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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

( ४७४ ) बीजक कबीरदास ।
औ सुर नर मुनि जे हैं औ पीर जे हैं औ औलिया जे हैं औ मीर जे पादशा-
हहैं तिनको पैदा करत भयो और कहांलौं गिनैं अनंत कोटि जीवनको पैदा
करि पायना कराइ देतभयो ॥ २ ॥
पानी पवन अकास जाहिगो चन्द्र जाहिगो सूराहो ।
वह भी जाहिगोयहभीजाहिगो परतकाहुको न पूराहो॥३॥
कुशलै कहत कहत जग बिनशै कुशल कालकी फांसीहो ।
कहकबीरसबदुनियाबिनशलरहलरामअविनाशीहो ॥४॥
पानी औ पवन औ आकाश औ चन्द्रमा औ सूरा कहे सूर्य औ यहभी
कहे यह जगत् औ वहभी कहे ब्रह्म सो ये सब चले जायेंगे सबको काल खाय
लियो है काहूकी पूर नहीं परी है ॥ ३ ॥ सो कुशलै कहत कहत कहे कुशलै
मानेमाने जग सब मरिगयो कुशल कोई न रहे कुशल कालकी फांसी है जाकी
फांसीमें सब परे हैं सो कबीरजी कहैं हैं कि सब दुनियां बिनशि जाय है जो
राम करिकै जन्म बिनाशी है सोई रहिगे अर्थात् रामके दासई अविनाशी हैं
इनका नाश नहीं होयहै सो या बाल्मीक रामायणमें प्रसिद्ध है अङ्गद हनुमान्
आदिकनको नाश नहीं भयो है ॥ ४ ॥
इति आठवां कहरा समाप्त ।
अथ नवां कहरा ॥ ९ ॥
ऐसन देह निरापन बौरे मुये छुवै नहिं कोईहो ।
डंडक डोरवा तोरि लै आइनि जो कोटिकध नहोईहो॥१॥
उरध इवासा उपंजग तरासा हंकराइनि परि वाराहो ।
जो कोई आवै वेगि चलावै पल यक रहन न हाराहो॥२॥
चंदन चूर चतुर सब लेपैं गल गजमुक्ता हाराहो ।
चोंचन गीध मुये तन लूटैं जंबुक वोदर फाराहो ॥ ३ ॥