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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 502

( ४५६ ) बीजक कबीरदास ।
एक गांवमें पांच तरुणि बसैं तिनमें जेठ जेठानी हो ।
आपन आपन झगर पसारिनि प्रियसों प्रीति नशानीहो ४
भैंसिन माहँ रहत नित बकुला तकुला ताकि न लीन्हाहो।
गाइन माहँ बसेउं नहिं कवहूं कैसेकै पद चीन्हा हो ॥५॥
पथिका पंथ बूझि नहिं लीन्हो मूढ़हि मूढ़ गवाराहो ।
घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु कैसे लगबेहु पाराहो ॥ ६ ॥
जत इतके धन हेरिनि ललइच कोदइतके मन दोराहो ।
दुइ चकरी जिन दरन पसारिहु तब पैहौ ठिक ठोराहो॥७॥
प्रेम बान एक सतगुरु दीन्ह्यो गाढो तीर कमानाहो ।
दासकबीर कियो यह कहरा महरा माहि समानाहो ॥८॥
मति सुनु माणिक मति सुनु माणिक हृदया बंदिनिवारोहो १
श्री कबीरजी कहैहैं कि हेजीव ! तैंतो माणिक है माणिक लाल होयहैं सोतैं
कहां संसारमें अनुराग करिकै लाल हैरहे साहब में अनुराग करि लाल होइ
गुरुवा लोगनकी वाणी तैं मति सुनु मतिसुनु आपने हृदयकी जो संसाररूपी
बंदि ताको निवारु ॥ १ ॥
अटपट कुम्हरा करै कुम्हरिया चमरा गाउ न वाचैहो ।
नित उठिकोरिया बेट भरतुहै छिपिया आंगन नाचैहो २॥
काहेते कि अटपट कुम्हरा जो या मन है सो कुम्हरिया करै है कहे नाना
शरीर रचैहै जैसे कुम्हार नाना बासन बनावै है ऐसे या मन नाना शरीर रचैहै
सो शरीर जो गाउं है तौन चमरा कालके मारे नहीं बचैहै मन रचत जाइहै
शरीर काल खात जाइ औ कोरिया जे मुनि लोग हैं सत रज तम ग्रन्थ प्रवर्त्त-
नवारे ते बेट भरतं हैं कहे बनावत जाइहैं तेई ग्रन्थनको लैके छिपिया जे
गुरुवा लोगहैं ते आंगन आंगन नाचै हैं अर्थात् चेला हेरत फिरै हैं नाना मतमें
होकै औरनको नाना मतमें लगावत फिरै हैं ॥ २ ॥