कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४६९ )
छोरि लियो और और तिहारो साहब बनाइ दियो सो कबीरजी कहै हैं कि जों
ऐसो मनुष्य शरीरमें साहबको ज्ञान न भयो किमैं साहबको हौं तो या अवसर
बीति गये कहे या शरीर छूटिगये फेरि रतन जोहै आपने स्वरूपको ज्ञान कि
मैं साहब को अंशहौं सो पुनि न मिलैगो औ साहबको ज्ञानकै देनवारो राम
नाम न मिलैगो औ आगे जे कहि आये पंचांगोपासनवारे कापालिकादिक मतवारें
व्याकरणी सांख्य मीमांसावारे नैयायिक कणादवारे शंकरवेदांती नास्ति-
क मतवारे जो या कहै हैं कि हमारे मतमें काहे मुक्ति नहीं होय है सो कहै
हैं पंचांगोपासना तौ सगुणहै सो सत रज तम ये गुण माया के हैं सो मायाते
माया नहीं छूटै है या असंभवहै औ कापालिकादिक व्याकरणादि भैरवको मानै
हैं सो वेद विरुद्धहै ई मुक्तिदाता कोई नहीं हैं तामें प्रमाण॥ “मुक्तिदाता च सर्वे-
षborderं राम एव न संशयः ॥” औ वैयाकरण शब्दब्रह्मते मुक्ति मानै हैं सो केवल
शब्दब्रह्मके जाने मुक्ति नहीं होयहै जब शब्दब्रह्मकों जानिकै परब्रह्मको जानै
तब मुक्ति होइहै तामें प्रमाण॥ “शब्दे ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि ।
श्रमस्तस्य श्रमफलोह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ ” औ ज्योतिषी कालज्ञानते मुक्ति मानै
हैं सो कालहूके कालजे श्री रामचन्द्रहैं तिनके बिना जाने मुक्ति नहीं होयहै
तामें प्रमाण ॥ “ यः कालकालो गुणी सर्ववेत्ता ” ॥ औ सांख्यवारे प्रकृति
पुरुषते मुक्ति मानै हैं सो पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रहैं तिनके विनाजाने मुक्ति नहीं
होयहै तामें प्रमाण ॥ “ वन्दे महापुरुष ते चरणारविंदम् ॥” औ पूर्वमीमां-
सावारे कर्म ते मुक्ति मानै हैं सो कर्म ते मुक्ति नहीं होय है कर्म त्यागेते मुक्ति
होयहै तामें प्रमाण ॥ “न कर्मणा न प्रजयाधनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ”
इति श्रुतेः ॥ औ नैयायिक ईश्वर श्री रामचन्द्रही हैं तामें प्रमाण॥ “ तमीश्व-
राणां परमं महेश्वरं”॥औ कणादवारे नौगुणध्वंस मुक्ति मानै हैं सो नौ गुणध्वंसही
मुक्ति नहीं होयहै नौगुणध्वंस भये उपरांत जब भक्ति होयहै तब मुक्ति होयहै तामें
प्रमाण ॥ “ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा नशोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं
लभते परां”॥औ शङ्कर वेदांती ब्रह्म ज्ञान करिकै मुक्ति मानै हैं सो जीव ब्रह्म कभी
होतही नहीं है तामें प्रमाण ॥ “सत्य आत्मा सत्यो जीवः सत्यंभिदःसत्यंभिदः ॥
औ नास्तिक चारि प्रकारके हैं-सौगत १ बिज्ञानबादी २ सौ-