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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 500

( ४५४ ) बीजक कबीरदास ।
गुरु भो ढील गोन भो लचपच कहा न मानहु मोरा हो ।
ताजी तुरकी कबहूं न साजेहु चढ़े न काठके घोरा हो ॥१३॥
जो गुरुवा लोग तुमको उपदेश कियो ते गुरु ढील है गये काहेते कि, जौन
जौन उपासना की गोन तुम्हारे ऊपर लादि दियो तेते देवता लचपच हैगयें
कहे उनके छुड़ायेते ना छूटे संसारमें परे जाय । देवता के फुरते न उत फुर होइहै
नइत; जब देवतै न फुरे तब गुरुवा ढील परिगयो । सो कबीरजी कहै हैं कि,
जो मैं कहत रह्यो सो तुम ना मान्यो कि, रकार मकार जपौ याहीते छूटौगे
ताजी तुरकी जो रकार मकार ताको कबहूं न साज्यो कहे कबहूं राम नाम
ना लियो जो साहबके पास लैजाय । काठको घोरा जो है मन जड़ तामें चढ़यो
सो कूदिकै संसार गाड़में डारि दियो जो ताजी तुरकी रामनाम तामें चढ़त्यो
तौ तुमको कूदिकै साहब के पास पहुंचावतो ॥ १३ ॥
ताल झांझ भल बाजत आवै कहरा सब कोइ नाचै हो ।
जेहि रंग दुलहा ब्याहन आये तेहि रंग दुलहिनि राचै हो १४
गुरुवा लोगनकी ओठ झांझ है औ जीभ ताल देइहै वही ब्रह्मही में ताल
देइहै कहे नाना बाणी करिकै नाना मतन करिकै वही ब्रह्ममें चुवावै है ।
अथवा जाको जौन उपासना बतावै है ताको तौन इष्ट देवता है ताहीको ब्रह्म
कहैं हैं ताहीको सब कुछ कहैं हैं, उहै तालको मान देइहैं अर्थात् सब शास्त्रको
अर्थ वाहीमें पर्यावसानकरै हैं । और गुरुवनमें लगिकै सुखबाचक जौ कतौ न
हरा गये कहे परम पुरुष श्रीरामचंद्र को भूलि गये । संसार में सब जीव दुखि-
या है नाचन लगे । कोई रजोगुणी उपासनामें रचत भये, कोई तमोगुणी उपा-
सनामें रचत भये, कोई सतोगुणी उपासना में रचत भये । जेहि रंग दुलहा
जे उपासना वारे जीव ब्याहन आये कहे गुरुवा लोग जौन रंगमें लगायो तेहि
रंगमें दुलहिनि बुद्धि रचत भई ॥ १४ ॥
नौका अक्षत खेवै नहिं जान्यो कैसेहु लागहु तीरा हो ।
कहै कबीर राम रस माते जोलहा दास कबीरा हो ॥ १५ ॥