कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहरा । ( ४६३ )
या संसार असारको धंधा अन्तकाल कोइ नाहींहो ।
उपजत विनशत बार न लागै ज्यों बादरकी छाहींहो॥३॥
या संसार असार कहे झूठहीको धंधाहै अंतकालमें कोई आपनो नहीं है
जोकहो कि हम जाबही न करेंगे बनेही रहेंगे तो शरीरके उपजत विनशत में
बार नहीं लगैहै जैसे बादरकी छाहीं भई औ पुनि मिटिगई ॥ ३ ॥
नाता गोता कुल कुटुम्ब सब तिनकी कवनि बड़ाईहो ।
कह कवीर यक राम भजे विन बूड़ी सब चतुराईहो॥४॥
बड़े गोतके भये बड़े कुल के भये बड़ी बड़ी जातिके नात भये तिनकी
कौन बड़ाईहै ये तो सब शरीरही के हैं जब तेरो शरीर छूटि जायगो तब तेरो
शरीरही कोई न छुवैगो ताते ये सब नात गोत जबभर शरीर बनोहे तबहीं
भरेके हैं शरीर छूटे ये सब छूटि जाइहैं इनकी कौन बड़ाई है। सो श्री कबीरजी
कहै हैं कि, एक जे परमपुरुष पर श्री रामचन्द्रहैं तिनके रामनाम के भजे कहे सेवा
किये बिन सब चतुराई तिहारी बूड़ि जायगी नरकहीको जाउगो। जेजे अपनी २
कल्पना ते नाना उपासना कैलियेहो तिनते चाहोहो कि हमारी मुक्ति है जायगी
ते एकहू काम न आवैगो तामें पमाण श्री गोसाईंजी को पद ॥ “ राम
कहत चलु राम कहत चलु राम कहत चलु भाईरे। नाहिंतो भव बेगारि में परिहौ पुनि
छूटब अति कठिनाईरे । बाँस पुरान साजु सब अटपट सरल त्रिकोण खटोलारे ।
हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद मंद मोल विन डोलारे। बिषम कहारमार मद-
माते चलैं न पाय बटोरैरे । मंद बेलंद अभेरा ढलकनि पाई दुख झकझोरैरे ।
कांट कुराय लपैटन लोटन ठामहिं ठाम बझाऊरे । जस जस चलिये दूरि निज
तस तस बांसन भेंट लकाऊरे । मारग अगम संग नहिं संबल नाम गामकर
भूलारे । तुलसि दास भवआश हरहु अब होहु राम अनुकूलारे ॥ १ ॥
अर्थ—राम कहत चलु राम कहत चलु राम कहत चलु भाई रे॥ गोसाईंजी
जीवन को उपदेश करैहैं यहां राम कहतचलु तीनि बारकह्यो सो मुक्त मुमुक्षु
विषयी तीनों जीवन को कहैहैं सो गोसाईंजी अपनी रामायणमें कह्योहै चौ०॥
“विषयी साधक सिद्ध सयाने । त्रिविध जीव जग वेद बखाने ॥ राम सनेह