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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 265

शब्द । ( २१५ )

जीव ताहीको मालिक बतावैं हैं । और चेला जे हैं तिनहूं को मायाके चहलामें
ढोरहैं ऐसो न्याउ निबोरैंहैं । भाव यहहै कि, भैंसा यमकी असवारी है सो
यमही पुर को लैजाइगो । तहां जब यमके लट्ठा लगैंगे तब गुरुवाई निकसि
आवैगी ॥ ४ ॥
इति नवमशब्द समाप्त ।
अथ दशवां शब्द ॥ १० ॥
( मजहब )
सन्तो राह दुनों हम डीठा ।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं मानैं स्वाद सबनको मीठा ॥ १ ॥
हिन्दू व्रत एकादशी साधैं दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागैं मन नहिं हटकैं पारन करे सगोती ॥ २ ॥
तुरुक रोजा नमाज गुजारैं बिसमिल बाँग पुकारैं ।
उनकी भिंइत कहांते होइ है सांझै मुर्गी मारै ॥ ३ ॥
हिन्दूकि दया मेहर तुरुकनकी दूनों घटसों त्यागी ।
वै हलाल वै झटका मारैं आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दू तुरुक कि एक राहहै सद्गुरु इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनौ हो संतो राम न कहेउ खोदाई ॥ ५ ॥
सन्तो राह दुनों हम डीठा ।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं मानैं स्वाद सबन को मीठा ॥ १ ॥
हे संतो! हम दुनोंकी राह डीठा कहे देखी दुनोंकी एकई राह है सो हमारो
हटको कोई नहीं मानै है । हम सबको समुझावते हैं कि विषयनको छोड़िकै
देखो तो दुनोंकी राह एकई है सो दुनों दीनको विषयनको स्वाद मीठो लग्यो
है यहीके मिलनकी उपाय करैं हैं साहबको नहीं खोजैं हैं ॥ १ ॥