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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 532

( ४८६ ) बीजक कबीरदास ।
सों मैं बासननि कारिकै बहुत लम्बा ह्वै रह्यौंहौं । कहैं बासननि
कारिकै मैं संसारमें फैलिरह्योहौं । औ पाई वा कहावैहै जो ताना
साफ करैहै सो या आत्माको साफ करिबो बहुत झीनहै कहै जब कोई बिरलै
संत मिलैं तब आत्मा शुद्ध होइ काहेते कि, यह सूतजीव पुरान कहै अनादि
कालते तीन खूंटा जो हैं सत १ रज २ तम ३ तामें बँधो है ॥ २ ॥
शर लागै सै तीनि साठि। तहँ कसनि बहत्तरि लाग गाँठि३
खुर खुर खुर खुरचलै नारि।वह बैठि जोलाहिनि पलथि मारि४
पाई में शर लागैहै सो शरीरमें तीनि सै साठि हाड़हैं तेई शरहैं बहत्तरि जे
कोठाहैं तिनमें बहत्तरि हजार नसनकी गांठि एक एककोठनमें लागहैं तेई कसनी
हैं ॥ ३ ॥ औ बिनतमें जौन बीच ह्वै चलावै है सो नारि कहावै है सो या
शरीरमें नाड़ी जो है सो खुर खुर खुर खुर चलैहै । औ जोलाहिनि जो है
बुद्धि सो पलथी मारिकै बैठी है अर्थात् देहही में निश्चय करिकै बैठी है ॥ ४ ॥
सो करिगहमें दुइ चलहि गोड़। ऊपर नचनीनाच करै कोड़५
सो यह तरहको जो शरीर है सो कारिगह है जहां जोलाहिनि बैठै है धमारि
महलमें होयहै सो शरीरै महलहै सो कारिगहमें जोलाहिनि दोऊ अंगूठा चलावै
है ऊपर तानामें नचनी कोड़ करै है कहै नाचै है । इहां शरीररूपी करिगहमें
बुद्धिरूपी जोलाहिनि बैठिकै कहूं शुभकर्म में निश्चय करै है कहूं अशुभ कर्ममें
निश्चय करै है यही दोऊ अंगूठाको लचाइबोहै । औ वृत्तिबुद्धिकी कहूंशुभमें
कहूं अशुभमें जायहै यही नचनी है सो नाचै है औ धमारि पक्षमें नाचत में
नचनी को गोड़ चलैहै ऊपर कोड़ करै है कहै भावबतावै है ॥ ५ ॥
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार। सखी पांच तहँ रची धमार ॥६॥
औ कषाय पांच जे हैं १ अविद्या २ अस्मिता ३ राग ४ द्वेष ५ अभि-
निवेश । औ पचीसौ जे तत्त्व हैं १ जीव २ माया ३ महत्तत्त्व ४ अहंकार ५
शब्द ६ रूप ७ रस ८ गन्ध ९ स्पर्श दशौँइंद्रिय एकमन २० पंच भूत
ई २५ औ ताहीमें दशौ द्वार ऐसे शरीर में पांच सखी जे हैं पंचप्राण ते धमारि