कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४५३ )
पेलना अक्षत पेलि चलु बौरे तीर तीर कहँ तोवहु हो ।
उथले रहौ परौ जनि गहिरै मति हाथै कै खोवहु हो १०
: सो कबीरजी कहैहैं कि, पेलना जो राम नाम सो अक्षत बनै है ताकों संसार
समुद्रमें पेलिकै हे जीव ! संसारसमुद्र उतरिजा । तीर तीर कहे नाना मतनको
का टोवत फिरै है उथले में रहौ अर्थात् साहब को ज्ञान कीन्हे रहौ । गहिर
जो धोखा ब्रह्म कठिन तामें न जाउ । वहां गये तुम्हार हाथहुको जीवत्त्व सों
जातरहैगो ताते तुम न खोवौ उथले कहे साहबको ज्ञान जानौ ॥ १० ॥
तरकै घाम ऊपरकै भूभुरि छांह कतहूं नहिं पावहु हो ।
ऐसो जानि पसीजहु सीजहु कस न छतरियाछावहुहो ११
तरके घाम कहे नाना कर्म जे नीकौ नागा कियो ताकी जो ताप संसारमें
ऊपरकी भूभुरि कहे नरक में गये तौ वहौं तपै है, स्वर्ग में गये तौ गिरनकी
भय बनी है, काहू को अधिक ऐश्वर्य देख्यो तो ईर्षा बनी रहैहै कि, ऐसो
कर्म हम न किये । ये दोऊ तापमें साहबको ज्ञान रूप छांह कतहूं नहीं पावैहै
ऐसो तुम जानतौहौ पै वही में पसीजौ हौ कहे श्रम करौ हौ पसीना चलैहै औ
छीजौहौ साहबकी ज्ञान रूप छतरिया काहे नहीं छावहुहौ ॥ ११ ॥
जो कछु खेल कियो सो कीयो बहुरि खेल कस होई हो ।
सासु ननँद दोउ देत उलाटन रहहु लाज मुख गोई हो १२
जो कछु खेल कियो कहे जो कछु कर्म कियो सोई भोग कियो । अथवा
जौन खेल माया ब्रह्मको साथ करिकै कियो सोई फल भोग कियो । सो बिना
राम नाम लीन्हे इनको छोड़िकै फेर खेल कियो चाहौ मुक्तिवाला सो कैसे
होइगो । सासु जो है मूल प्रकृति औ ननँदि जो है विद्या माया सो ये दोनों
तुमको उलाटन कहे उलटिकै जवाब देइहै कि, बिद्या माया करिकै मुमुक्षुहै
मुक्तिकी इच्छा करत रह्यो । सो अब हम तुमहींको लपेटि लियो तुम हमकों
त्यागत रह्यो है अब नहीं छूटि सकौहौ । या जवाब सुनि तुम लाजिकै मुखगोइ
रहौहौ लाचार ह्वै छूटि नहीं सकौहौ ॥ १२ ॥