऊ नहीं लेइ याते मंद मोल
कहे थोरहू मोल बिनाहै सो ऐसो डोला में चढ़िकै हे भैया ! या संसार मार्ग में
चलौगे तो कलंकी करम को दियोहै डोला तुम्हूं को कलंक लागि जाइगो।
यह जर्जर डोला जो संसार मार्गमें टूटैगो तौ फँसि जाउगे फिर न निकसौगे
जो नाम सड़क चलौगे तौ या सड़क राम घाटही लगीहै डोला टूट्यो दिव्य रूप
ते आंखी मूंदेहू चले जाउगे अथवा दिव्य रूपते विमान चढ़ि चले जाउगे कैसो
है डोला सो कहैंहैं ॥ "बिषम कहार मार मद माते चलहिं न पाय बटोरे रे ।
मंद बिलंद अभेरा दलकनि पाई दुख झक झोरेरे" ॥ बिषम कहे कहार जेहिको
पांचों इंद्रिय सो एकतो सम नहीं है दूसरे स्वभावहीते बिषमहैं तीसरे मार मदमाते हैं
सो मतवारे के पांय सम नहीं परै हैं चलत में पांय बगरि जाइ हैं पांय बगरिबे
कहे रूप रस गंध स्पर्श शब्द इनमें जाय रहैहै। फिरि मार्ग कैसो है मंद कहे
नीचहै बिलंद कहे ऊंचहै अर्थात् कहूं अपमानते दीन ह्वै जाइहै अपनेको नीच
मानै है कहूं मानते अपनेको बड़ो ऊंच मानैहै औ कहूं अभेरा कहे धक्का लगि-
जायहै। धक्का कहा है कहूं पुत्र मरिगयो भाई मरिगयो चोर चोराय लियो सो या
लोकमें लोग कहैंहैं कि हमको बड़ो धक्का लगो। दलकनि कहाहै कि विषय सुख देत
में अच्छो लगैहै जब वामेंरस्यो तब बिषय दलदल में फँसि जाय है औ पाई
दुःख झकझोरे कहे डोलामें झकझोरा लगैहै सो इंद्रीरूप कहार गिरैं हैं कहूं
उठै हैं ताते विकलताई झकझोरा का दुःख पाइतहैं ॥ "कांट कुरायल पेटन
लोटन ठांवहिं ठांव बझाउरे । जस जस चलिय दूरि निज तस तस बासन
भेटल काउरे" ॥ कहीं कांटहैं कहे सुन्दर रूपहै सो नयनरूपी कहारनके
छेदिजायहैं तब गिरि जाय हैं कहे आसक्त ह्वै जाय हैं औ कुराय सजल होइ
है सो रस है तामें रसनारूप कहार बूडिजाय है औ लपेटन फूली लताहै तेई
गन्धहैं तामें नासिकारूप कहार लपटिकै गिरि परै है लोटन लोकमें सर्पको
कहैंहैं सो स्पर्श है त्वचारूप कहारनको डसि डारै है कामिनीके एक अङ्ग
छुवतमें सर्वांग कामबिष चढ़ि जाय है याते स्पर्शको लोटन सर्प कह्यो है
३०
( ४६६ ) बीजक कबीरदास ।
औ ठांवहिं ठांव बझाऊ कहे मोहरूप शिकारी सो नाना बिषय की कथा
औ नाना भूत यक्षादिक सेवनते सिद्धिकी प्राप्त तिनकी कथा औ नाना ता
मसमत तिनकी कथा सो शब्दरूप बागुरि ठामहि ठांव लगाय राख्यो है
तामें श्रवणरूप कहार अरुझिकै डोला डारि देइहें फिरि संसार मग कैसो
है ज्यों ज्यों संसार पथमें चलियतहै त्यों त्यों दूरि रामपुर परतो जायहै
भैया रामपुरकी गैल नहीं है और राहहै फिरि कैसो ह यामें वास नहीं
है अर्थात् कल नहीं रहै है कर्म करतई जाइहै शांत हैकै कोई नहीं टिक्यो ॥
“मारग अगम संग नहिं संबल नाम ग्रामकर भूलारे । तुलसिदास भव त्रास हरहु
अब होहु राम अनुकूलारे ॥” सो या प्रकार यह मार्ग है संसार सोई पृथ्वी है
तामें विषयके हेतु नाना यतन करिबो अरु राजस तामस शास्त्रमार्ग तदनुसार
कर्म करिबो सोई चलिबो है ताको गोसांईजी कहै हैं किं अगमहै कहे चलिबे
मुआफ़िक नहीं है औ नाम मार्गमें संतनको संगहै ते रामपुरको बिघ्न नाशिकै
पहुंचाइ देइहैं यहां कैसो है संगनहिं संबल कहे सम्यक् है बल जेहिके ऐसे
संत सङ्गमें नहीं है अथवा नानामार्ग में तो सात्विक श्रद्धा कलेवा मिलै है या
मार्गमें श्रद्धारूप कलेवा नहीं मिलैहै सो गोसांईजी अपनी रामायण में लिख्यो
है जे श्रद्धा संबल रहित इत्यादिक औ जा गाउंको तुमको जानोहै ताको नामही
भूलि गयो है भुला जो कह्यो सो गर्भमें सुधि होइ है फिरि भूलि जायहै याते
भूला कह्यो है अथवा जीव नाम ग्राम कर भूलाहै नाना देवतन को नाम लेइहै
औ तिनहीं के धाम जाइबेकी इच्छा करै है सो तेरो ते नामनते भव बन्धना छूटै
है न ते धामनमें गये तेरो जनन मरण त्रास छूटैगो सो अब गोसांईजी कहैंहैं कि
हे भैया ! अब अपने अपने जीवन पै दाया करि संसारकी त्रास हरो अब काहेते
कह्यो कि अनेक जन्म भटकि के अनेक शरीर पाइकै मनुष्यको शरीर पायो है
सो अबहूं नाम मार्ग चलौ याते अब कह्यो है औ होहु राम अनुकुला जो कह्यो
सो उपक्रममें नाम मार्ग बतायो ताको चलिकै उपसंहार में होहु राम अनुकूला
कह्यो सो एक उपलक्षण है छः प्रकारकी शरणागती को सूचन कियो है उपक्रम
में नाम मार्ग बतायो उपसंहारमें शरणागती बतायी सोई श्री गोसांई जी कहैहैं
कहरा । ( ४६७ )
कि हे भैया ! रघुनाथजी को नाम जपौ औ शरण जाउ याहीमें उबरहै औरमें
नहीं है षट् बिधि शरणागत को लक्षण ॥ “ अनुकूलस्य सङ्कल्पः प्रतिकूलस्य
वर्जनम् ॥ रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्ववरणं तथा ॥ आत्मनिक्षेपकार्पण्यं
षड्विधा शरणागतिः ” ॥ ४ ॥
इति पांचवां कहरा समाप्त ।
अथ छठवां कहरा ॥ ६ ॥
राम नाम बिनु राम नाम बिनु मिथ्या जन्म गँवाईहो॥१॥
सेमर सेइ सुवा जो जहड़े ऊनपरे पछिताई हो ।
जैसे मदिप गांठि अर्थै दै घरहुकी अकिल गँवाई हो ॥२॥
स्वादे उदर भरत धौं कैसे ओसे प्यास न जाई हो ।
द्रव्यक हीन कौन पुरुषारथ मनहीं माहँ तवाईहो ॥ ३ ॥
गांठी रतन मर्म नहिं जानेहु पारख लीन्ही छोरी हो ।
कह कबीर यह अवसर बीते रतनन मिलै बहोरी हो ॥४॥
राम नाम बिनु राम नाम बिनु मिथ्या जन्म गँवाई हो ॥१॥
उपासक जे हैं ते पंचांगोपासना करिकै औ कापालिकादिक मतवारे देवत-
नके उपासना करिके नास्तिक मरबई मोक्ष मानिकै व्याकरणी शब्द ज्ञान
करिकै ज्योतिषी कालज्ञान करिकै सांख्यवाले प्रकृतिपुरुषज्ञान करिकै पूर्व
मीमांसावारे कर्मही करिकै नैयायिक दुःखध्वंसही करिकै औ कणाद वाले नौगु-
णध्वंसही करिकै औ शंकरवेदांतवाले ब्रह्मज्ञानही करिकै इत्यादिक मुक्त होब
मानै हैं परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र तिनहीं बिना औ तिनके रामनाम बिना मिथ्य
जन्म गँवाइ दियो ॥ १ ॥
सेमर सेइ सुवा जो जहड़े ऊनपरे पछिताई हो ।
जैसे मदिप गांठि अर्थैदै घरहुकी अकिल गँवाई हो ॥ २ ॥
( ४६८ ) बीजक कबीरदास ।
जैसे सेमरके फलको सुवासेयों चोंच चलायो जब वामें धुवानिकस्यो तब
भोजनते ऊन कहे खाली परचो भोजन न पायो तब पछितायकै कहे जहड़ि कै
भोजन दहकायकै चल्यो । ऐसे जीव नाना मतन में परिकै मुक्ति चाह्यो जब मुक्ति
न पायो तब मुक्ति दहकाइकै संसारमें परचो औ जैसे मदिप कहे मतवार गांठी
को द्रव्य दैकै मद पियो घरौकी अकिल गँवायदियो तैसे गुरुवा लोगनको गांठी
की द्रव्य दैकै मन्त्र लैकै और और मतनमें लगिगये घरोंकी अकिल गँवाइ
दियो कहे साहबको सदा को दास है जीव सो आपने स्वरूपको भूलि गयो ॥२॥
स्वादे उदर भरत धौं कैसे ओसै प्यास न जाईहो ।
द्रव्यक हीन कौन पुरषारथ मनहीं माहँ तवाईहो ॥ ३ ॥
जौने मतमें स्वादपायो सो तौनेही मतमें लग्यो सो ओसते कहूं पियास बुझाईहै
ओसपरो सो ओसको जलको स्वाद मुखमें आयो सो कहा स्वादते पेट भरे है नहीं
भरै है तैसे जीव नाना मतमें लग्यो नाना साधन करन लग्यो औ वे देवतन-
के लोक न गयो अथवा ब्रह्मज्ञान सिद्ध भयो अथवा आत्मज्ञान सिद्धभयो
इत्यादिक सब सिद्धि भयो किंचित् सुख पायो तेतो ओसको चाटिबो है कहा
मुक्तिहोइ है नहीं होय है औ द्रव्य का हीन जो पुरुषारथ है सो कौन पुरुषार
थहै मनमें बहुत बिचार करै है कि वाको दशहजारदेउं वाको पांच हजार देउं
जब द्रव्य की सुधि आई सो द्रव्य तो हैई नहीं है तब मनै में तवाई होयहै कि
हाय का करौं ऐसे नाना मतनमें लगे पाछे पछिताउ होयहै अन्तकाल में मैं
कहा कियो साहबमें न लाग्यो जाते मुक्तिहोती ॥ ३ ॥
गांठी रतन मर्म नहिं जानेहु पारख लीन्ही छोरीहो ।
कह कबीर यह अवसर बीते रतन नमिलै बहोरी हो॥४॥
या जीव सदाको साहबको अंशहै सो या रतन तुम्हारे गांठी में है ताको
यह राम नामते पारिख करिकै छोरि लेउ साहबके गुण जीवों में हैं वे बृहत्
चैतन्यहैं यह अणुचैतन्यहैं वे घन रस रूपहैं या लघु रसरूप हैं ऐसो जो शुद्ध आपनो
रूप जानै तौ रतन तेरे गांठीमें है ताको मर्म तुम रामनाम बिना नहीं जान्योकि
वा साहब कोहै मन माया ब्रह्मको नहीं है काहेते कि गुरुवालोग तिहारी पारख
कहरा । ( ४६९ )
छोरि लियो और और तिहारो साहब बनाइ दियो सो कबीरजी कहै हैं कि जों
ऐसो मनुष्य शरीरमें साहबको ज्ञान न भयो किमैं साहबको हौं तो या अवसर
बीति गये कहे या शरीर छूटिगये फेरि रतन जोहै आपने स्वरूपको ज्ञान कि
मैं साहब को अंशहौं सो पुनि न मिलैगो औ साहबको ज्ञानकै देनवारो राम
नाम न मिलैगो औ आगे जे कहि आये पंचांगोपासनवारे कापालिकादिक मतवारें
व्याकरणी सांख्य मीमांसावारे नैयायिक कणादवारे शंकरवेदांती नास्ति-
क मतवारे जो या कहै हैं कि हमारे मतमें काहे मुक्ति नहीं होय है सो कहै
हैं पंचांगोपासना तौ सगुणहै सो सत रज तम ये गुण माया के हैं सो मायाते
माया नहीं छूटै है या असंभवहै औ कापालिकादिक व्याकरणादि भैरवको मानै
हैं सो वेद विरुद्धहै ई मुक्तिदाता कोई नहीं हैं तामें प्रमाण॥ “मुक्तिदाता च सर्वे-
षborderं राम एव न संशयः ॥” औ वैयाकरण शब्दब्रह्मते मुक्ति मानै हैं सो केवल
शब्दब्रह्मके जाने मुक्ति नहीं होयहै जब शब्दब्रह्मकों जानिकै परब्रह्मको जानै
तब मुक्ति होइहै तामें प्रमाण॥ “शब्दे ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि ।
श्रमस्तस्य श्रमफलोह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ ” औ ज्योतिषी कालज्ञानते मुक्ति मानै
हैं सो कालहूके कालजे श्री रामचन्द्रहैं तिनके बिना जाने मुक्ति नहीं होयहै
तामें प्रमाण ॥ “ यः कालकालो गुणी सर्ववेत्ता ” ॥ औ सांख्यवारे प्रकृति
पुरुषते मुक्ति मानै हैं सो पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रहैं तिनके विनाजाने मुक्ति नहीं
होयहै तामें प्रमाण ॥ “ वन्दे महापुरुष ते चरणारविंदम् ॥” औ पूर्वमीमां-
सावारे कर्म ते मुक्ति मानै हैं सो कर्म ते मुक्ति नहीं होय है कर्म त्यागेते मुक्ति
होयहै तामें प्रमाण ॥ “न कर्मणा न प्रजयाधनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ”
इति श्रुतेः ॥ औ नैयायिक ईश्वर श्री रामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण॥ “ तमीश्व-
राणां परमं महेश्वरं”॥औ कणादवारे नौगुणध्वंस मुक्ति मानै हैं सो नौ गुणध्वंसही
मुक्ति नहीं होयहै नौगुणध्वंस भये उपरांत जब भक्ति होयहै तब मुक्ति होयहै तामें
प्रमाण ॥ “ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा नशोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं
लभते परां”॥औ शङ्कर वेदांती ब्रह्म ज्ञान करिकै मुक्ति मानै हैं सो जीव ब्रह्म कभी
होतही नहीं है तामें प्रमाण ॥ “सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यंभिदःसत्यंभिदः ॥
औ नास्तिक चारि प्रकारके हैं-सौगत १ बिज्ञानबादी २ सौ-
( ४७० ) | बीजक कबीरदास ।
त्रांत्रिक ३ चार्वाक ४ सो सौगतनामके आत्मा क्षणिक नाशमानमानै हैं जैसे
घट, सो आस्तिक मतते विरुद्धहै काहेते कि आस्तिक आत्माको नित्य मानै है ॥ १॥
विज्ञानवादी पदार्थ मात्रका ज्ञान स्वरूप मानै है सो आस्तिक मतमें बाधक है
काहेते कि जो क्षणिक ज्ञानके बाहर दूसर पदार्थ नहीं मानै है तौ ज्ञानाश्रय
आत्मा केहितराते होइ ॥ २ ॥ औ सौत्रांत्रिक गुणरूप आत्मा मानै है कौन
गुण सुख बिशेषगुण सो आस्तिक मतते बिरुद्ध है काहेते आस्तिक सुखरूप
सुखाश्रय आत्माको मानै है ॥ ३ ॥ औ चार्वाक शरीरैको आत्मा मानै हैं
काहेते प्रत्यक्षहै सो आस्तिक मतते बिरुद्धहै काहेते शरीरते अभिन्न आत्माको
मानै है याही रीति उदयनाचार्य बौद्धाधिकार ग्रन्थमें बहुत नास्तिकनकॊ खंडन
कियो है ॥ ४ ॥ औ अछू हमहूं कहै हैं औ सौगत जो आत्माको क्षणिक
नाशवान् मानेंगे औ चार्वाक जो शरीरको आत्मा मानेंगे तो जो क्षणिक नाश
मान् आत्मा होत तौ भूत कैसे होत याते सौगत निराकरण भयो औ जो शरीरै
आत्मा होयगो तौ मुर्दा कैसे होइगो शरीर काटिहू डारे चैतन्य रहैगो औ
विज्ञानबादी जो आत्माको ज्ञानस्वरूप मानिगो तौ अज्ञान कैसे होयगो औ
सौत्रांत्रिक सुख गुणस्वरूप आत्मा मानै है तौ गुणतो बिना गुणी रहतई नहीं
है सो गुणी कोहै जो कहो अर्हन्को अथवा जिनको गुण मानै है जीवात्माको
तौ गुण गुणी को समवाय है गुण गुणी को छोड़िकै नहीं रहै है
सो जीव जो अज्ञानी भयो सो जाको गुणहै जीव सोऊ अज्ञान भयो जो
चार्वाक कालैकै प्रत्यक्ष मानैहै गुण गुणी को नहीं मानि है वेद शास्त्रको
कहो मिथ्या मानौहौ सो ग्रहण शास्त्रमें लिखै है सो परतही है सो वेदको कहो
कैसे मिथ्या मानै तुम्हारे शास्त्र में लिखै है कि पृथ्वि नीचेको चली जाइहै सो
जौ पृथ्वी चली जाती तौ पाथर फेंकेते फेरि कैसे पृथ्वीमें मिलतो काहेसे कि
पाथर हलुकहै बिलम्ब पूर्वक आवाचाही पृथ्वि गरूहै जल्दी जावा चाही ताते
तुम्हारे ग्रन्थ झूठे हैं वेद शास्त्र सांचे हैं सो श्री रामचन्द्र बिना तुम मिथ्या
जन्म गमाइ दिह्यो ॥ ४ ॥
इति छठवां कहरा समाप्त !
कहरा । ( ४७१ )
अथ सातवां कहरा ॥ ७ ॥
रहहु सँभारे राम विचारे कहत अहौ जो पुकारेहो ॥ १ ॥
मूड मुड़ाय फूलिकै बैठे मुद्रा पहिरि मँजूसाहो ।
ताहि ऊपर कछु छार लपेटे भितर भितर घर मूसाहो॥२॥
गाउँ वसतहै गर्व भारती माम काम हंकाराहो ।
मोहिनि जहां तहां लै जैहै नहिं पति रहे तुम्हारा हो ॥ ३ ॥
मांझ मँझरिया बसै जो जानै जन हैहै सो थीराहो ।
निर्भय गुरु कि नगरिया तँहवां सुख सोवै दास कबीरा हो॥४॥
रहहु सँभारे राम विचारे कहत अहौ जो पुकारे हो॥१॥
मूड मुड़ाय फूलिकै बैठे मुद्रा पहिरि मँजूसा हो ।
ताहि ऊपर कछु छार लपेटे भितर भितर घर मूसाहो२॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि पुकारे कहौ हौं कि श्री रामनाम को बिचारत हे
जीवौ! यह मनको सँभारे रहौ अनत न जान पावै मैं पुकारे कहौहौं अनत जायगो
तौ मारो जायगो ॥ १ ॥ ऊपरते मूड़ मुड़ायकै कानेमें मुद्रा पहिरिकै अंगमें
छार लपेटिकै मंजूसा कहे गुफामें बैठे औ प्राण चढ़ाइक मानन लगे कि हमहीं
ब्रह्म हैं सो ऊपरते तो बहुत रंग कियो पै भीतर भीतर उनको घर मूसि
गयो कहे साहबको भूलिगये ॥ २ ॥
गाउँ वसतहै गर्व भारती माम काम हंकारा हो ।
मोहिनि जहां तहां लैजैहै नहिं पति रहै तुम्हारा हो॥३॥
यह शरीररूपी जो गाउँ है तामें गर्वको जो भाराहै सो थिर भयो कहे यह
मान्यो कि यह शरीर मेरोहै तब माम जो है ममता औ कामादिक जे हैं अहं-
कार तेहिते भरि गयो सो श्री कबीरजी कहैं हैं कि मोहनि जो है मोहि ले