कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 517, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४७१ )
अथ सातवां कहरा ॥ ७ ॥
रहहु सँभारे राम विचारे कहत अहौ जो पुकारेहो ॥ १ ॥
मूड मुड़ाय फूलिकै बैठे मुद्रा पहिरि मँजूसाहो ।
ताहि ऊपर कछु छार लपेटे भितर भितर घर मूसाहो॥२॥
गाउँ वसतहै गर्व भारती माम काम हंकाराहो ।
मोहिनि जहां तहां लै जैहै नहिं पति रहे तुम्हारा हो ॥ ३ ॥
मांझ मँझरिया बसै जो जानै जन हैहै सो थीराहो ।
निर्भय गुरु कि नगरिया तँहवां सुख सोवै दास कबीरा हो॥४॥
रहहु सँभारे राम विचारे कहत अहौ जो पुकारे हो॥१॥
मूड मुड़ाय फूलिकै बैठे मुद्रा पहिरि मँजूसा हो ।
ताहि ऊपर कछु छार लपेटे भितर भितर घर मूसाहो२॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि पुकारे कहौ हौं कि श्री रामनाम को बिचारत हे
जीवौ! यह मनको सँभारे रहौ अनत न जान पावै मैं पुकारे कहौहौं अनत जायगो
तौ मारो जायगो ॥ १ ॥ ऊपरते मूड़ मुड़ायकै कानेमें मुद्रा पहिरिकै अंगमें
छार लपेटिकै मंजूसा कहे गुफामें बैठे औ प्राण चढ़ाइक मानन लगे कि हमहीं
ब्रह्म हैं सो ऊपरते तो बहुत रंग कियो पै भीतर भीतर उनको घर मूसि
गयो कहे साहबको भूलिगये ॥ २ ॥
गाउँ वसतहै गर्व भारती माम काम हंकारा हो ।
मोहिनि जहां तहां लैजैहै नहिं पति रहै तुम्हारा हो॥३॥
यह शरीररूपी जो गाउँ है तामें गर्वको जो भाराहै सो थिर भयो कहे यह
मान्यो कि यह शरीर मेरोहै तब माम जो है ममता औ कामादिक जे हैं अहं-
कार तेहिते भरि गयो सो श्री कबीरजी कहैं हैं कि मोहनि जो है मोहि ले