कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४६१ )
ओढन मेरो रामनाम मैं रामहिंको बनिजारा हो ।
रामनामको करौं बनिजमैं हरि मोरा हटवारा हो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि पांखण्डी लोग जे हैं ते कहै हैं हमारो ओढ़न राम-
नामही है अर्थात् राम नामही के ओढ़नते ठगि लेहिंहैं । परम तत्त्व जो रामनामहैं
तौनेको ठगिवेको ओढ़र बनाये हैं काहे न मारे परैं ? कौन तरहते कि बड़े बड़े
टीका दैलिये माला जपै हैं न रामनाम को तत्त्व जानैं न अर्थ जानैं न जपैके
विधिजानैं न नामापराध दश जानैं औ या कहै हैं कि हम रामनामको बनिजारा
हैं औ रामनामकी बनिज करैहैं औ हरि जे हैं तेई हमारे हटवारे हैं कहे दलालहैं
अर्थात् हम उनहींके द्वारा सब रामनामको सौदा लेहिहैं उनकी प्रेरणाते हम
मन्त्र देइ हैं जो वाके भागमें होयगो सो होयगो हमारो पैसा धोतीतो हाथकों
न जायगो। जो कोई कहै है कि शिष्य परीक्षा कै लेउ तो या कहै हैं कि कहांको
बखेड़ा लगायो है हम मन्त्र दैदियो वह जो चाहै सो करै मुक्त होइ जाइगो ॥ १ ॥
सहस नामको किये पसारा दिन दिन होत सवाईहो ।
कान तराजू सेर तिन पौवा डहकिन ढोल बजाईहो॥२॥
औ या कहै हैं कि एक नामके लीन्हेते सर्व कर्म छूटि जाइहैं हम तो हजा-
रन नाम लेइहैं कर्म कहां रहेंगे सब छूटि जायेंगे हमारे सुकर्म दिन दिन सबाई
बढ़ेंगे। सो दोउ गुरु चेलनको ऐसो हवालहै चेलनके कान जे हैं तेई फेरहा तर
जुवा है औ तीनपावका सेरहै अर्थात् त्रिगुणात्मक मन है सो मन बचन के परें
जो रामनाम सो गुरुवालोग तौलि दियो अर्थात् मन्त्र दियो। डहकिन ढोल बजा
ई कहे चेला लोग चारिउ ओर कहि आये कि हम मन्त्र लियो है कै डहकाइ
गये ढोल बजाइ ॥ २ ॥
सेर पसेरी पूरा करिले पासँघ कतहुं न जाईहो ।
कहै कबीर सुनोहो संतो जोरि चले जहडाईहो ॥३॥
गुरुवनके उपदेशते सेर जो है मन पसेरी जो है ब्रह्मज्ञान सो पूरो करीलै
अर्थात् सर्वत्र ब्रह्मको पूर्णे मानै परंतु पसंघा जो मूलाज्ञान सो कतहूं न जायगो
वाहीमें परिकै अन्तकाल में जहडायकै कहे डहकाय चले जायँगे ॥ ३ ॥
इति चौथा कहरा समाप्त ।