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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

बसंत । ( ४८३ )
तेहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ जहँवां रोग शोक नहिं होई ।
सदा आनन्द करै सब कोई ॥ चन्द्र सूर्य दिवस नहिं राती । बरण भेद नहिं
जाति अजाती ॥ तहँवां जरा मरण नहिं होई । क्रीड़ा बिनोद करै सब कोई ॥
पुहुप विमान सदा उजियारा । अमृत भोजन करै अहारा ॥ काया सुन्दरको
परवाना । उदित भये जिमि षोड़श भाना ॥ येता एक हंस उजियारा ।
शोभित चिकुर उदय जनु तारा ॥ बिमल बास जहँवां पौढ़ाही । योजन चार
घ्रान जो जाही ॥ श्वेत मनोहर छत्र शिर छाजा । बूझि न परै रंक अरु
राजा ॥ नहिं तहँ नरक स्वर्गकी खानी । अमृत बचन बोलै भल बानी ॥
अस सुख हमरे घरन महँ, कहैं कबीर बुझाय । सत्य शब्दको जानै, सो
अस्थिर बैठै आय" ॥ ६ ॥ ७ ॥
इति पहिला बसन्त समाप्त ।
अथ दूसरा बसंत ॥ २ ॥
रसनापढ़िभूलेश्रीवसंत । पुनिजाइपरिहौतुमयमकेअंत॥१॥
जोमेरुदण्डपरडंकदीन्ह । सोअष्टकमलपरजारिलीन्ह॥२॥
तबब्रह्मअग्निकीन्होप्रकास । तहँअद्धऊर्ध्ववहतीबतास॥३॥
तहँनवनारीपरिमलसोगावँ।मिलिसखीपांचतहँदेखनजावैँ४
जहँअनहदबाजारहलपूर। तहँ पुरुष बहत्तरि खेलैं धूर ॥५॥
तैंमायादेखिकसरहसिभूलि । जसबनस्पतीबनरहलफूलि६
यहकहकबीरयेहरिकेदास । फगुवामांगैबैकुंठवास ॥ ७ ॥
रसना पढ़ि भूल श्रीबंसत।पुनि जाइ परिहौ तुम यमके अंत १
श्रीबसंत कहे ऐश्वर्यरूप जो बसंत ताको रसना में पढ़िकै मन बचनके
परे जो साहबके लोकको बसंत ताको तुम भूलि गयो । रसनामें पढ़ि जो कह्यो