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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

शब्द । ( २१९ )
वाको बारंबार मारेंगे । मरणको क्लेश क्षणमें होइगो औ यातना शरीर लाख-
नवर्ष न छूटैगो या कथा गरुड़ पुराणादिक में प्रसिद्ध है ॥ ४ ॥
गाय बधै तेहि तुरुका कहिये उनते वैका छोटा ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो कलिके ब्राह्मण खोटा ॥ ५ ॥
जे गायको मारै हैं ते मुसल्मान कहावै हैं सो इनते वै का छोटे हैं । तुरुक
गायमारै हैं अरु वै भेड़ा भैंसा मारै हैं । आत्मातो सब एक हीहै । सो कबी-
रजी कहै हैं कि, हेसंतो ! कलिके ब्राह्मण बहुत खोट हैं काहे ते कि, जे शास्त्र
को नहीं समझैं तेतो मूढ़ही हैं, वे खोटकर्म करोई चाहैं परन्तु जे शास्त्रको
समझै हैं तिनहूंको समुझाइकै खोटकर्ममें लगाइ देइ हैं अपनी पाण्डित्यकें
बलते । ब्राह्मण जो कह्यो ताको या अर्थ है सबको यही समुझावै है को काको
मारै है सर्वत्रतो एकई ब्रह्म है औ कोई या समुझावै है कि बलिदानदै देवीको
प्रसन्नकरो तुमको ब्रह्मज्ञान दै ब्रह्मबनाइ देगी ॥ ५ ॥
इति ग्यारहवां शब्द समाप्त ।
अथ बारहवां शब्द ॥ १२ ॥
संतो मतेमात जनरंगी ।
पीवत प्याला प्रेमसुधारस मतवाले सतसंगी ॥ १ ॥
अर्धऊर्ध्वलै भाठी रोपी ब्रह्म अगिनि उद्गारी ।
मूंदे मदन कर्म कटि कसमल संतत चुवै अगारी ॥ २ ॥
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यासकवि नारद शुक मुनि जोरी ।
सभा बैठि शंभू सनकादिक तहँ फिरि अधर कटोरी ॥ ३ ॥
अंबरीषऔ याग जनक जड़ शेष सहस मुख पाना ।
कहँलौं गनों अनंत कोटि लै अमहल महल दिवाना ॥ ४ ॥