सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 531

बसंत । ( ४८५ ) .
यह कह कबीर ये हरिके दास । फगुवा मागै वैकुण्ठ वास॥७॥
सो या हठयोग करिकै जानै कि मैं मुक्त होउँगो, तौ या समाधिमें मायाहीतें
नहीं छूट्यो मुक्त कहां होइगो । ताते श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीवात्मा !
हरिके दास तैं बैकुंठबासको फगुवामागै अर्थात् फगुहार फगुवा खेलाइकै
फगुवामागैं हैं सोतैंहठयोगकियो ताको फल फगुवा राजयोग मांगु जाते बैकुंठ
बासहोई ॥ ७ ॥
इति दूसरा बसंत समाप्त ।
अथ तीसरा बसंत ॥ ३ ॥
मैं आयउँमेहतरमिलनतोहिं।अबऋतुवसन्तपहिराउ मोहिं १
है लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुरा ना खुंटा तीन ॥२॥
शर लागे सै तीनि साठि । तहँ कस न वहत्तरि लागगांठि॥३
खुर खुर खुर खुर चलै नारि।वहबैठिजोलाहिनिपलाथिमारि४
सो करिगहमें दुइ चलाहिं गोड़ा।ऊपर नचनी नचि करै कोड़५
हैं पांच पचीसौ दशहु द्वार । सखी पांच तहँ रचीधमार ॥६॥
वें रंग विरंगी पहिरैं चीर । धरि हरिके चरण गावै कबीर ॥७॥
मैं आयउं मेहतर मिलन तोहिं।अबऋतुवसंतपहिराउमोहिं १
हैं लंबी पुरिया पाइ झीन । तेहि सूत पुराना खुंटा तीन ॥२॥
जीव कहैहैं मेह कही बड़ेको औ जो बड़ाते बड़ा होइ ताको मेहतर कहै हैं
फ़ारसीमें । सो ईश्वरनते ब्रह्मते जो बड़े श्रीरामचंद्रहैं तिनसों जीव कहै है कि,
मैं तुमको मिलन आयो हौं । सो जौने लोकमें सदा बसंत रहै है सो मोको
पहिराओ अर्थात् मेरो प्रवेश कराइ दीजे । ताना रूप जो मेरे शरीरकों बसंत
तातें छुड़ाइये ॥ १ ॥ सो लम्बी पुरिया कौन कहावै जो ताना तनै है पूरै है