कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 503, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४५७ )
नित उठि नौवा नाव चढ़तहै वरही बेरा वारिउ हो ।
राउरकी कछु खबरि न जान्यो कैसेकै झगर निवारिउहो ३
नौवा जो संन्यासी जौन आपनो मूड मुड़ावैहै आनौ को मूड़ि कै चेला
बनाइ लेइहै सो वेषमात्र जो नाव तामें चढ़िकै संसार समुद्र पार होवा चाहै है
औ नाना देवतन प्रतिपाद्य जे ग्रन्थ तेई हैं बरही कहे बोझा ताहीको बेरा
रचि वारी जे नाना उपासना वारे हैं ते संसार समुद्रको पार होवा चाहै हैं । राउर
जो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्रको घर ताको जानतई नहीं या झगरा कैसेकै
निवारण होई । साहेबते तो चिन्हारिनि नहीं है कबहूं माया पकरि लेइहै कबहूं
ब्रह्म पकरि लेइहै कबहूं मन पकरिलेइ है इत्यादिक जेई पावैहैं तेई धरि
लेइ हैं सो कैसेकै झगड़ा निवारण होइ ॥ ३ ॥
एक ग्राममें पांच तरुणि बसैं तिनमें जेठ जेठानी हो ।
आपन आपन झगर पसारिनि प्रियसों प्रीति नशानीहो ४॥
एकगांव जो या संसार तामें पांच तरुणि जे ज्ञानेंद्री ते बसै हैं ज्ञानेंद्री कहेते
कर्मेंन्द्रिउ आइ गईं, तिनमें जेठ मन जेठानी माया है सोई दशौ इंद्री आपन
आपन झगर कहे अपने अपने विषय ओर मनको खैंचत भई सो मनके अधीनहै
जीव सोऊ वही कत चलो गयो परम पुरुष पर जे श्री रामचंद्र प्रीतम हैं तिन
सों प्रीति नशाइ गई ॥ ४ ॥
भैंसिन माहँ रहत नित बकुला तकुला ताकि न लीन्हाहो ।
गाइन माहँ बसेहु नहिं कबहूं कैसेकै पद चीन्हाहो ॥ ५ ॥
सो भैंसीजे दशौ इंद्री हैं तिनमें बकुला जो मन सो रहैहै जैसे भैंसी जब
जलमें पैरहैं तब बकुला वाके ऊपर बैठ रहैहै जो मछरी भैंसिनके किलनी
खाबेको आई सो बकुला खाय लीनो ऐसी इन्द्री जब विषय ओर चली तब
मनहीं भोग करै है इंद्रीद्वारा ताते मनको बकुला कह्यो है सो हे जीव ! तैंतो
तकुलाहै कहे ताकनवारो है काहे न ताकि लीन्हा औ साहब के गावन वारे
जे संत तिन गाइन में कबहूं बसबै न कियो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र को
पद कैसेकै चीन्हो ॥ ५ ॥