कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८० ) बीजक कबीरदास ।
अथ बारहवां कहरा ॥ १२ ॥
या माया रघुनाथ कि बौरी खेलन चली अहेरा हो ।
चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारै काहु न राखै नेराहो॥१॥
मौनी वीर दिगम्वर मांरे ध्यान धरंते योगीहो ।
जंगल मेंके जंगम मारे माया किनहुं न भोगीहो ॥ २ ॥
वेद पढ़ंता पांडे मारे पूजा करते स्वामीहो ।
अर्थ विचारे पंडित मारे वांध्यो सकल लगामीहो ॥ ३ ॥
शृंगीऋषि बन भीतर मारे शिर ब्रह्माके फोरीहो ।
नाथमछंदर चले पीठदै सिंहलहूमें बौरीहो ॥ ४ ॥
साकतके घर कर्त्ता धर्त्ता हरि भक्तनकी चेरीहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो ज्यों आवै त्यों फेरी हो ॥ ५ ॥
ज्ञानशक्ति कबीर को जवाब दियो मैं कहा करौं मोको कोई जीवनके उदय
होन नहीं देइहै माया सबको बांधि लियो है सो कबीरजी जीवनसों कहै हैं
यह माया छुइ जान न पावै जबहीं आवै तबहीं यासों मुंह फेरिलेउ तबहीं बचौगे
या सबको बांधि लियो है तुम्हहूंको बांधि लेइगी औ इहां रघुनाथकी बौरी जो
माया कह्यो सो रघुहै जीव ताके नाथ जे श्री रामचन्द्र तिनकी या माया है सों
जीवनको धरि धरिकै शिकार खेलै है सो जब अपने नाथको या जीव जानै
जिनकी या मायाहै तब तब या मायाते छूटैगो अपने बल ते जीव न छूटि
सकैगो अथवा या माया रघुनाथकी बौरी है रघुनाथकी बौरी कहै रघुनाथकों
न जानिबो यहै याको स्वरूप है १ ॥ ५ ॥
इति बारहवां कहरा समाप्त
इति कहरा सम्पूर्ण ।