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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 766 में से

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पृष्ठ 271

उहां समेटिकै कहिआयेहैं अबइहां रसरूपा भक्तिको मदको रूपककरिकै
कहैं हैं । अध कहे नीचेके लोक ऊर्ध्वकहे ऊंचेके लोक पर्यंत जो सारासारकों
विचार ( सारकहे चित् अचितरूप साहबको या जगत् मानिबो औ असार कहें
नानात्व जगत् मानिबो या जो विचार ) सोई भाठी रोपतभये । औ तेहिते-
भयो जो यथार्थज्ञान कि, सब सच्चिदानन्द स्वरूपहै काहेते चितौँ अचित साह-
बको रूपहै यहिहेतु ते सोई ब्रह्म अग्नि उद्गारीकहे बारत भये । महुवा नरमें
धरैहै इहांमदन जोमनोज तौनैजोहै शरीरनर अर्थात् वीर्य्यते शरीर होइहै सो
अंतःकरण में मूंदे । जे साहबकी अनेक प्रकारकी जो लीला तिनके जे ज्ञान
ध्यान तेई महुवादिक द्रव्यहैं, तिन्हें जोकर्मनकी बरोबरि मानिबो जो या भ्रम
सोई जो कर्मरूप कसमल ताको काटिडारचो, तब निश्चयात्मक बुद्धिने पात्र
तामें रसरूपाभक्ति रूपजो अगारी सो निरंतर चुवनलागी ॥ २ ॥
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यास कवि नारद शुकमुनि जोरी।
सभा बैठि शंभू सनकादिक तहँ फिरि अधर कटोरी ॥३॥
गोरख दत्तात्रेय बशिष्ठ व्यास कबि कहे शुक नारद शुकमुनि कहे शुकाचार्य
तेई सब जोरि जोरि इकट्ठाकरि धरतभये । औ सभाके बैठैया जे हैं शंभु सन-
कादिक तहां रसरूपा भक्ति जो सुधा रस तेहि करिके भरी जो है प्रेम रूपी
कटोरी सो तिनके अधरहैं कहे मनकरिके न कोई धरिसकैहै अर्थात् न मनमें
आवै न वचनमें आवै वाके पानकरतमें छकि सब जायहैं । रसवाच्यमें नहीं
आँवैहै यहसर्वत्र ग्रंथनमें प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
अंबरीष औ याज्ञ जनक जड़ शेष सहस मुख पाना ।
कहँलों गनों अनंत कोटिलै अमहल महल देवाना ॥ ४॥
अंबरीष औ याज्ञवल्क्य औ जड़भरत औ शेषकहे संकर्षण औ सहसमुख
कहे शेषनाग ते पान करतभये । सो कहांलों मैं गनों परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र
के जे अमहल महल अनंत कोटि हैं ताहीमें लीनभये औदिवाना होतभये कहे
मत्तहोतभये । इहां अमहलमहल जोकह्यो सोऊ जे अयोध्याजीके महलहैं
अमहलहैं कहे महल नहीं हैं अर्थात् प्राकृत पांचभौतिक नहीं हैं । अरु महल