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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

रचतभई । औ ताना पक्षमें पांच पचीस तत्त्वकेकेहे सबकोरीकै साजु आइगै
औ धरिकेहे सबअपने अपने धमारमें लगिगे कैड़ावारे माड़ीवारे पुरियावारें
करिगहवारें तानासाफकरैवारे औ धमारिपक्षमें पांच सखी धमारि रचैहैं दुइ
एकबार कियो एकदेखैया भो ॥ ६ ॥
वे रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर॥७॥
पांचो जे सखीहैं पांच तत्त्वनका रंग विरंग चीर पहिरैं । स्वगोदय में लिखे
हैं श्वास तत्त्वनके रंग जुदेजुदे देखे परै हैं औ कोरीके घरके अनेक रंगकेंचीर
पहिरैं हैं । औ धमारि पक्षमें केशरि कस्तूरी करिकै गुलाल झोड़र करिकै चीर
रंग बेरंग होयहैं ते पहिरैं हैं । सो यहि तरहकी धमारि या संसारमें है ताते
हरिको चरण धरिकै कबीर गावै है कहै है । या धमारिको प्रथम या कहि
आये हैं जौने लोकमें सदा बसंत है तहांप्रवेश करावो । औ इहां धमारि कहैं
हैं तात्पर्य यह कि, या शरीरको ताना बाना जनन मरण में परिरह्यो है या
धमारि तुमको देखायो जो रीझे होहु तो मैं फगुवा यही मांगौं हौं कि जहां
सदा बसंत है वा लोक में प्रवेश करावो औ न रीझ्यो होहु तौ तुम हरिहौ
या ताना बाना धमारि हरिलेउ । या कहो कि, “ऐसी धमारि तैं न रचु”
कबीर कहै हैं कि हे जीव हरिके चरणधारि ऐसी बिनयकरु ॥ ७ ॥
इति तीसराबसंत समाप्त ।
अथ चौथा बसन्त ॥ ४ ॥
बुढ़ियाहँसिकहमौँनितहिवारि।मोहिंऐसितरुणिकहुकौननारि १
ये दांत गये मोर पान खात।औ केश गयल मोर गँगनहात २
औ नयनगयल मोरकजल देत।अरुवैस गयलपरपुरुषलेत ३
औ जान पुरुष वा मोर अहार।मैं अन जानेको कर श्रृंगार४
कह कबीर बुढ़ि या आनँद गाय । पूत भतारहि बैठी खाय५॥