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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 524

ते वही अपने स्वरूपको खोजैहैं सो किछु किछु कहे थोरहूते थोर जीव
पाइनहै और कोई नहीं पायो जे आपनो रूप मेरो रूप गुरुप्रताप जानि
शरीरको बिनैया मनको त्याग्यो है तेई पायो है अथवा किछु किछु कबिरन पाई
कहे साकल्य करिकै हमारो भेद तौ कोई जानतही नहीं है जे अपनो रूप मेरोरूप
जानत जे जीव ते किछु किछु भेद पायो है ॥ ६ ॥
इति दशवां कहरा समाप्त ।
अथ ग्यारहवां कहरा ॥११॥
ननँदी गे तैं विषम सोहागिनि तैं निदले संसारागे ।
आवत देखि एक सँग सूती तैं अरु खसम हमारागे ॥ १ ॥
मोरे बापकि दोय मेहरिया मैं अरु मोर जेठानीगे ।
जब हम ऐलि रसिकके जगमें तबहिं बात जग जानीगे २
माई मोर मुवल पिताके संगहि सर रचि मुवल संघातागे।
अपनो मुई और ले मुवली लोग कुटुम्ब सँग साथागे ॥३॥
जौ लौं सांस रहै घट भीतर तौ लग कुशल पर