कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५८ ) बीजक कबीरदास ।
पथिका पंथ बूझि नहिं लीन्हो मूढ़हि मूढ़ गवांराहो ।
घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु कैसेकै लगिहौ पाराहो ॥ ६ ॥
साहब जे श्रीरामचन्द्र तिनके पंथके चलनवारे जे पंथी संतजन तिनसों तौ
पंथ बूझि न लीन्हेउ मूढ़ जे गुरुवा लोग तिनकी बाणीमें परिकै मूढ़ हैगयो
गवांर हैगयो सो साहबके पहुंचबे को जो घाट ताको छोड़ि औघट जो माया
ब्रह्म तामें चलौहौ सो कैसे कै पार लागौगे ॥ ६ ॥
जतइतके धन हेरिनि ललइच कोदइतके मन दौराहो ।
दुइ चकरी जिन दरन पसारेहु तहँ पैहहु ठिक ठोराहो ॥७॥
जत इतके कहे जिनके जतदा चलै है सो जतइत कहावै है सो धोखा ब्रह्म
है जो सबको दरि दारै है सबको मिथ्यै मानै है तहां ललइच जे लालची हैं
ते धन जो मुक्ति ताको हेरिनि सो उहाँ न पाइन तब कोदइत जे गुरुवालोग
जिनके नाना उपासनारूपको दौरा जाय है तिनके इहांगये कि यहां मुक्तिधन
मिलैगो सो कबीर जी कहैं हैं कि जतइत के तो धनको ठिकानै न लग्यो तौ कोद-
इत जे माटीके दुइ चकरी बनाइ दरना पसारै हैं तहां ठीकठौर पैहौ ? अर्थात् न
पैहौ साहब को जानोगे तबहीं ठिकान लागैगो ॥ ७ ॥
प्रेम बाण यक सतगुरु दीन्हो गाढ़ो खैंचि कमाना हो ।
दास कबीर कियो या कहरा पहरा माहिं समाना हो ॥८॥
श्री कबीरजी कहैहैं कि हे जीवौ ! तुम यामें पार न जाउगे जब ऐसो करौ
तब पारै जाउगे।प्रेमको तो बाण करु औ सतगुरु जो ज्ञान दीन्हो है ताको कमान
करि गाढ़ो खैंचि साहबरूप जो निशान है तामें प्रेमबाण मारु अर्थात् प्रेम
लगाउ । हे साहब को सदाको दास ! कायाकेबीर जीव या कहरा में संसार को
कहर है सो कहा कियो है, महरा माहिं समाना कहे जे साहब के महरमी हैं
तेहीमें समाय अर्थात् उन्हींको सत्संग करु । कहू गाढ़ो खैंचि कमाना यही पाठ
है।अथवा हे कबीर ! कायाके बीर जीव मन माया ब्रह्मके दास हैं यहि संसार तें