कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४५५ )
अक्षत नौका जो राम नाम है ताको खेवै न जान्यो कहे जौनै बिधिते संसार
सागरते पार कै देइ है सो विधि राम नाम जपिबेकी न जान्यो । सो कैसे
संसार सागरते पार ह्वैकै तीर लागौगे ? सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जोलहा
कहे जो कोई राम रस लहाहै अर्थात् राम रस पाय मातो है सोई संसार साग-
रको पार पायो है, सोई कायाको बीर जीव परम पुरुष श्रीरामचन्द्रको दास
भयो है । १ जो “ माते ” पाठ होय तो या अर्थ है कि, कबीरजी कहै हैं कि,
जातिको मैं जोलहा सो राम के रसमें मातेते मैं दास कबीर कहवावन लग्यो ।
पार्षदस्वरूप जो हंस स्वरूप याही शरीरमें पाय गयो, संसारको पार ह्वैगयो ।
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको दास ह्वै गयो । तुम ब्राह्मणादिक जो रामरस में मतौगे
तौकैसे संसारसागरते ना पार होउगे, पारही ह्वै जाउगे । कबीरजी रामरसमें
मतिकै बचिगये तामें प्रमाण ॥ सायरबीजकको ॥ “हम न मरैं मरिहै संसारा ।
हमको मिला जियावन हारा ॥ अब ना मरौ मोर मन माना । तेई मुवा जिन
राम न जाना ॥ साक्त मरै संत जन जीवै । भरि भरि राम रसायन पीवै” ॥ १५॥
इति पहिलाकहरा समाप्त ।
अथ दूसरा कहरा ॥ २ ॥
मति सुनु माणिक मति सुनुमाणिक हृदया वंदि निवारौहो १
अटपट कुम्हरा करै कुम्हरिया चमरा गाउ न बांचैहो ।
नित उठि कोरिया वेट भरतुहै छिपिया आंगन नाचैहो॥२॥
नित उठि नौवा नाव चढ़त है बरही वेरा वारिउ हो ।
राउरकी कछु खबरि न जान्यो कैसे झगर निवारिउहो॥३॥
१ याग्रन्थमें भी और और ग्रन्थनमें भी टीकाकार वारवार कबीरजीको अजन्मा कह
गये हैं संसारमें केवल साहबकी आज्ञाते आवै हैं ते कोई गर्भ ते उनको आवनो होय नही
है याते ऊपर को अर्थ ही ठीक है नीचे को अर्थ क्षेपक जानपरत है पीछे से कोई लिखि
दियो है ।