कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६८ ) बीजक कबीरदास ।
जैसे सेमरके फलको सुवासेयों चोंच चलायो जब वामें धुवानिकस्यो तब
भोजनते ऊन कहे खाली परचो भोजन न पायो तब पछितायकै कहे जहड़ि कै
भोजन दहकायकै चल्यो । ऐसे जीव नाना मतन में परिकै मुक्ति चाह्यो जब मुक्ति
न पायो तब मुक्ति दहकाइकै संसारमें परचो औ जैसे मदिप कहे मतवार गांठी
को द्रव्य दैकै मद पियो घरौकी अकिल गँवायदियो तैसे गुरुवा लोगनको गांठी
की द्रव्य दैकै मन्त्र लैकै और और मतनमें लगिगये घरोंकी अकिल गँवाइ
दियो कहे साहबको सदा को दास है जीव सो आपने स्वरूपको भूलि गयो ॥२॥
स्वादे उदर भरत धौं कैसे ओसै प्यास न जाईहो ।
द्रव्यक हीन कौन पुरषारथ मनहीं माहँ तवाईहो ॥ ३ ॥
जौने मतमें स्वादपायो सो तौनेही मतमें लग्यो सो ओसते कहूं पियास बुझाईहै
ओसपरो सो ओसको जलको स्वाद मुखमें आयो सो कहा स्वादते पेट भरे है नहीं
भरै है तैसे जीव नाना मतमें लग्यो नाना साधन करन लग्यो औ वे देवतन-
के लोक न गयो अथवा ब्रह्मज्ञान सिद्ध भयो अथवा आत्मज्ञान सिद्धभयो
इत्यादिक सब सिद्धि भयो किंचित् सुख पायो तेतो ओसको चाटिबो है कहा
मुक्तिहोइ है नहीं होय है औ द्रव्य का हीन जो पुरुषारथ है सो कौन पुरुषार
थहै मनमें बहुत बिचार करै है कि वाको दशहजारदेउं वाको पांच हजार देउं
जब द्रव्य की सुधि आई सो द्रव्य तो हैई नहीं है तब मनै में तवाई होयहै कि
हाय का करौं ऐसे नाना मतनमें लगे पाछे पछिताउ होयहै अन्तकाल में मैं
कहा कियो साहबमें न लाग्यो जाते मुक्तिहोती ॥ ३ ॥
गांठी रतन मर्म नहिं जानेहु पारख लीन्ही छोरीहो ।
कह कबीर यह अवसर बीते रतन नमिलै बहोरी हो॥४॥
या जीव सदाको साहबको अंशहै सो या रतन तुम्हारे गांठी में है ताको
यह राम नामते पारिख करिकै छोरि लेउ साहबके गुण जीवों में हैं वे बृहत्
चैतन्यहैं यह अणुचैतन्यहैं वे घन रस रूपहैं या लघु रसरूप हैं ऐसो जो शुद्ध आपनो
रूप जानै तौ रतन तेरे गांठीमें है ताको मर्म तुम रामनाम बिना नहीं जान्योकि
वा साहब कोहै मन माया ब्रह्मको नहीं है काहेते कि गुरुवालोग तिहारी पारख