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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

शब्द । ( २१५ )

जीव ताहीको मालिक बतावैं हैं । और चेला जे हैं तिनहूं को मायाके चहलामें
ढोरहैं ऐसो न्याउ निबोरैंहैं । भाव यहहै कि, भैंसा यमकी असवारी है सो
यमही पुर को लैजाइगो । तहां जब यमके लट्ठा लगैंगे तब गुरुवाई निकसि
आवैगी ॥ ४ ॥
इति नवमशब्द समाप्त ।
अथ दशवां शब्द ॥ १० ॥
( मजहब )
सन्तो राह दुनों हम डीठा ।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं मानैं स्वाद सबनको मीठा ॥ १ ॥
हिन्दू व्रत एकादशी साधैं दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागैं मन नहिं हटकैं पारन करे सगोती ॥ २ ॥
तुरुक रोजा नमाज गुजारैं बिसमिल बाँग पुकारैं ।
उनकी भिंइत कहांते होइ है सांझै मुर्गी मारै ॥ ३ ॥
हिन्दूकि दया मेहर तुरुकनकी दूनों घटसों त्यागी ।
वै हलाल वै झटका मारैं आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दू तुरुक कि एक राहहै सद्गुरु इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनौ हो संतो राम न कहेउ खोदाई ॥ ५ ॥
सन्तो राह दुनों हम डीठा ।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं मानैं स्वाद सबन को मीठा ॥ १ ॥
हे संतो! हम दुनोंकी राह डीठा कहे देखी दुनोंकी एकई राह है सो हमारो
हटको कोई नहीं मानै है । हम सबको समुझावते हैं कि विषयनको छोड़िकै
देखो तो दुनोंकी राह एकई है सो दुनों दीनको विषयनको स्वाद मीठो लग्यो
है यहीके मिलनकी उपाय करैं हैं साहबको नहीं खोजैं हैं ॥ १ ॥

( २१६ ) बीजक कबीरदास ।
हिन्दू ब्रत एकादशि साधैं दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागैं मन नहिं हटकैं पार न करें सगोती ॥ २ ॥
तुरुक रोजा नमाज गुजारैं विसमिल बाँँग पुकारैं ।
उनकी भिश्त कहांते होइहै सांझै मुर्ग़ीमारैं ॥ ३ ॥
हिन्दू जे हैं ते अन्नको त्यागिकै एकादशी व्रत साधै हैं कहे उपासे रहै हैं
औ फलाहार करै हैं । औ बिहान भये नानाप्रकारके व्यंजन बनाइकै सगे जे हैं
गोतीभाई तिनको लैके पारण करै हैं औ मनको नहीं हटकै हैं कहेदशौ इन्द्रिय
ग्यारहौं मनको नहीं हटकै हैं अर्थात् यह एकादशी नहीं करै हैं । अथवा जैसे
सगोतीमें कहे सगाई में अर्थात् जैसे बिवाहमें जाफतमें खाय हैं तैसे पारण
करै हैं ॥२॥ औ मुसल्मान रोजा रहै हैं औ नमाज गुजारैहैं औ बिसमिल्लाको
बांग दैके पुकारैं हैं औ सांझको मुर्गी मारिके पोलाव बनाइ खाय हैं सो कहोतो
उनकी भिश्त कैसे होइगी ॥ ३ ॥
हिन्दू किं दया मेहर तुरुकनकी दूनों घट सों त्यागी ।
वे हलाल वे झटका मारैं आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दूकी दया तुरुककी मिहर है जो हिन्दू दया करत तौ यम ते छूटत
अरु जो मुसल्मान मिहर करत तौ यमते छूटत । सो ये दोऊ दया औ मिहर-
को आपने घटते त्यागि दियो है मुसल्मान कहैं हैं कि गलेकी रगसेभी अल्लाह
नगीचहै औ घट घट में मौजूदहै औ गला काटतई हैं सो गौ सेइकै गला
काटते हैं औ हिन्दू कहैं हैं कि ब्रह्मसर्वत्र पूर्ण है औ झटका मारैं हैं कहैं मूड़
काटिडारै हैं सोऊ ब्रह्म की ही गलाकाटै हैं या प्रकार ते कबीर जी कहै हैं कि
दूनों घरमें आगिलगी है यह अज्ञानरूपी आगि दूनों की बुद्धिको दाहे
डारै है ॥ ४ ॥
हिंदू तुरुक कि एक राह है सतगुरु इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो राम न कहौ खोदाई ॥ ५ ॥
हिन्दू मुसल्मानकी एकै राहहै राम न कह्यो खोदाइ कह्यो खुदा न कह्यो
राम कह्यो । नाम सब वही बादशाहके हैं सो वह बादशाहको हिन्दू तुरुककी

शब्द। (२१७)
एतीबड़ी गुस्ताखी कव नीक लगेगी। अथवा हिन्दू तुरुक की एक राहहै कहै
एक रामनाम लियेते उद्धार होईहै सो कर्मते निवृत्त ह्वैकै न हिंदू राम कहैं न
मुस्लमान खोदा कहैं आपने आपने कर्म में सब लगे हैं तेहिते माया कैसे छूटै।
अथवा न नारायणराम कह्यो कि तुम झटका मारौ न खोदा इकह्यो कि तुम
हलाल करौ ये दोऊ अपने अज्ञानते बनाइ लियो है ॥ ५ ॥
इति दशवां शब्द समाप्त ।
अथ ग्यारहवां शब्द ॥ ११ ॥
( ब्राह्मण )
संतो पांडे निपुण कसाई ।
बकरा मारि भैंसाको धावै दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥
करि स्नान तिलक करि बैठे विधिसों देवि पुजाई ।
आतम राम पलकमो विनशे रुधिरकी नदी बहाई ॥ २ ॥
अतिपुनीत ऊंचेकुल कहिये सभा माहिं अधिकाई ।
इनते दीक्षा सबकोई मांगै हँसि आवै मोहिं भाई ॥ ३ ॥
पाप कटनको कथा सुनावैं कर्म करावैं नीचा ।
बूड़त दोउ परस्पर देखा गहे हाथ यम घींचा ॥ ४ ॥
गाय बधै तेहि तुरुका कहिये उनते वैका छोटे ।
कहहि कबीर सुनौहौ संतो कलिके ब्राह्मण खोटे ॥ ५ ॥
संतो पांडे निपुण कसाई ।
बकरा मारि भैंसाको धावै दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥
करि स्नान तिलक करि बैठे विधिसों देवि पुजाई ।
आतमराम पलकमो विनशे रुधिरकी नदी बहाई॥२॥

( २१८ ) बीजक कबीरदास ।
हेसंतो ! पांडे निपुण कसाई हैं काहेते कि, कसाई अविधिते मारै है वह
विधिते मारै है याते निपुण है । बकराको मारिके भैंसाके बलिदान दीबेकों
धावै है ॥ १ ॥ स्नान करिके रक्तचंदनके बड़ेबड़े तिलक दैके बैठे हैं औ
विधिसों देवीको पुजावै है अरु यह कहै है अंतर्यामी सर्वत्र है, औ बकरा मैं-
साको मूड़काटि डारै है, रुधिरकी नदी बहनलगै है तबवह आतमारामजो है
जीव ( कहे आत्माजो है शरीरतेहि बिषे है आरामजाको ) सो बिनशि जायहै
कहे शरीरते जुदा ह्रैजाय है ॥ २ ॥
अति पुनीत ऊंचे कुल कहिये सभा माहँ अधिकाई ।
इनते दीक्षा सब कोउ मांगै हँसि आवै मोहिं भाई ॥३॥
सो ऐसे ऐसे दुष्ट कसायनको अति पुनीत ऊंचे कुलके कहै हैं । अरुसभामें
उनहींकी अधिकाई है कहे शास्त्रार्थ करिके सभामें आपनिन अधिकाई राखै
है । तेहिते सबकोई दीक्षामांगै हैं कि, हमको दीक्षादै संसारते उबारिलेउ ।
सो यह देखिकै मोको हँसी आवै है कि, आपई नरकमें जाइ है तौ और
कों नरकते कैसे उबारि है अर्थात् तोहूको वही नरकमें डारिदेई है ॥ ३ ॥
पाप कटन को कथा सुनावै कर्म करावै नीचा ।
बूड़त दोउ परस्पर देखा गहे हाथ यम घींचा ॥ ४ ॥
वोई गुरुवालोग पापकटनको तो कथा सुनावै हैं रामायणादिक औ वही
कथामें वर्णन है कि, रघुनाथजी शिकार खेलै हैं । सो गुरुवालोग कहै हैं कि
तुमहूंशिकारखेलो । यहनहीं जानै हैं कि रघुनाथजी तिर्यग्योनि वालेन परदया
करी कि, ई ज्ञानभक्ति बैराग्यकैसे करेंगे याते मारिकै मुक्तिकरिदेइ हैं और हम
इनको मारेंगे तो पाप ते हमई दोऊ नरकै जायँगे । याहीते दोऊगुरु चेलाकों
परस्परनरकमें बूड़त देख्यो है तिनको नरकमें डारिबेको यमघींचही धरै हैं ।
नरकमें डारिदेहिं गे तब नरकमें गुहमूत्र खाइगो औ मारो जाइगो । औ जों
जीवनको मारिकै मांस खायो है तेई वाके मांसको खायेंगे। औ अपने २ सींगन
ते खुरनते मारेंगे । याते मांस खायो है वै जीवतही मांस खायेंगे । इहांतें
जो जीवन को वह मारचो तिनको क्षणमात्रको क्लेश है औ वहां वे जीक

शब्द । ( २१९ )
वाको बारंबार मारेंगे । मरणको क्लेश क्षणमें होइगो औ यातना शरीर लाख-
नवर्ष न छूटैगो या कथा गरुड़ पुराणादिक में प्रसिद्ध है ॥ ४ ॥
गाय बधै तेहि तुरुका कहिये उनते वैका छोटा ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो कलिके ब्राह्मण खोटा ॥ ५ ॥
जे गायको मारै हैं ते मुसल्मान कहावै हैं सो इनते वै का छोटे हैं । तुरुक
गायमारै हैं अरु वै भेड़ा भैंसा मारै हैं । आत्मातो सब एक हीहै । सो कबी-
रजी कहै हैं कि, हेसंतो ! कलिके ब्राह्मण बहुत खोट हैं काहे ते कि, जे शास्त्र
को नहीं समझैं तेतो मूढ़ही हैं, वे खोटकर्म करोई चाहैं परन्तु जे शास्त्रको
समझै हैं तिनहूंको समुझाइकै खोटकर्ममें लगाइ देइ हैं अपनी पाण्डित्यकें
बलते । ब्राह्मण जो कह्यो ताको या अर्थ है सबको यही समुझावै है को काको
मारै है सर्वत्रतो एकई ब्रह्म है औ कोई या समुझावै है कि बलिदानदै देवीको
प्रसन्नकरो तुमको ब्रह्मज्ञान दै ब्रह्मबनाइ देगी ॥ ५ ॥
इति ग्यारहवां शब्द समाप्त ।
अथ बारहवां शब्द ॥ १२ ॥
संतो मतेमात जनरंगी ।
पीवत प्याला प्रेमसुधारस मतवाले सतसंगी ॥ १ ॥
अर्धऊर्ध्वलै भाठी रोपी ब्रह्म अगिनि उद्गारी ।
मूंदे मदन कर्म कटि कसमल संतत चुवै अगारी ॥ २ ॥
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यासकवि नारद शुक मुनि जोरी ।
सभा बैठि शंभू सनकादिक तहँ फिरि अधर कटोरी ॥ ३ ॥
अंबरीषऔ याग जनक जड़ शेष सहस मुख पाना ।
कहँलौं गनों अनंत कोटि लै अमहल महल दिवाना ॥ ४ ॥

( २२० ) बीजक कबीरदास ।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते माती शिवकी नारी ।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन अजहुं न छूटी खुमारी ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिन रे पिया तिनजाना।
कहै कबीर गूंगेकी शक्कर क्यों कर करै वखाना ॥ ६ ॥
संतो मते मात जन रंगी ।
पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी ॥ १ ॥
संतो मतेकहे संतनके जेमतहैं जिनमें रंगेजे जनहैं तेईमात कहे मातिरहे हैं ।
“रंगच्छतीतिरंगः रंगोस्यास्तिगुरुत्वेनेतिरंगी” रकार बीजको जो कोई प्राप्त होइ
है सो रंग कहावैसो रकार बीज रामोपासकनके होइहैते रामोपासक जाके गुरुहोइ
सोकहावैरंगी । अथवा सुरति कमल बैठे जे परम गुरुहैं ते रकार बीजको उच्चार
करै हैं, सो रकार बीजको जो कोई वहां जाइकै सुने सो रंगीहै।सोई रंगी संतनके
मतमें माते है । औ कबीरऊ रकारई बीजको जपत रहेहैं सोवंशावलीमें लिख्यो
है। श्रीराजारामसिंह बाबाकबीरजीते पूछ्यो कि आपका कौन सिद्धांतहै तब कबी-
रजी कह्यो ॥ “रा अक्षर घट रम्यो कबीरा।निज घर मेरो साधु शरीरा” ॥
सो पीछे लिखिआये हैं । अरु सुधाको मादकधर्म है सो श्रीरामचन्द्र के प्रेम-
रूपी प्यालामें भरचो जो है सुधारसरूपा भक्ति ताको जे पानकरै हैं तिनके
सत्संगी जे हैं तेऊ मतवाले हैनायेहैं कहेपरम सिद्धांतवालो जो मत है तेहि तें
युक्त हैंजाइहैं । अथवा रसरूपा भक्तिको नशा चढ़ोरहै दिनराति अर्थात् रस
आनन्दको कहै हैं सो आनन्दमें निमग्नरहैं तामें प्रमाण ॥ “रसोवैसःरसं-
ह्येवायंलब्ध्वानन्दीभवति ॥” इतिश्रुतेः इहां सुधारस को कह्यो ताको हेतु यह
है कि जे सुधारसको पीते हैं तेई जनन मरण छोड़िकै अमर होयहैं औरनको
जनन मरण नहीं छूटै है अरु वह रसरूपा भक्ति मधि उत्तत्ति भयो है ताको
रूपक करिके समुझावै हैं ॥ १ ॥
अर्ध ऊर्ध्व लै भाठी रोपी ब्रह्मअगिनि उदगारी ।
मूँदे मदन कर्म काटि कसमल सतत चुवै अगारी ॥ २ ॥

उहां समेटिकै कहिआयेहैं अबइहां रसरूपा भक्तिको मदको रूपककरिकै
कहैं हैं । अध कहे नीचेके लोक ऊर्ध्वकहे ऊंचेके लोक पर्यंत जो सारासारकों
विचार ( सारकहे चित् अचितरूप साहबको या जगत् मानिबो औ असार कहें
नानात्व जगत् मानिबो या जो विचार ) सोई भाठी रोपतभये । औ तेहिते-
भयो जो यथार्थज्ञान कि, सब सच्चिदानन्द स्वरूपहै काहेते चितौँ अचित साह-
बको रूपहै यहिहेतु ते सोई ब्रह्म अग्नि उद्गारीकहे बारत भये । महुवा नरमें
धरैहै इहांमदन जोमनोज तौनैजोहै शरीरनर अर्थात् वीर्य्यते शरीर होइहै सो
अंतःकरण में मूंदे । जे साहबकी अनेक प्रकारकी जो लीला तिनके जे ज्ञान
ध्यान तेई महुवादिक द्रव्यहैं, तिन्हें जोकर्मनकी बरोबरि मानिबो जो या भ्रम
सोई जो कर्मरूप कसमल ताको काटिडारचो, तब निश्चयात्मक बुद्धिने पात्र
तामें रसरूपाभक्ति रूपजो अगारी सो निरंतर चुवनलागी ॥ २ ॥
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यास कवि नारद शुकमुनि जोरी।
सभा बैठि शंभू सनकादिक तहँ फिरि अधर कटोरी ॥३॥
गोरख दत्तात्रेय बशिष्ठ व्यास कबि कहे शुक नारद शुकमुनि कहे शुकाचार्य
तेई सब जोरि जोरि इकट्ठाकरि धरतभये । औ सभाके बैठैया जे हैं शंभु सन-
कादिक तहां रसरूपा भक्ति जो सुधा रस तेहि करिके भरी जो है प्रेम रूपी
कटोरी सो तिनके अधरहैं कहे मनकरिके न कोई धरिसकैहै अर्थात् न मनमें
आवै न वचनमें आवै वाके पानकरतमें छकि सब जायहैं । रसवाच्यमें नहीं
आँवैहै यहसर्वत्र ग्रंथनमें प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
अंबरीष औ याज्ञ जनक जड़ शेष सहस मुख पाना ।
कहँलों गनों अनंत कोटिलै अमहल महल देवाना ॥ ४॥
अंबरीष औ याज्ञवल्क्य औ जड़भरत औ शेषकहे संकर्षण औ सहसमुख
कहे शेषनाग ते पान करतभये । सो कहांलों मैं गनों परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र
के जे अमहल महल अनंत कोटि हैं ताहीमें लीनभये औदिवाना होतभये कहे
मत्तहोतभये । इहां अमहलमहल जोकह्यो सोऊ जे अयोध्याजीके महलहैं
अमहलहैं कहे महल नहीं हैं अर्थात् प्राकृत पांचभौतिक नहीं हैं । अरु महल

( २२२ ) बीजक कबीरदास ।
जो कह्यो ताते आनन्दरूप वे महल बर्त्तमान बने हैं । अमहल कह्यो याते
निर्गुणधर्म आयो औ महलकह्यो याते सगुणधर्म आयो । सगुणनिर्गुण में नहीं
होयहै । निर्गुण सगुणमें नहीं होयहै उन में दोनों धर्म बने हैं ताते वे निर्गुण
सगुणके परे विलक्षण महलमें हैं । तिनमें जायके दिवाने भये । माया ब्रह्ममें जो
दिवानेरहे सो छोड़ि दिये । अमहलमें दिवाना ह्वै गये महलन में साहबकी अनेक
प्रकारकी लीलनको ध्यान कैकै हंसरूप में स्थित ह्वैकै रसरूपाभक्ति पानकैकै
छकिरहे । रसरूपाभक्ति शांतशतक के तीसरे खंड में औ रामायणादिकमें
हमलिखे हैं सो देखिलेहु ॥ ४ ॥
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते माती शिवकी नारी ।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन अजहुं न छूटि खुमारी ॥५॥
औ ध्रुव प्रह्लाद विभीषण औ पार्वती मतिगई औ सगुण ब्रह्म जे साक्षात
नारायण श्रीकृष्ण हैं तेऊ वृन्दावन में मतिगये । अबहूं भरखुमारी नहीं छूटी
की भाव यहहै कि, जिनके शरीर छूटे तेतो साकेतहींमें जाय दिवानेभये कहे
प्रेम में छके । ओ जिनके शरीर बनेहैं तिनहूंकी खुमारी नहीं छुटी कहे अबहूं
भर श्रीरामचन्द्रहीकी उपासना करेहैं तामें प्रमाण ॥ ( पूजितोनंदगोपाद्यैःश्री-
कृष्णेनापिपूजितः । भद्रयामहिशीभिश्चपूजितोरघुपुङ्गवः ॥ ) यह ब्रह्मवैवर्त्त
को प्रमाण है जौने को प्रमाण सब आचार्य दियो है ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिनरे पिया तिन जाना।
कहै कबीर गूं गे को शक्कर क्यों करि करे बखाना ॥ ६ ॥
औ सुर नर मुनि जेते पीर औलिया हैं तिन में जे श्रीरामचन्द्र की उपासना
कियेहैं तेई रसभरी प्रेमकटोरी पियो है औ तेई मन बचनके परैहैं । जे साहब-
के नामरूप लीलाधाम तिनको जान्यो है । सो जिनजान्यो है तिनको वर्णन
करिवेको वह गूंगे को शक्कर है काहेते वह मन बचनकेपरे है, जब वहीभांति
उन्हौहै जाय तब बाको स्वाद पावै । काहू सों वाको कोई बखान नहीं करि
सकैहै । सो कबीरजी कहैहैं । जो कोई कहै यहअर्थ नहीं है वह प्रेमको पियाला
जो कबीरजी ब्रह्मको कहिआयेहैं वहीको पीपीकै सब मतवार ह्वैगये हैं,सांचपदार्थ

शब्द । (२२३)
नहींजान्यो, तौ हम यहकहैं हैं कि, जिनको कबीरंजी आगे वर्णन करिआंयेहैं
तेई नहीं जान्यो तौ तुम्हीं कैसेजान्यो ? जो कहोहम अपने गुरुवनके बताये
जान्यो तो गुरुवनको कह्यो वाणीको कह्यो तो तुमही झूठकहौहो । जो कहो
पारिख करिकेजान्यो तो पारिखकिये तौ मन बचनके परे औ निर्गुण सगुणके
परे जे शुद्ध जीवात्मा सदा रघुनाथजीके निकटवर्त्तीते औरश्रीरामचन्द्र येई
आवैहैं वेद शास्त्रमें प्रमाण मिलै हैं तुमपारिखकहिके मनबचनके परेकौन पदार्थ-
राख्यो है । जोकहो हमजीवात्माको मानैं हैं औ कोई ब्रह्मको मानैहैं तौ आत्मा
औ ब्रह्म येहू नामहै बचनमें आयगयो । औ तुम जो विचारकरौहो सो मन में
आयगयो । जो कहो तुम्हीं कैसे श्रीरामचन्द्रको मनबचनके परे कहौहौ
वोऊतो मन बचनमें आय जायहैं; तौ हम पूर्व लिखिआये हैं कि, नारायण
राम अवतार लेइँहें तिनके नामरूप लीला धामके वर्णन करिके, वे जे परमप-
रुषश्रीरामचन्द्रहैं तिनको सपरिकर लक्षितकरैं हैं। वे मन बचनके परेहैं
औ यहूआगे लिखिआये हैं कि ॥ (ऐसी भांति जो मोकहँ ध्यावै। छठयें मास दर-
शं सो पावै ) ॥ सो अपनी इन्द्रियहै आपैदेखेपरे हैं जो कोई उनके प्रसन्नकरिबेको
उपायकरै है सो साहिबैके जनाये जानै है । तामें प्रमाण कबीरजी की साखी
सागरकी चौपाई ॥ (जौनैसो जोमहीं जनाऊं । बांह पकारिलोकै लैआऊं )॥
बीजकमेंलिखी है साखी ॥ (बहुबंधनतेबांधिया एकबिचाराजीव । काबलछूटै
आपनो जो न छुड़ावैपीव ) ॥ उनको वर्णन कोई जीवनहीं करिसकै है, ते-
हिते जो पारिख हम कियो सोई सांचहै जो तुम पारिखकरौहौ सोझूठहै । तुम
श्रीकबीरजीको अर्थजानते नहींहो भ्रममें लगेहो अनामा उन्हीं को नामहै अरु
वोई हैं तामें प्रमाण ॥ ( अनामासोऽप्रसिद्धत्वादरूपो भूतवर्जनात् ॥ इति
वायुपुराणे ) ॥ ६ ॥
इति बारहवांशब्द समाप्त ।
अथ तेरहवांशब्द ॥ १३ ॥
राम तेरी माया दुन्दि मच्चावै ।
गति मति वाकी समझिपरै नहीं सुर नर मुनिहिं नचावै॥१॥

( २२४ ) बीजक कबीरदास ।
कों सेमरके शाखा बढ़ाये फूल अनूपम बानी ।
केतिक चात्रिक लागि रहेहैं चाखत रुवा उड़ानी ॥ २ ॥
कहा खजूर बड़ाई तेरी फल कोई नहिं पावै।
ग्रीषम ऋतु जब आय तुलानी छाया काम न आवै ॥ ३ ॥
अपना चतुर और को सिखवै कामिन कनक सयानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो ! रामचरण रति मानी ॥ ४ ॥
राम तेरी माया ढुंदि मचावैं।
गति मति वाकी समझि परै नहिं सुर नर मुनिहिं नचावै॥१॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीवो ! राममें जो तिहारी माया जो कपट सो
दुन्दिमचावै है। कैसीमायाहै कि, जाकी गति मति नहीं समझिपरै, सुरनर
मुनि जे हैं तिनहूं को नचावै। अर्थात् उनहूंकॊ लागिहै। सो साहब को न
जानिबो रूपकारण जगत्को आदि मंगलमें कहि आये हैं ॥ १ ॥
का सेमरके शाखा बढ़ये फूल अनूपम बानी ।
केतिक चात्रिक लागि रहेहैं चाखत रुवा उड़ानी ॥ २ ॥
सो हेजीवो ! तुम द्वन्दमाया को त्यागौ साहबको जानो या संसाररूप सेम-
रको वृक्ष तामें नाना बासना नाना देवतनकी उपासनारूप शाखा बढ़ाये कहाहै।
तैनेवृक्षमें अनुपम कहे साहब के जाननेवारे विशेषकर ज्ञानवारे जो नहीं कह्यो
ऐसी गुरुवनकी वाणीसोई फूलहै । ताहीते भयो जो धोखा ब्रह्मको ज्ञान सोई-
फलहै। तामे केत कौ चात्रिकरूप जीवलागि रहेहैं। यहां चात्रिकै कह्यो और
पक्षी न कह्यो, सो चात्रिक पियासो रहै है और इनहूंके मुक्तिकी चाह रहैहै।
पक्षी रस नहीं पावै है इन मुक्ति नहीं पावै है। चाखतमें रुवा उड़ै है पक्षीके
जीभमें लपटिजाय है, जीभहूको रससूखि जायहै। यहां वा ज्ञानको जब अनु-
१ क्या।

शब्द । ( २२५ )
भव कियो तब गुरुवालोग बतायो कि तुम्हीं ब्रह्म हौ, तुम्हारई जीवात्मा मालिकह
सब्रको । राम सबको खाय लेयहै रामको का भजो रामतौ मायिकहै । जो कुछ
उनकी श्रीरामचन्द्रमें वासनारही सोऊ छूटिगई । यही गुरुवाहै पक्षी वा रस
नहीं पावै है तबखेद होइ है औ या वही ज्ञानमें दृढ़ता करिके उड़त उड़त
नरकही में गिरै है नरकमें दुःख पावैहै ॥ २ ॥
कहा खजूर बढ़ाई तेरी फल कोई नहिंपावै ।
ग्रीषम ऋतु जब आय तलानी छाया काम न आवै॥३॥
अब धोखा ज्ञानवाले नको खजूरको दृष्टांतदैके कहै हैं । खजूरकी बड़ाई लै
कहा करै फल तो कोई पावतै नहीं है । ग्रीष्मऋतु में छायाकाहूके काम नहीं
आवैहै । वांके तरेही रहैहै, आतप तपतै रहै है । ऐसे हे गुरुवा लोगो ! तुम्हारी
बड़ी बड़ाई कि, मैंही ब्रह्महौं, मोते बड़ो कोई नहीं है,आत्मै मालिक है। सो न
कोई ब्रह्म भयो ना आत्मै मालिक भयो या फल कोई नहीं पायो । जो कोई
तुम्हारे मत में आवै है उनको जनन मरणरूप ग्रीष्म तापनहीं छूटै है या तुम्हारो
उपदेश रूप छाया काहूके काम नहीं आवै है ॥ ३ ॥
अपना चतुर औरको सिखवै कामिनि कनक सयानी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तो रामचरण रतिमानी ॥ ४ ॥
गुरुवालोग कनक कामिनीके मिलिबेको आप चतुर हैरहे हैं । कनक सुवर्ण
कहावै है सो आत्मा को सुवर्ण जोहै स्वस्वरूप सो मायारूपी कामिनीमें लप-
ट्योहै तेहिते शुद्धनहीं है । अथवा कनक जोहै सुवर्ण सो शुद्धहै औ सुवर्णके
जेहैं भेद कुण्डलादिक भूषण तिनके भेद मिथ्याहैं । ऐसे और सबको मिथ्या-
मानिके एकब्रह्म हीको मानिबो । औ कामिनीमें सयानी कहे ज्ञान करिकै
विचारै है कि, कामिनी माया हई नहीं है, मिथ्या है । यही सयानी कहे ज्ञान
आपऊ सिखै है औ औरहूको सिखावै है परन्तु जननमरण होतई जायहै माया
नहीं छूटै है सो कबीरजी कहै हैं कि, हेसंतो ! याहीते मैं ये बखेडनको छोड़ि-
के परमपरपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनके चरणनमें रतिमान्यो है । इहां संतनकों
१५

( २२६ ) बीजक कबीरदास ।
साखी देकै जो कह्यो ताकोहेतु यहहै कि, संत समुझेंगे कि, सांच कहैं हैं कि,
झूठ कहैं हैं। अथवा हे जीवो ! मेरो सिखावन सुनो-श्रीरामचन्द्रके चरणमें
रतिमानिके जैसे, सब भयो है, नानामत कियो है, तैसे, एकबार मेरो वचन
सुनि रामचरणमें रतिमानिके संत होउ । व्यंग्य यहहै कि, जो संतहोउगे तो
जननमरणते रहित हैजाउगे औरी भांति न छूटोगे । अथवा अपना चतुर
और को सिखवै कहे अपनो चतुर नहीं है मायाही में परे हैं और और को
कनक कामिनीमें सयानी कहे विचारकरावै है कि, कनक कामिनीरूप मायाको
बिचारकै देख्यो या मिथ्या है । सो जो आप चतुर नहीं भये कनककामिनी
नहीं त्यागे तो उनके उपदेशते कनककामिनी माया कब त्यागेंगे ॥ ४ ॥
इति तेरहवां शब्द समाप्त ।
अथ चौदहवांशब्द ॥ १४ ॥
रामरा संशय गांठि न छूटै। ताते पकरि पकरि यमलूटै॥१॥
ह्वै मसकीन कुलीन कहावो तुम योगी संन्यासी
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥ २ ॥
स्मृति वेद पुराण पढै सब अनुभवभाव न दरशै ।
लोह हिरण्य होय धौ कैसे जो नहि पारस परशै ॥ ३ ॥
जियत न तरे मुये का तरिहौ जियतै जो न तरै ।
गहि परतीति कीन जिन जासों सोई तहँ मरै ॥ ४ ॥
जो कछु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझु सयाना ।
कहै कबीर तासों का कहिये देखत दृष्टि भुलाना ॥ ५ ॥
राम रा संशय गांठि न छूटै। ताते पकरि पकरि यमलूटै १

शब्द । ( २२७ )
ह्वै मसकीन कुलीन कहावौ तुम योगी संन्यासी ।
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥२॥
रामराकहे रकार जिनको मराहै अर्थात् रकार बीजको जिन को अभावहै,
रामोपासक नहीं हैं, तिनकी संशयकी गांठिनहींछूटै है, तेहितेपकरिपकरिके यम
लूटिलेइहैं अर्थात् याकोमारिकै नरकमें डारिदेइँ हैं । फिरिफिरि शरीर पावै है
फिरिलुटि जायहै मारो जायहै ॥ १ ॥ मसकीन कहे गरीब फकीर ह्वैकै कुलीन
कहावै है कहे भये तौ फकीर परन्तु कुलाभिमान नहीं छूटै है कहै हैं कि, हम-
फलाने गद्दीके मुरीदहैं । सो तुम योगी हौ संन्यासी हौ ज्ञानी हौ गुणी हौ
शूर हौ कविहौ दाताहौ इत्यादिक जो भेदकी मति हैं सो कोई न नाशकीयो
काहेते कि, हे संतो ! ये परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रके अंश हैं सो यह कोई नहीं
जान है औ यह जगत् चित् अचित् विग्रहकारिके साहबको रूपहै भेदकी बुद्धि
लगाइ राख्यो है ॥ २ ॥
स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब अनुभव भाव न दरशै ।
लोह हिरण्य होय धौं कैसे जो नहिं पारस परशै ॥ ३ ॥
स्मृति वेद पुराण सबै पढ़ै हैं परंतु परमपरपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं सबके तात्पर्य
तिनको अनुभव काहूको नहीं दरशै है । जो पारसको स्पर्श न होय तौ लोह
हिरण्य कहे सोन कैसेहोय न होय । तैसे स्मृति वेदपुराणनको तात्पर्य श्रीराम-
चन्द्रहैं तिनके चरणको जोलौं न परशै तौलौं मुक्ति नहीं होयहै पार्षद रूपत्व
वाको प्राप्ति नहीं होयहै ॥ ३ ॥
जियत न तरै मुयेका तरिहौ जियतै जो न तरै ।
गहि परतीति कीन जिनजासों सोई तहँ मरै ॥ ४ ॥
जो कछु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझि सयाना ।
कहै कबीर तासों का कहिये देखत दृष्टि भुलाना ॥ ५ ॥
सो जियतमें जो न तुम तरोगे तौ मुयेकैसे तरोगे । सो हे जीवो ! जियतै
काहेंनहीं तरिजाउहै । जासों कहे जौने साहबसों जाके स्पर्शकिये जीव शुद्ध

( २२८ ) बीजक कबीरदास ।
द्वै जायहैं तौने साहबसों जो कोई (जहैं साहबको मत गहिकै) परतीति कहैं
बिश्वासकीनहै सो जानतहै कहे संसारहीमें अमर है गयो है ॥ ४ ॥ सो कबी-
रजी कहैं हैं कि, ये जीव ज्ञान करैं हैं कि अज्ञान करैं हैं ताहीको सब कुछ
मानिकै अपने को सयान मानैहै तिनसों कहा कहिये जो अपनी दृष्टिते देखत
देखत भुलायदियो । स्मृतिवेद पुराण चक्रवर्ती परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीको कहैं
हैं, उन्हींके भक्त हनुमान् विभीषणादिक अमर भयेहैं, सो देखतेहैं औ यह नहीं
समुझैं हैं कि, सबके मालिक बादशाह श्रीरामचन्द्र हैं, इनहीके छोड़ाये छूटैंगे
औरके छोडाये न छूटैंगे ॥ ५ ॥
इति चौदहवां शब्द समाप्त ।
अथ पन्द्रहवां शब्द ॥ १५ ॥
रामरा चली विनावन माहो । घर छोड़ेजात जोलाहो॥१॥
गज नौ गज दश गज उनइसकी पुरिया एक तनाई ।
सात सूत नौ गाड़ बहत्तरि पाट लागु अधिकाई ॥ २ ॥
तापट तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढ़ाई ।
तामें घटै बढ़ै रतिओ नहिं कर कच कर घरहाई ॥ ३ ॥
नित उठि बैठ खसम सों बरबस तापर लाग तिहाई ।
भीनी पुरिया काम न आवै जोलहा चला रिसाई ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जिन्ह यह सृष्टि उपाई ।
छोड़ि पसार रामभजु बौरे भवसागर कठिनाई ॥ ५ ॥
रामरा चली विनावन माहो । घर छोड़ जात जोलाहो॥१॥
रामरा कहै रा जिनको मराहै अर्थात् रकार बीजको जिनके अभावहै साह-
बको नहीं जानें । ऐसेजे समष्टिजीव तिनके इहां माहो है कारणरूपा माया
सोबिनावनको कहे बिनवावनको चली अर्थात् जगत् बनवाइबेको चली । इहां

शब्द । ( २२९ )
बिनवो न कह्यो बिनवाइबो कह्यो सोबिना चैतन्य ब्रह्म औजीवके लपेटे याको
बनायो नहीं बनै है काहेते कि, यह जड़है अर्थात् ब्रह्म जीवको संयोग करिकै
बनवानको चली । ब्रह्मजीवके पाससों जोलाहा जो यह जीवहै सो घरको छो-
ड़ेदेयहै अर्थात् यहशुद्ध जीवात्मा आपनो जो घरहै साहबके लोकको प्रकाश
जहांशुद्ध रहैहै तौनै घरको छांड़िकै, माया के लपेटमें परिके, आपने बंधनको
आपने मन करिके संसाररूपी पटको बनावैहै ॥ १ ॥
गज नौ गज दश गज उनइसकी पुरिया एक तनाई ।
सात सूत नौ गाड़ बहत्तर पाट लागु अधिकाई ॥ २ ॥
प्रथम एकगजकी कल्पनारूप पुरिया तनावत भई प्रथम जीव बाणी प्रणव-
रूप एक गजकी पुरिया अनुमान ब्रह्म बनायो अर्थात् मन भयो । पुनि नौ
गजकी पुरिया तनावत भई सो नवौ व्याकरण बनावत भई । अर्थात् नवौ
व्याकरणमें शब्द ब्रह्मको वर्णन ह सो शब्द बनावत भई । पुनि दश गज की
पुरिया तनावत भई, सो चारवेद औ छः शास्त्र ई दशगजकी पुरिया तनावत-
भंयी सो अठारहों पुराण उनीसों महाभारत ये उनइसगजकी पुरिया बनावत
भयो ॥ २ ॥ पुनि सात सूत कहे सप्तावरण १ पृथिवी २ अपु ३ तेज ४
वायु ५ आकाश ६ अहंकार ७ महत्तत्त्व अथवा सात सूत १ जाग्रत् २
महाजाग्रत् ३ बीजजाग्रत् ४ स्वप्नजाग्रत् ५ स्वप्न ५ सुषुप्ति ६ औ७ महासुषुप्ति
ये सात अज्ञान भूमिका बनावतभयो पुनि नवगाड़ कहे नवद्वार बनावत भयो
बहत्तर पाटकहे बहत्तर कोठा अथवा बहत्तर हजारनस बनावत भयो ॥ २ ॥
ता पट तूल न गजन अमाई पसन सर अढ़ाई ।
तामें घटै बढ़ै रतिवो नहिं कर कच कर घरहाई ॥ ३ ॥
तापट कहे तौन जो है शरीर संसाररूपी पट तामें जब अहंब्रह्म भ्रमरूप तूल-
रह्यो तबतो गजमें नहीं अमातरह्यो कहे अप्रमेय रह्यो है । औ सेरकहे सिंहरूप
रह्योहै संसारको नाशकै देनवारो रह्योहै । सो संसारी हैकै जैसे सूतपैसा को
अढ़ाईसेर बिकाय है तैसे यह जीवात्मा बिषयरूप पैसाको चाहिकै अढ़ाई
सेरद्वैगयो । एकै पृथ्बीको विषय सुख चाहैहैं एकै यज्ञादिक करिकेस्वर्ग-

( २३० ) बीजक कबीरदास ।
को विषय सुख चाहै हैं, आधेमुमुक्षू हैकै ईश्वरन के लोकको सुख चाहै हैं, औ
ब्रह्ममें लीनहैबो चाहै हैं, इनमें पूरीविषय भोगनहीं है, यातें आधाकह्यो अहंब्रह्म
तूलते नाना शरीर भ्रमरूप सूत निकस्यो एकते बहुत हैगयो । जोपट संसारमें
बिनिगयो सो पट जो है संसार सो रत्तीभर न घटैहै न बढ़ैहै घरहाई जोहैं
जीवैकौनारीमायासो यहीजीवको कच अपने करमें करिलियोहै अर्थात् यहजीवकी
चूँदीगहि लियोहै मायाको भोक्ताजीवहै यातेजीवहीकी स्त्री माया है ॥ ३ ॥
नित उठि बेठ खसमसों वरवस तापर लागु तिहाई ।
भीनी पुरिया काम न आवै जोलहा चला रिसाई ॥४॥
खसम जो जीवहै तासो नित उठिउठिके वरवस कहै जबरदस्ती बेठ कहैं
बेगारि लेयहै सोएकतो संसारमें माया बेगारिलेयहै दूसरो जोभागतें यह
संसारउठो तो आत्मा को तिहाईलगो कहे त्रिकुटीमें धोखा ब्रह्मको ध्यान लगा-
यो । जोनमें विनिजायहै तौन पुरिया कहावैहै । सों जब भीजिजायहै तब नहीं
काम आवैहै । ऐसे यह संसार पुरिया है नाना पदार्थ ते जो है राग तेहिकरिकें
जब शरीर भीज्यो तब यह संसारको असार जानिके कहे संसार कुछ कामको
न जानिके जोलाहा जोहै जीव सो रिसाय चल्यो, धोखाब्रह्ममें लगतभयों;
सोऊ ब्रह्मतो तांहीको अनुभव है वहअनुभव ब्रह्ममें कछु न पावतभयो ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जिन यह सृष्टि उपाई ।
छाडि पसार राम भजु वौरे भवसागर कठिनाई ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि, जामें तुम लग्यो है सोतो तिहारोई मन को अनु-
भवहै अरु यह संसारऊको तुम्हारो मनही रच्यो है. सो जिन सृष्टिवाली उपाय
कियोहै तेहि माया ब्रह्मते छोड़ि पसार परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र को भजन
करु, काहेते कि, यह भवसागर परमकठिनहै उनहींके भजन किये छूटैगों,
औरीभांति न छूटैगो, और तो सब याही में परैहैं अथवा यहकठिन भव-
सागरमें आयके श्रीरामचन्द्रही को भजन करि मनते छूटैगौ ॥ ५ ॥
इति पन्द्रहवां शब्द समाप्त ।

शब्द । (२३१)
अथ सोलहवां शब्द ॥ १६ ॥
रामरा झीझी जंतर बाजै । कर चरण विहूना राजै ॥ १ ॥
कर बिन बाजै श्रवण सुनै बिन श्रवणै श्रोता सोई ।
पाटन स्ववश सभाबिनु अवसर वूझौ मुनि जन लोई ॥ २ ॥
इन्द्रिय बिनु भोग स्वाद जिह्वा बिनु अक्षय पिण्ड विहूना ।
जागत चोर मंदिर तहँ मूसै खसम अछत घर मूना ॥ ३ ॥
बीज बिन अंकुर पेड़ बिनु तरुवर बिनु फूले फल फलिया ।
बांझ की कोखि पुत्र अवतरिया बिन पग तरुवर चढ़िया ॥ ४ ॥
मसि बिनु द्वाइत कलम बिनु कागज बिनु अक्षर सुधि होई ।
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिन ज्ञाता कहै कबीर जन सोई ॥ ५ ॥
पूर्व मायाको वर्णनकरिआये तौनी मायाते छूटिके जौने उपाय ते साहब को
पावै है सो उपाय कहैं ॥
रामरा झीझी जंतर बाजै । कर चरण विहूना राजै ॥ १ ॥
हे जीव! राम कहे रकार तोको मरौहै अर्थात् रकार बीज को तोको अभाव
है याहीते तैं अपने को ब्रह्म मानिके संसारी है गयोहै । झीझीकहावै झिंझिया
जो कुवार शुक्लचतुर्दशीको अनेक छिद्रकै जो मटुकी होयहै ताके मध्यमें दीप
वारिके धरैहै सो झिंझियानांव ढेढियाको कवि संप्रदायहूमेंहै ॥ ( रंध्र जाल मग
द्वै कदै तिय तन दीपति पुंज । झिंझियाके सो घट भयो दिनहूमें बनकुंज ) ॥
( सारीमूलामलसी फलकांति झरोखन की झझरी झिंझियासी ) सोझिंझिया रूप-
नव दुवारको । अथवा रोम रोम में छिद्र है जामें वोई छिद्रन द्वै पसीना निक-
सैहै यहिप्रकारको झींझी जौहै शरीर तौनेजन्तरबाजै है कहे ताहीको यह सोहं
शब्दहै काहेते कि, श्वासा कहैहैं सोवहीश्वासके कहेते करचरण बिहून जों
निराकार ब्रह्महै सो तेरे आगेराजै कहे शोभितं होन लग्यो । अथवा आंखिन के
आगे नाचन लग्यो, सर्वत्र ब्रह्मही देखि परनलग्यो । अथवा तैंहीं करचरण

( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
बिहून कहे निराकार ब्रह्म हैके नाचन लग्यो । अथवा राजै कहे शोभित भयो
सो तुम तो शरीरते भिन्नहो जैसे ढेढिया ते दीप भिन्न रहै है । वह सोहं शब्द
तो शरीरको है वाको कहे तुम काहे धोखा में परेहौ । तुम निर्गुण सगुणके
परे जो है साहब ताके हौ तिनमें लगौ । निर्गुण सगुणके परे कैसे साहबहैं
सो कहै हैं ॥ १ ॥
कर बिनु वाजै श्रवण सुनै बिन श्रवणै श्रोतासोइ ।
पाटन स्ववश सभा बिनु अवसर बूझौ मुनिजन लोइ ॥२॥
साहब के लोकके जेबाजाहैं ते बिन कर बाजैं हैं काहेते कि वहां के जे
बाजा हैं ते पांचभौतिक नहीं हैं, औ उहांके जे बासी हैं तिनके शरीर पांचभौ-
तिक नहींहैं अर्थात् मनवचन के परेहौ औ प्राकृतजे हैं प्रकृति संबंधी पदार्थ
साकार औ अप्राकृत जो हैं निराकार ब्रह्म लोक प्रकाश ताहूते विलक्षण है ।
कर बिना कह्यो याते साकारौ नहीं है औ सो बाजै है याते निराकारौ नहीं ह।
औ सोई श्रोता जे हैं लोकवासी ते श्रवणते सुनै हैं औ श्रवण नहीं हैं याते
साकारौ नहीं है औ श्रवणते सुनै है याते निराकारौ नहीं है । मायाब्रह्म जीव
को जो अरुझा लाग्योहै सो जीव साहबको स्मरण करै ताके पाटन कहे पटाइ-
लीवे को साहब स्ववशहैं अथवा नौकर जाको राखैहैं ताको पट्टा लिखि देइहैं
सो पाटा कहावै है सो इहां पाटन बहु बचन है सो जीव उनके शरण
जायहैं तिनको पाटन के लिखि दीबे में अपनायलीबे में स्ववश हैं तामें प्रमाण॥
( सकृदेवप्रपन्नायतवास्मीतिचयाचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतन्मम ) ॥
औ बिना अवसर कहे बिना काल उनकी सभा लागी रहैहै वहां कालकी
गति नहीं है औ बाजन सदाबाजैहैं अर्थात् सदा रास उहां होता रहैहै । सो हे
मनन शील मुनिलोगो! तुम उन्हीं को समझौ औ उन्हींको मनन करो वहधो-
खा ब्रह्म के मनन कीन्हेते तुम्हारो जनन मरण न छूटेगो ॥ २ ॥
इन्द्रि बिनु भोग स्वादु जिह्वा बिनु अक्षय पिण्ड बिहूना ।
जागत चोर मँदोर तहँ मूसे खसम अछत घरसूना ॥ ३ ॥

शब्द । ( २३३ )
तुम वह साहब को कैसे समुझौ इंद्रिय बिना ह्वैकै साहब के लोक को जौहै
भोग सुख है ताको लेऊ औ बिना जिह्वा ह्वैकै अनिर्वचनीय जो राम नामहै
ताको स्वादलेऊ । औ पिंड बिहूनाकहे पांचौ शरीरते बिहीन ह्वैकै कहे पांचौ
शरीरनको छोड़िकैहंसस्वरूपमें स्थित ह्वैकै अक्षय कहे अक्षय ह्वै जाऊ । तुम्हारे
अंतःकरण रूपीघरको चोरजोहै धोखा ब्रह्म सो मूसि लेय है अर्थात् साहब को
ज्ञान चोराय लेयहै तुमहीं अहं ब्रह्म बुद्धि कराये देयहै। काहे ते कि खसम जे
हैं साहब ते अछत बने हैं औ तुम अपनो हृदय घरसून करि राख्यो है साहब
को नहीं राख्यो अर्थात् साहब को नहीं जान्यो ॥ ३ ॥
बीज बिनु अंकुर पेड़ बिनु तरुवर बिन फूलै फल फलिया।
बांझकी कोखि पुत्र अवतरिया बिन पग तरुवर चढ़िया॥४॥
इहां याकु अर्थ है बीज बिना कहूं अंकुर होय हैं ? औ पेड़बिना कहे बिना
जड़ कहूं तरुवरहोय हैं ? औ बिना फूलकहूंफल होय हैं ? अरु बांझके कोखिमें
कहूंपुत्रहोइहै ? औबिनापगकोईतरुवरमें चढ़ैहै ? सो बीज तौ वह ब्रह्मको कहौ-
हौ सोतो शून्य है, कोईपदार्थनहीं है अंकुर कैसे भयो कहे कैसेमाया सबलित
ब्रह्म भयो । औ पेड़ जड़ मायाको कहौ सो तो मिथ्या है संसार तरुवर कैसे
भयो । औज्ञानरूप जो फूल है ताहूको तो मूलाज्ञान कहौ हौ, सोऊ मिथ्या
है, कहो तो मुक्तिरूपी फल कैसे फरयो । औ मनको तौ जड़ कहौ हौ, ताको
अनुभव प्रबोधरूपी पुत्र कैसे भयो । औ आत्मा को तौ अकर्त्ता कहौ हौ मन
बुद्धि चित्तते भिन्न है सो बिना पांव संसार वृक्षको चढ़िकै कैसे चैतन्याकाशको
पहुंच्यो ॥ ४ ॥
मसि बिनु द्वाइत कलम बिनु कागद बिनु अक्षर सुधि होई ।
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिन ज्ञाता कहैं कबीर जन सोई॥५॥
बिना दुआइति मसि कैसे रहैगी अर्थात् मनको तो मिथ्या कहौ है। मनको
अनुभव कैसे रहैगो । वह मिथ्याई होयगो । औ बिना कागज कलम कहा करैगी
अर्थात् देहेन्द्रियादि अंतः करण तो मिथ्यै कहौ है ज्ञान केहिके आधारहोयगो
जहां बुद्धिरूपी कलमते लिखौगे निश्चय करौगै औ जो यहपाठ होय "बिनअ-

( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
क्षर सुधिहोय" तौ यह अर्थ है कि, जो एक आत्माही को सत्य मानोगे तों
साहब को बिना अक्षर कहे बिना अनादि माने सुधि कहे सुरति तुम को कैसे
होयगी । औ कौनसुरति देयगो । औ सुधिबिन कहे जो सुधि न भई तो सहज
कहे सो हंसो कैसे होयगो । तेहिते बिनाज्ञाता को ज्ञानकरु कहे अबैते अपने
को ज्ञाता मानि रहे हैं कि, मैं अपनो बिचारकरत करत औ सबको निषेध
करत करत जो पदार्थ रहि जाय है ताहीको मानिलेउंगो कि, यहीतत्व है सों
यह भ्रमछांड़ो, तेरेजानेते साहब न जानिपरेगे साहब मनबचन क परे हैं । सो
जौन बिना ज्ञाताको ज्ञान है जो साहब देय हैं काहेते कि, वह ज्ञान काहूकों
नहीं जाने है जब साहब आपनो रूपदेय हैं, तब वह रूपते जानि परै, साहब
हीके रूपको जानोपरै है । वाको ज्ञाता कोई नहीं है । सो ज्ञानकरु अर्थात्
रकार ध्वनि श्रवण रूप साधनकरु तब साहबई तोको हंसस्वरूपः दैके आपने
नामरूप लीलाधामको स्फुरित करायदैयेंगे । तौने हंसस्वरूप की आँखिते श्रवण
ते साहब को देखु औ साहबके गुणसुनु । सो कबीरजी कहै हैं कि, यहि तरह
ते जाके बिना ज्ञाताको ज्ञान है सोई मेरोज़न है । अर्थात् जौनलोक में
हमारी स्थिति है तौनही लोकको वहजन है बिनाज्ञाताकोज्ञान कौन कहावै है
जो साहब देय हैं तामेंप्रमाण ॥ "तेषांसततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येनमामुपयांतितें " ॥ इतिगीतायाम् ॥ ५ ॥
इति सोलहवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्रहवां शब्द ॥ १७ ॥
राम गाइ औरन समुझावै हरि जाने बिन विकल फिरै ॥ १॥
जा मुख वेद गायत्री उच्चरै ता सु वचन संसार तरै ।
जाक पाँव जगत उठि लागै सो ब्राह्मण जिउ वद्ध करै ॥ २॥
अपना ऊंच नीच घर भोजन ग्रीण कर्म करि उदर भरै ।
ग्रहण अमावस ढुकि ढुकि माँगै कर दीपकलिये कूपपरै॥३॥