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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 506

( ४६० ) बीजक कबीरदास ।
हे बौर जो ऊपर बहुत ऊजर बनेरह्यो बहुत आचार कियों तौ कहा भयों
भीतर तो अजहूं करिये हो औ तनकी बड़ी वृद्धता मान्यो तौ हे बौरे ! कहा भयो
मनतो अजहूं बारो कहे लरिकवा बनाहै वही चाल चलैहै ॥ २ ॥ औ मुखकें
दांत गिरिगेये तौ हे बौरे कहा भयो अन्तःकरणके जे बिषय के चना चाबन-
वारे ऐसे लोहेके दांततो गैषे न भये काम क्रोध मद लोभ बनेनहैं मिटबै न भये ॥ ३ ॥
तनकी शक्ति सकल घटि गयऊ मनहिं दिलासा दूनीहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतौ सकल सयानप ऊनीहो ॥ ४ ॥
हे बौरे ! तनकी सकल कहे रूप बिषय करनवाली सामर्थ्य घटिगई औ संगी
मरिगये पै दिलकी दिलासा जो तृष्णा सोतौ घटिबे न भई सो कबीरजी कहै
हैं कि हे संतो ! तुम सुनो या सब जीवनकी सयानपऊनी है अर्थात् तुच्छ है
बिना रामनाम के जाने जनन मरण न छूटैहै तामें प्रमाण कबीरजीका ॥
“ जोतै रसना राम न कहिहै । उपजत बिनशत भरमत रहिहै ॥ जस देखी
तरुवरकी छाया । प्राणगये कहु काकी माया ॥ जीवत कछु न किये परमाना ।
मुये मर्म कहु काकर जाना । अंत काल सुख कोउ न सोवैं । राजा रंक दोऊ मिलि
रोवैं ॥ हंस सरोवर कमल शरीरा । राम रसायन पिवै कबीरा ॥ ४ ॥ ”
इति तीसरा कहरा समाप्त ।
अथ चौथा कहरा ॥ ४ ॥
ओढ़न मेरा रामनाम मैं रामहि को बनिजारा हो ।
रामनामका करौं बनिजमैं हरि मोरा हटवाराहो ॥ १ ॥
सहस नामको करौं पसारा दिन दिन होत सवाईहो ।
कान तराजू सेर तिन पौवा डहकिन ढोल बजाईहो ॥ २ ॥
सर पसेरी पूरा करि ले पासंघ कतहुं न जाईहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो जोरि चले जहडाई हो ॥ ३ ॥