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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 521

कहै कबीर सुनोहो सन्तो ज्ञानहीन मति हीनाहो ।
यक यक दिन यह गति सबही की कहा रावकादीनाहो ॥४॥
ऐसी देह निरानप है कहै अपनी नहीं है और सब अर्थ प्रगटई है श्री कबीरजी
कहैहैं कि जे मतिते हीन मूर्ख परम पुरुष श्री रामचन्द्रके ज्ञानते हीन रहैं तिनके
शरीरकी दशा ऐसे एक दिन सबकी है चाहै रंक होइ चाहै राउ होइहै ॥ ४ ॥
इति नवां कहरा समाप्त ।
अथ दशवां कहरा ॥ १० ॥
हौं सबहिनमें हौं नाहीं मोहिं विलग विलग विलगाई हो ।
ओढ़न मेरे एक पिछौरा लोग बोलहिं यकताई हो ॥ १ ॥
एक निरंतर अंतर नाहीं ज्यों घट जल शशि झाईहो ।
यक समान कोई समुझत नाहीं जरा मरण श्रम जाईहो॥२॥
रैनि दिवस मैं तहँवो नाहीं नारि पुरुष समताई हो ।
नामैं बालक नामैं बूढ़ो नामोरे चेलिकाई हो ॥ ३ ॥
तिरविधि रहौं सबनमें बरतौं नाम मोर रम राईहो ।
पठये न जाउँ आने नहिं आऊँ सहज रहौं दुनियाई हो ।
जोलहा तान बान नहिं जानै फाट बिनै दश ठाईहो ।
गुरुप्रताब जिन जैसो भाष्यो जिन विरले सुधिपाईहो॥५॥
अनंत कोटि मन हीरा वेध्यो फिटकी मोल न आईहो ।
सुर नर मुनि वाके खोज परे हैं किछु किछु कबिर न पाईहो ६
हौं सबहिनमें हौं नाहीं मोहिं विलग विलग बिलगाईहो ।
ओढ़न मेरे एक पिछौरा लोग बोलहिं यकताई हो ॥ १ ॥