कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७२ ) बीजक कबीरदास ।
नवारी माया सो जहां रहै है तहँ तोको ये सब कामादिक लैजैहैं जो यह
मानि राख्योहै कि प्राण चढ़ाइकै ब्रह्मांडमें लैगये मायाते भिन्न द्वैगये सो या
पति तिहारी न रहेगी जब समाधिते जीव उतरैगो तब पुनि मायामें परि
जाउगे ॥ ३ ॥
मांझ मँझारिया बसै जो जानै जन हैहै सो थीराहो ।
निर्भय गुरु कि नगरियातहँवां सुख सोवै दास कबीराहो४
सो मांझ जो है माया काहेते कि जीव साहब के बीचमें माया को आवरणहै
तौने के मँझरिया में जो जन बसै जानैहै कि मायाके बीचमें बसोहै औ माया
वाको ग्रहण नहीं करिसकै है जैसे जलमें कमल जल नहीं स्पर्श करि सकै हे
काहेते साहब को जानै है सहज समाधि लगाये है तेई जन थिर रहै हैं। अथवा
साहब औ जीव के मांझ कहे बिचबादक रामनाम तौने मँझरिया कहे जामिन
है साहबके पास पहुंचाइबे को तौने रामनाम में जो कोई बसै जानैहै कि मकार
रूप मैंहौं रकाररूप साहब है मैं सदाको दास हौं औ रामनाम सर्वत्र पूर्ण है
ऐसो जो कोई जानै सो थिर रहै है तामें प्रमाण गोसाईं की चौपाई ॥ "अगुण
सगुण बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी ॥ " फिरि प्रमाण
श्लोक ॥ "रकारश्शेषलोकश्च अकारोमर्त्यसंभवः । मकारश्शून्यलोकश्च त्रयो-
लोकानिराशयाः ॥" तामें प्रमाण कबीर जीका पद् ॥ "क्या नांगे क्या बांधे चाम
जो नहिं चीन्है आतम राम ॥ नांगे फिरै योग जो होई । बनको मृगा मुकु-
ति गो कोई ॥ मूड़ मुड़ाये जो सिधि होई । मूड़ी भेड़ि मुक्ति क्यों न होई ॥
बिंद राखेजो खेलहि भाई । खुसरै कौन परम गति पाई ॥ पढ़े गुने उपनै
हंकारा । अधघर बूड़े वार न पारा ॥ कहै कबीर सुनौरे भाई । राम नाम
बिन किन सिधि पाई ॥ " औ थिर ह्वैकै गुरु कहे सबते श्रेष्ठ श्री रामचं-
न्द्रके नगर कहे साकेतमें कबीर जे जीव ते उनके दासद्वै तहां सुखसों सो वै हैं
वहां और देवके उपासना वारे अहं ब्रह्मास्मिवारे जेहैं ते नहीं जाइ सकैहैं वे
मायाहीमें रहे आवै हैं ॥ ४ ॥
इति सातवां कहरा समाप्त ।