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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

शब्द । ( १९५ )
न्यारो न्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी ।
कोउ काहूको हटा न मानै आपुहि आपु मुरादी ॥ २ ॥
अपने अपने न्यारे न्यारे भोजन चाहै हैं पांचौं बड़े सवादी हैं । आकाश
श्रोत्रइन्द्रियप्रधानहै सोशब्द चाहै है । वायु त्वचा इन्द्रिय प्रधान सो स्पर्शको
चाहै हैं । तेज चक्षुइंद्रिय प्रधानहै सो रूपको चाहैहै । जल रसनेन्द्रिय प्रधानहै
सो रसको चाहै है धरती घ्राणेंद्रिय प्रधानहै सो गंधको चाहैहै औ माया
जीवहीको ग्रासन चहैहै । कोईकाहूको हटको नहीं मानैहै आपही आप मालिक
ह्वेरहेहैं । आपुही आपु अपनी मुरादिकहे वांछापूरकरैहैं ॥ २ ॥
दुर्मतिकेर दोहागिनिमेटै ढोटै चापचपेरै ।
कहकबीरसोई जनमेरा घरकीरारिनिवेरै ॥३॥
दुर्मति जेहैं गुरुवालोग ( जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको छोड़ि आत्मही
को सत्य मानै हैं औ या कहैहैं कि, सबसुख करिलेउं वहां कछु नहीं है ऐसे
जेनास्तिकहैं ) तिनकी दोहागिनिकहे नहींग्रहणलायक वाणी तिनको मेटिकै
कहे छोड़िकै; ढोटाजेहैं पांचौ तत्त्व तिनको जोहै चाप कहे दबाव ताको आपै
चपेरै कहे दबाइलेइ । अर्थात् वे न दबावन पावैं । अपने अपने विषयनमें
मनको खैंच लैजाइहैं तहां मन न जानपावै । सो कबीरजी कहै हैं कि,जोपारि-
ख करिकै शरीर जो घर है तौनमें जो पांचों इन्द्रिनको झगड़ा है ताको
निबेरै कहे सब तत्त्व जे पृथ्वी आदिक हैं तिनमें लीन जे पांचों इंद्रिय हैं
तिनकी जे विषय हैं तिनको निबेराकरै कि, भगवतकी अचिद् विग्रहहै । पृथ्वी
आदिक तत्त्वरूप करिकै जो देखै है; इन्द्रियरूप करिकै जो देखै औ विषयरूप
करिकै जो देखैहै सो न देखै । औ यह मानै कि, मैं जोहौं जीवात्मा तौनेकी
एकौ नहींहैं; काहेते कि, मैं चिदचित् विग्रहहौं, ये जड़ विग्रहहैं, इनते भिन्नहौं
सो ये जेहैं जड़ ते आत्मैकी चैतन्यता पाइकै आपसमें लड़ैहैं । सो इनते जब
१ दुर्मत अर्थात् दुष्ट बुद्धिवाले पुरुषजिनको परमार्थका तो ज्ञान है ही नहीं परन्तु
देखादेखी वेष धारनकर अथवा कुलाभिमानसे गुरु बने बैठे हैं ऐसे जे झूठे गुरुलोग हैं
उनको गुरुवाकहते हैं उन्हींको दुर्मत कहते हैं ।

( १९६ ) बीजक कबीरदास ।
आत्मा भिन्नह्वैजाइगो तब सब शरीरै एकौ कार्य करनको समर्थ न होइगो ।
कैसे, जैसे जीव इनते अपनेको जुदो मानैगो हंसस्वरूपमें स्थित होइगो सो
इनहींको चपाइ लेइगो घरकी रारिनिवारि जायगी । सो इसतरहते जो कोई
अपने स्वरूपको जानि घरकी रारिनिबेरै परमपुरुष श्रीरामचन्द्रमें लगै सोई
जन मेरो है ॥ ३ ॥
इति तीसराशब्द समाप्त ।
अथ चौथाशब्द ॥ ४ ॥
संतौ देखत जग बौराना ।
साँच कहौं तौ मारन धावै झूठे जग पतियाना ॥ १ ॥
नेमी देखे धर्मी देखे प्रात करहि असनाना ।
आतम मारि पषाणहिं पूजैं उनमें कछू न ज्ञाना ॥ २ ॥
बहुतक देखे पीर औलिया पढ़ैं किताब कुराना ।
कै मुरीद तदवीर बतावैं उनमें उहै जो ज्ञाना ॥ ३ ॥
आसन मारि डिंभ १ धरिबैठे मनमें बहुत गुमाना ।
पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गर्व भुलाना ॥ ४ ॥
माला पहिरे टोपी दीन्हे छाप तिलक अनुमाना ।
साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ ५ ॥
हिंदू कहै मोहिं राम पियारा तुरुक कहै रहिमाना ।
आपसमें दोउ लरिलरि मूये मर्म न काहू जाना ॥ ६ ॥
घरघर मंत्रजे देत फिरतहैं महिमाके अभिमाना ।
गुरुवा सहित शिष्य सब बूड़े अंतकाल पछिताना ॥७॥
१ डिंभ दम्भका अ। भ्रंशहै ।

शब्द । ( १९७ )
कहै कबीर सुनो होसंतो ई सब भर्म भुलाना ।
केतिक कहौं कहा नहिं मानै आपहि आप समाना ॥८॥
सन्तो देखत जग बौराना ।
सांच कहौं तौ मारन धावै झूठे जग पतियाना ॥ १ ॥
हे संतो ! यह जगत् देखत देखत बौराई गयो । यह जानै है कि, यह
कल्पना मनहीं की है । एकनको दुःखपावत देखै है, एकनको भूतहोतदेखै है,
एकनको रोगग्रसित देखै है, एकनको घोड़े हाथी चढ़े देखै है, एकनको राजा
होतदेखै है औ एकनको मरतदेखै है । आपहू मरघट ज्ञान कथै है कि, ऐसें
ही हमहूं मरिजाइँगे । सो यहिं देखत देखतहू भुलाइ जाइहैं । परम परपुरुष
ज श्रीरामचन्द्र हैं तिनको भजन नहीं करै है, जाते संसारते छूटै । जो सांचब-
ताऊं हौं कि, सांच जे परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं, जो चित् अचित्में व्यापक
हैं, सब ठौर बने हैं, तिनमें लगौ जाते उबार है तौ मारन धावै है । औ झूठे
जे माया ब्रह्म हैं तिनके विस्तारके जे नाना मत हैं तिनमें जो कोई लगावै है
तौ तिनको सांच मानिकै पतियात जाय ह ॥ १ ॥
नमी देखे धर्म्मी देखे प्रात कराहिं असनाना ।
आतम मारि पषाणाहिं पूजैं उनमें कछू न ज्ञाना ॥ २ ॥
बहुत नेमी धर्मी देखे हैं, बहुत प्रातःस्नान करनवालेनको देखे हैं, स्वर्ग
कों जाय हैं । औ आत्माको मारिकै कहे भगवान्को मंदिर शरीरमें साक्षात्
सबके हृदयमें भगवान् अंतर्यामी रूपते बसे हैं, तौने शरीरको फोरिकै, मेढ़ा
महिषादिकनको मूडलैके, पीतर पाथर आदिक जे देवीकी मूर्ति हैं तिनमें चढ़ा-
वै हैं । औ सबके उद्धार हैबेको बतावै हैं, तौ इनमें कौन ज्ञान है ? कछू
ज्ञान नहीं है काहेते कि साहबको सर्वत्र नहीं जानै हैं ॥ २ ॥
बहुतक देखे पीर औलिया पढ़ैं किताब कुराना ।
करि मुरीद तदवीर बतावैं उनमें यहै जो ज्ञाना ॥ ३ ॥

( १९८ ) बीजक कबीरदास ।
औ बहुते पीर औलियनको देखे किताब कुरानके पढ़नवाले ते जीवनकों
मुरीद कहे शिष्य करिकै मुरगी बकरीके हलालकरै कि तदबीर बतावैं हैं औ
आपौ हलाल करै हैं ॥ ३ ॥
आसनमारि डिंभ धरि बैठे उनमें बहुत गुमाना ।
पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गर्व भुलाना ॥ ४ ॥
औ कोई चौरासी आसन कैकै प्राण चढ़ायकै डिंभधरि बैठे हैं कि, हमारे
बरोबरि कोई सिद्ध नहीं है यही मनमें गुमान करैं हैं । यह योगिनको कह्यो ।
औ कोई पीतरकी मुर्ति कोई पाथरकी मुर्त्तिपूजै हैं औ सर्व भूतमें व्यापक जो
भगवान् तिन भूतनोंको द्रोहकरै हैं ते अज्ञानी हैं साहबको नहीं जानै हैं । तामें
प्रमाण ॥ " अहमुच्चा वचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्नयानघे ॥ नैवतुष्येऽर्चितोर्चायां
भूतग्रामावमानिनः ॥ १ ॥ यस्यात्मबुद्धिः कुणपेत्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु-
भौम इज्यधीः ॥ यत्तीर्थबुद्धिः सलिलेनकर्हिचिज्जनेष्वभिज्ञेषुसएवगो खरइतिभा-
गवते ॥ " औ कोई तीर्थनमें लागै है । सो इनहीके गर्व में सब भुलाने हैं
कि, हम मुक्त ह्वै जायेंगे ॥ ४ ॥
माला पहिरे टोपी दीन्हे छाप तिलक अनुमाना ।
साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ ५ ॥
अब कबीरपंथिनको नानापंथिनको कहै हैं कि, माला पहिरे हैं टोपी दीन्हे
हैं औ नाकतेलैकै अच्छिद्र ऊर्ध्व तिलक दीन्हे हैं ताहीके अनुसार छाप पागे हैं
या कहैं हमको गद्दीकी छाप भई है हम महन्त हैं पान पायोहै औ साखी
शब्द गावतहैं पै वाको अर्थ भूले हैं साखी शब्दमें जो साहबको रूप बतावैं हैं
जीवात्माको सो नहीं जानै ॥ ५ ॥
हिंदू कहै मोहिं राम पियारा तुरुक कहे रहिमाना ।
आपसमें दोउ लरि लरि मूये मर्म कोइ नहिं जाना॥६॥
सो हिन्दूतो कहैं हैं कि, वेद शास्त्रमें रामही पियारा है औ मुसल्मान कहैहैं
कि, रहिमानही पियाराहै । यहदिविधा लगायराख्यो है या न जानतभये कि,

शब्द । (२०१)
एकही हैं । आपसमें लड़िलड़िकै मरिगये मर्म कोई न जानतभये की जो है
राम है, वही रहिमान है । साहब एकई है, दूसरो नहीं है सब नाम 'कारको
हैं तामें प्रमाण ॥ "सर्वाणिनामानियमाविशंतीतिश्रुतिः" सो ॥ सब 'वत-
वाहीमें घटित होयहैं ॥ ६ ॥
घरघर मंत्र जे देत फिरतहैं महिमाके अभिमाना ।
गुरुवा सहित शिष्य सब वूड़े अन्त काल पछिताना ७॥
घरघर जे मंत्र देतफिरतहैं अपनी महिमाके अभिमानते कि, हम सिद्ध हैं
योगी हैं पीर हैं औलिया हैं ऐसेजे गुरुवा हैं । ते यही अभिमानते सबकी रक्षा
करनंवारे जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनको भुलाइकै, सब जीवनको और
और में लगाइ देइहैं औ कहै हैं कि, हम उद्धारकै देइहैं । गुरुवा सहित सब
शिष्य बूड़िजाइँगे औ जब यमकेर मोंगरा लगैगो तब पछितायगो कि, हमपरम
पुरुष श्रीरामचन्द्रको भजन न कियो जे सबके रक्षक हैं ॥ ७ ॥
कहहि कबीर सुनोहो संतो ई सबभर्म भुलाना ॥
केंतिक कहौं कहा नहिं मानै आपहि आप समाना॥८॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो तुम सुनो ये सब भर्मईमें भुलान रहे हैं
मैं चारौ युगमें केतनौ समुझाऊंहौं पै मानै नहीं हैं । यद्यपि माया ब्रह्मकी एती
सामर्थ्य नहीं है कि, यह जीवको धरिलैजाय काहेते कि, वह जीवहीको अनु-
मानहै । सो यह आपनेनते आप यही भर्ममें समाइगयो है कि, मैं
ब्रह्महौं । आप आपहीते यह माया ब्रह्मसो आपस मानलियो है अर्थात् संगति
कैलियो है तेहिते संसारी द्वै गयो ॥ ८ ॥
इति चौथाशब्द समाप्त ।
१ इस चरणका पाठ दाना पुरकी पंक्तिमें ऐसा है । "केतिक कहौं कहा नहिं
मानै सहजे सहज समाना"

( १९८ ) बीजक कबीरदास ।
औ वह अथ पांचवां शब्द ॥ ५ ॥
मुरीद के संतो अचरज यक भो भाई ।
आपै यह कहौं तोको पतिआई ॥ १ ॥
एकै पुरुष एक है नारी ताकर करहु बिचारा ।
एकै अंड सकल चौरासी भर्म भुला संसारा ॥ २ ॥
एकै नारी जाल पसारा जग में भया अंदेसा ।
खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ ३ ॥
नागफांस लीन्हे घट भीतर मूसि सकल जगखाई ।
ज्ञान खङ्ग बिन सब जगजूझै पकरि काहु नहिं पाई ॥ ४ ॥
आपुहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनिचुनि खाई ।
कहैं कबीर तेई जन उबरेजेहिं गुरु लियो जगाई ॥ ५ ॥
संतो अचरज यक भो भाई। यह कहौं तो को¹ पतिआई १
एकै पुरुष एकहै नारी ताकर करहु बिचारा ।
एकै अण्ड सकल चौरासी भर्म भुला संसारा ॥ २ ॥
एकै नारी जाल पसारा जगमें भया अंदेसा ।
खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ ३ ॥
हे संतो ! शुद्धजीवो ! भाई एक बड़ो आश्चर्य भयो जो मैं वाको कहौं
तौ को पतियाय ॥ १ ॥ एकै पुरुषहै एकै नारीहै कहे वही जीवात्मा पुरुषौ है
नारिउ है ताको विचारकरो वा कौनहै ? एकै अंडमा कहे एक ही प्रणवमें उत्पन्न
चौरासीलाख योनि तामें परिकै यह जीव संसारके भर्ममें भुलायरह्यो है अथवा
एकही अंड कहे ब्रह्मांडहिमें ॥ २ ॥
१ कौन !

शब्द । (२०१)
यह जीव शरीर धरचो तब एकै नारी जो वाणी सो नानाप्रकार की जो है
कल्पना सोई है जाल ताको पसारि देत भई । तब जगमें नाना प्रकारको
अँदेशा होत भयो कहे नानाप्रकारके मतन करिकै जगतके कारणको खोजत-
भये परन्तु ब्रह्मा विष्णु महेश हू भी अन्त न पावतभये; थकिकै नेतिनेति त कहि
दियो आत्माको विचार न कियो कि कौनकोहै ॥ ३ ॥
नाँगफाँस लीन्हे घट भीतर मूसि सकल जग खाई ।
ज्ञान खड्ग विन सबजग जूझै पकरि काहु नहिंपाई४॥
सो ये कैसे अन्त पावै नागफांस कहे त्रिगुणकी फांसी लिये घटके भीतर
माया बनीरहै है सोई सब संसारको मूसिकै खाई लेइहै । मूसिकै खाइ जो
कह्यो सो वैतौ नाना मतनमें परे यहजानैं हैं कि, यही सत्यहै परन्तु माया
जो है सो परमपुरुषको जानिबो मूसि लियो कहे चोराइलियो । परमपुरुष जे
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको औ अपने आत्माको जानिबो कि, साहबकोहौं मैं औ
मायादिकनं को मिथ्या मानिबो यह जो ज्ञानखड्ग है ताके बिना सब जग जूझो
जाइहै । वह मायाको कोई पकरि न पायो अर्थात् यथार्थ मायाही कोई न
जान्यो, तब साहबको अपनो स्वरूप को जानै ॥ ४ ॥
आपुहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनि चुनि खाई ।
कहहि कबीर तेई जन उबरे ज्यहि गुरु लियो जगाई ॥५॥
आपहि वह मायामूल अविद्याहै जगतके नानापदार्थ करत भई कहे कारण
अविद्याभई। औ आपहीफुलवारी कहे कार्य अविद्या ह्वैकै जगतके नानापदार्थ भई
औ आपही कालरूपह्वैकै चुनि चुनि खाइहै । सो कबीरजीकहैं हैं स्वप्न जो
माया तौनेते जगाय साहब को बताइदियो है जाको सद्गुरु तेई जन उबरै हैं।
१-नाग फांस कहिये वाणीको क्यों कि जैसे नागकी दो जिह्वा होती है वैसे
ही वाणी के दो अर्थ होते हैं संसार मुख अर्थ से नरक में पडता है और गुरुमुख अर्थसे
मोक्ष पद को प्राप्त होताहै । २ क्या ।

( २०२ ) बीजक कबीरदास ।
अर्थात् जो साहबको जानै हैं औ अपने स्वरूपको जानै हैं कि, मैं साहबकोहौं
ताको माया स्वप्नवत्है । अथवा गुरुने सबते श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रहैं तेई जिनको
मोह निशामें सोवत जगाइदियो है अर्थात् हंसरूप दैके अपने पास बोलाइलियो है
तेई जन उबरै हैं कहे बचै हैं ॥ ४ ॥
इति पांचवांशब्द समाप्त ।
अथ छठाशब्द ॥ ६ ॥
संतो अचरज यक भारी । पुत्र धरल महतारी ॥ १ ॥
पिताके संग हि भई बावरी कन्या रहल कुमारी ।
खसमहिं छोड़ि ससुर सँग गवनी सो किन लेहु विचारी ॥२॥
भाई संग सासुरी गवनी सासु सौतिया दीन्हा ।
ननँद भौज परपंच रच्योहै मोर नाम कहिलीन्हा ॥ ३ ॥
समधीके सँग नाहीं आई सहज भई घरबारी ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो पुरुष जन्म भो नारी ॥ ४ ॥
संतो अचरज यक भो भारी । पुत्र धरल महतारी ॥ १ ॥
पिताके संगहि भई बावरी कन्या रहल कुमारी ।
खसमाहिं छोड़िससुरसँग गवनी सो किन लेहु विचारी ॥२॥
हे सन्तो ! एक बड़ो आश्चर्य भयो पुत्र जो यह जीवहै ताकी महतारी जौं
मायाहै सो धरतभई ॥ १ ॥ अरु पिता जो ब्रह्म है ताके संग बावरी ह्वै जात-
भई, कहे जारपुरुष बनावतभई । अर्थात् माया सबलित ब्रह्म भयो औ कन्या
जो बुद्धि है सो पतिको निश्चय कहूं न करतभई । विचारै करत रहिगई ।
कुँवारिही रहतभई अर्थात् सब मतनमें खोजतभई परन्तु निश्चय न होतभई ॥
पहिले पिता जो ब्रह्महै ताको खसम बनायो, पुनि तौने खसमको छोड़िकै
ससुर जो है मन, कहे मैनैको अनुभव ब्रह्महै ताके सँग गवनत भई । सो हें

शब्द । ( २०३ )
जीवो ! अपनेते काहे नहीं बिचारिलेउ है कि माया हमारे मन में पैठिकै
और औरमें बुद्धि निश्चय करावै है ॥ २ ॥
भाई के संग सासुर आई सासु सौतिया दीन्हा ।
ननँद भौज परपंच रच्योहै मोरनाम कहि लीन्हा ॥ ३ ॥
प्रथम याको भयभई तब या बिचार कियो कि "द्वितीयाद्वै भयं
भवति" ॥ तबहीं माया लगी याते भाई भयो । मायाको भय सोई भाई के साथ
नाना मतवारे जे गुरुवालोग तिनको जो मन है सोई सासुर है तहां आई
औ तिन गुरुवनकी बाणी जोहै सोई सासुहै काहेते ब्रह्मकी उत्पत्ति
बाणीहीसे होतीहै सो गुरुवनकी वाणी रूप जो मायाकी सासु ताकी सवति जो
दीक्षारूप सो मायाको देतभई। सो मायाते दैवयोग छूटि उजाय परन्तु दीक्षास-
वतिते नहीं छूटै है । सो मायाकी सवतिदीक्षा काहेतेभई,माया तो ब्रह्मकी स्त्री
है सो ताही ब्रह्म को दीक्षाहू लगावै है सो ज्ञान विद्यारूप है सो ब्रह्मके
साथही भई, ब्रह्मकी बहिनिभई, मायाकी ननँद कहाई तौन अविद्या ब्रह्मको पति
बनायो सो भौजी आप भई सो ये दोऊ भौजी नँनद मिलिकै परपंच रच्योहै
अरु जीव कहै है मेरो नाम कह दियो है कि, जीवही सब करै है ॥ ३ ॥
समधीके सँग नहीं आई सहज भई घरवारी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तो पुरुष जन्मभोनारी ॥ ४ ॥
मायाकी कन्या बुद्धि कहि आये सो बुद्धि कुँवारहीमें नानाजीवनको जारप-
ति बनायो सब जीव साहबके अंशहैं ताते सब जीवनके बाप साहब ठहरे सो
मायाके समधी भये । तिनके घरवारी कहे आपही सब जीवनके बिवाहलेत
भई अर्थात् बशकर लेत भई । सो कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो जीव ! जो
पुरुष है सो माया के साथनारी ह्वैगयो ॥ ४ ॥
इति छठाशब्द समाप्त ।

( २०४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सातवां शब्द ॥ ७ ॥
संतो कहौ तो को पतिआई । झूठा कहत सांच बनिआई १
लौकै रतन अवेध अमौलिक नहिं गाहक नहिं सांई ।
चिमिकि चिमिकि चमकै दृग दुहुं दिशि अरव रहा छरिआई
आपहि गुरु कृपा कछु कीन्हो निर्गुण अलख लखाई ।
सहज समाधि उनमुनी जागै सहज मिलै रघुराई ॥ ३ ॥
जहँ जहँ देखौ तहँ तहँ सोई मन माणिक वेध्यो हीरा ।
परम तत्त्व यह गुरुते पायो कह उपदेश कबीरा ॥ ४ ॥
सन्तो कहौ तो को पतिआई।झूठा कहत सांच बनि आई १
हे संतो ! झूठा जो ब्रह्महै ताको कहत कहत जीवन सांचबनि आई वही
ब्रह्मको सांच मान लियोहै अब जो मैं सांच साहबको बताउंहौं तो को पतिआय
अर्थात् कोई नहीं पतिआय है ब्रह्महींमें लगे हैं ॥ १ ॥
लौकै रतन अवेध अमौलिक नहिं गाहक नहिं साँई ।
चिमिकि चिमिकि चमकै दृग दुहुं दिशि अरव रहा छरिआई
लौ लगनको कहैं हैं सो वा ब्रह्म माही हौं या जो लौ कहेलगन ताही ज्ञानको
रतनकै अबेधित अमोलिक मानि जामें गाहक औ सांई नहीं है ( अर्थात् दूसरा
तो हंई नहीं है गाहक सांई कहांते होय ) सो वही ज्ञानको ब्रह्म मानि लियो
है । तौने ब्रह्म उनके दृगन में चमकि चमकि चमकैहै, सर्वत्र देखो परै है ।
जोकहो लोक प्रकाश ब्रह्मही देखो परै है सोनहीं अरु जो या हठ है कि, सर्वत्र
ब्रह्मही है सोईजो बरहा है सो छरिआई रह्योहै सर्वत्र ब्रह्मही देखायहै जैसे
बरहामें जलबढ़े सर्वत्र फैलिजाय है ऐसे अहंब्रह्मास्मि जो या ज्ञान सो जब
बढ्यो तब याको हठहीरूप ब्रह्मदेख्यो परैहै ॥ २ ॥

शब्द । ( २०५ )
आपुहिं गुरू कृपा कछु कीन्हो, निर्गुण अलख लखाई ।
सहज समाधिं उनमुनी जागै,सहज मिलै रघुराई ॥ ३ ॥
सो गुरुनहैं सद्गुरुते जब आपही कृपाकरैहैं तब निर्गुण जो ब्रह्महै ताको
अलख लखावै हैं कि वे कछुवस्तुही नहीं हैं अर्थात् अलख हैं धोखाहै साहब
कब मिलै जब सहज समाधि उनमुनी मुद्रा करि जो सर्वत्र ब्रह्म देखैहै तौन
उनमुनी रूप निद्राते जागै अर्थात् सहजही समाधिकै चित् अचितरूप विग्रह या
जगत साहबको है यादेखै तौ सहजहीमें परम परपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं
तें मिलैं ॥ ३ ॥
जहँजहँदेखौंतहँतहँसोई, मन माणिक वेध्यो हीरा ।
परम तत्त्व यह गुरुते पायो, कह उपदेश कबीरा ॥४॥
अधेधित अमौलिक आगे कहिआये ताको तो नेतिनेति कहै हैं वामें काहूको
मनहीं नहीं बेध्यो अर्थात् धोखही है अब साधुनको मन जो माणिक है अनु-
राग पूर्वक लागे सो साहब जे हीरा हैं तिनमें बेध्यो है । ऐसे जेसाहब चित्-
अचितरूप जहांजहां देखौहौ तहांतहां सोई है यह कबीरजी कहै हैं कि यह
परम तत्त्वको उपदेश मैं गुरुते पायोहै ॥ ४ ॥
इति सातवां शब्द समाप्त ।
अथ आठवां शब्द ॥ ८ ॥
अवतारविचार ।
संतौ आवै जायसो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिं वाके ना कहुं गया न आया ॥१॥
क्या मकसूद मच्छ कच्छ होना शंखासुर न संहारा ।
अहै दयालु द्रोह नहिं वाके कहहु कौनको मारा ॥ २ ॥
वे कर्त्ता न वराह कहावैं धरणि धरै नहिं भारा ।

( २०६ ) बीजक कबीरदास ।
ई सब काम साहबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ ३ ॥
खंभ फारि जो वाहर होई ताहि पतिज सबकोई ।
हिरणाकुश नख उदर विदारे सो नहिं कर्त्ता होई ॥ ४ ॥
वावन रूप न बलिको यांचे जो यांचै सो माया ।
विना विवेक सकल जग जहड़े माया जग भरमाया ॥ ५ ॥
परशुराम क्षत्री नहिं मारा ई छल माया कीन्हा ।
सतगुरु भक्ति भेद नहिं जाने जीव अमिथ्या दीन्हा ॥ ६ ॥
सिरजनहार न व्याही सीता जल पषाण नहिं बंधा ।
वे रघुनाथ एककै सुमिरे जो सुमिरै सो अंधा ॥ ७ ॥
गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा ।
है मिहरवान सबनको साहब नहिं जीता नहिं हारा ॥ ८ ॥
वे कर्त्ता नहिं बौद्धकहावैं नहीं असुरको मारा ।
ज्ञान हीन कर्त्ता के भरमें माया जग संहारा ॥ ९ ॥
वे कर्त्ता नहिं भये कलंकी नहीं कलिंगहि मारा ।
ई छल बल मायै कीन्हा यतिन सतिन सब टारा ॥ १० ॥
दश अवतार ईश्वरी माया कर्त्ताकै जिन पूजा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ उपजै खपै सो दूजा ॥ ११ ॥
अवतार विचार ।
अबतक सबके गुरुश्रेष्ठ परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रको वर्णन करिआये ति-
नके द्वारमें नारायणादिक मत्स्यादिक रहे आवैहैं ते अमायिकहैं काहेते कि आवै
जायनहीं हैं तिनहीको परात्पर ब्रह्म करिकै वर्णतहैं तामें प्रमाण ॥ ( पूर्णमदः
पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदुच्यते । पूर्णस्यपूर्णमादायपूर्णमेवावशिष्यते इतिश्रुतेः ) ॥ ”
औ ई माया ते परे हैं औ बहुधा निरंजननादिक जे नारायणहैं जिनको पांच

ब्रह्ममें कहिआयेहै ते, उनकी उपासना करिकै उनको आपनेते अभेद मानि
कै उनकी शक्तिको प्राप्ति ह्वैकै जगत्के कार्य सब करैंहैं। औ जब मत्स्यादिक
अवतारलेईं हैं तब जे साकेत मत्स्यादिक हैं तिनकी अभेद भावना करिकै
उतने अवतारकी शक्ति पाइकै आपही मत्स्यादिक होइहैं ये सब साकेतमें जे
नारायणादिक सबहैं तिनके उपासक हैं उपासनामें देवको औ अपनो अभेद
मानिवो लिख्यो है ॥ “ देवोभूत्वादेवंयजेत् ” ॥ तेहिते उनकी शक्तिते ये
सबअवतार लेइहैं। जोकहो यामें कहा प्रमाणहै कि, येसब उनहींके उपास-
कहैं । तो रामनामके साहब मुखअर्थमें मकार स्वतःसिद्ध सानुनासिक है
ताको जो है मात्रा तौनेमें साहबके जे सब पार्षद हैं तिनको वर्णन करिआये
हैं । ये सब नारायणादिक रामनामहीकी उपासनाकरै हैं सो जाकी जाकी
उपासना कीन चाहै हैं ताकी ताकी उपासना रामनामहीमें ह्वै जायहै रामना-
मकी ये सब उपासनाकरै हैं तामें प्रमाण ॥ “ नारायणःस्वयंभूश्चशिवश्चेन्द्रा-
दयस्तथा । सनकाद्याश्च योगीन्द्रानारदाद्यामहर्षयः ॥ सिद्धाः शेषादयश्चैवलोम-
शाद्यामुनीश्वराः । लक्ष्म्यादिशक्तयःसर्वाःनित्यमुक्ताश्चसर्वदा ॥ मुमुक्षवश्च
मुक्ताश्चऋषयश्चशुकादयः । तत्प्रभावंपरंमत्वामंत्रराजमुपाँसैंते ॥ इतिवसिष्ठसंहि-
तायाम् ॥ ” जो कहो ये सब रामनाममें साहबमुख अर्थ तौ जान्यो मायिक
काहेभयो ? तौ बिना माया सबलित भये जगत्के कार्य नहीं ह्वै सकै हैं तेहिते
ये सब माया सबलित ह्वैकै कार्यकरै हैं । परन्तु जैसे इतर जीवनके जन्म
मरण होईहैं तैसे इन के नहीं होईहैं । जब महाप्रलयभई तब, सबजीव साहब
के लोक प्रकाशमें समष्टिरूप रहै हैं जब उत्पत्तिभई तबफिरि, कर्मकरिकै उत्प-
त्तिहोइहै । औ ये सब नारायणादिकनकी उत्पत्ति प्रलय नहीं होइ है । काहेते
कि ईश्वरहैं, जब महाप्रलयभई तब जे साकेत लोकमें नारायणादिकहैं ते,
इनके अंशीहैं उपास्यहैं तहां लीन ह्वैकै रहेजाइहैं । उत्पत्ति समयमें समष्टि जीव
व्यष्टि होन चाहैंहैं तब राम नाममें जगत् मुख अर्थको भावना करै है, तब
साकेतनिवासी जे नारायण हैं तिन्हें तिनके अंशई सब पांच ब्रह्मरूपते प्रकट
होइहैं । साकेतमें जे नारायणादिकहैं ते अमायिकहैं, औ तिनके अंश नारायणा-
दिक मत्स्यादिक अवतार लैकै आवै जाय हैं ते माया सबलित हैं । सो ये सब

( २०८ ) बीजक कबीरदास ।
मत्स्यादि अवतारनको मायिक कहिकै कबीरजी साहब को परतवदेखविहैं कि
साहब सबते भिन्नहैं ॥
संतौ आवै जाय सो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिंवाकें नहिं कहुं गया न आया ॥१॥
हे संतौ! आवैजायहै सो तो मायाको धर्म है।जे साहब परम परपुरुष श्रीराम
चन्द्र हैं ते सबको मतिपालही भर करै हैं कहे उद्धार ई भर करैहैं औ काम
नहींकरै हैं । उनके कालनहीं है अर्थात् प्रलय आदिक नहीं होइहै । अथवा जो
कोई वे साहब को जानै है ताको कालको भय छूटिजायहै वे परमपुरुष श्रीरा-
मचन्द्र ना कहीं गये हैं न आये हैं ॥ १ ॥
क्या मकसूद मच्छ कच्छ होना शंखासुर न सँहारा ।
अहैदयालु द्रोह नहिं वाके कहौ कौनको मारा ॥ २ ॥
वे कर्त्ता न वराह कहावैं धरणि धरै नहिं भारा ।
ई सब काम साहबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ ३ ॥
अरु वे उद्धारकर्त्ता परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रको क्या मकसूद कहे क्या
मक्सद है अर्थात् क्या प्रयोजनहै, मच्छ कच्छ होनेका । वे शंखासुरको नहीं
संहार्योहै शंखासुर उपलक्षण याते जिनको जिनको मार्यो है अवतारते सब
आइगये । अरु सो दयालु हैं सबकी रक्षाकरै हैं उनके द्रोह नहीं है कहौ कौनकों
मार्यो है ॥ २ ॥ अरु वे उद्धारकर्त्ता साहब वाराह नहीं भये औ न पृथ्वीको
भारा धर्यो सो जौन सबकोई कहै हैं कि, ई सब काम साहबहीके हैं सो यें
काम साहब के नहीं हैं यह संसार झूठई कहैहै सो साहबको बिना जाने
कहै हैं ॥ ३ ॥
खम्भ फारि जो बाहरहोई ताहि पतिज सब कोई ।
हिरणकशिपु नख उदर बिदारे सो नहिं कर्त्ता होई॥४॥

शब्द । (२०९)
बावनरूप न बलिको यांचे जो यांचे सो माया ।
बिना विवेक सकल जग जहड़े माया जग भरमाया५
औ खम्भ फारिकै बाहर है कै नरसिंह रूप है नखते हिरणकशिपुके उदरको
विदारचो है तौनेन व्यापक ब्रह्म को सबकोई पतियायहे सो वे उद्धारकर्त्ता
परमपुरुष श्रीरामचन्द्र नहीं हैं । यह सब माया कियो है ॥ ४ ॥ औ बावन-
रूप है वे साहब बलिको नहीं यांच्यो है । मांगिवो पाइबो तो सब माया है
सब जगत् के जीव बिना विवेक जहड़े कहे भुलाय गये हैं । सब जीवनको
माया भरमाइ लियो है ॥ ५ ॥
परशुराम क्षत्री नहिं मारा ई छल मायहि कीन्हा ।
सतगुरु भक्ति भेद नहिं जानै जीव अमिय्या दीन्हा॥६॥
अरु वे उद्धारकर्त्ता परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्र परशुराम है क्षत्रिन को नहीं
मार्यो है यह सब मायाही कियोहै । सतगुरु कहे सैकरन जे गुरुवा हैं ते
साहबके भक्तिके भेदको जानै नहीं हैं । जीव को ये जे नारायण हैं औ सब जे
अवतारहैं तिनही को अमिथ्या कहे मिथ्या नहीं सांच कहिकै कि, वे सांच साहब
येई हैं तिनही की जीवन को दीक्षा देइ है । सो मिथ्या है ॥ ६ ॥
सिरजनहार न ब्याही सीता जल पषाण नहिं बंधा ।
वे रघुनाथ एककै सुमिरे जो सुमिरे सो अंधा ॥७॥
औ वे सिरजनहार कहे जाके सुरतिदियो ते, ब्रह्मा विष्णु महेश आदिक
अवतार लेइहैं औ जगत्‌की उत्पत्ति होइहै सो सीता को नहीं बिवाह्यो, औ सेतु
नहीं बांध्यो । सो वे निर्विकार उद्धारकर्त्ता रघुनाथको औ ये
सब अवतारनको एक करिकै सबकोई सुभिरै हैं । सो जो एक करिकै सुभिरै हैं
ते अंधे हैं । काहेते कि, वे तौ रघुनाथ हैं । रघु कहिये सब जीव को तिनके
नाथ हैं वे काहेको काहू के मारनको अवतार लेइँगे । वे निर्विकार औ ये
माया सबलित द्वैकै सब अवतार लेइ हैं । जो कोई आवेजात है सो मायिकहै
सो वे निर्विकार साहब औ सविकार ये सब अवतार एक कैसे होइँगे । आ
१४

( २१० ) बीजक कबीरदास ।
रघु जीवको कहै हैं ते रघुशब्दकै ( व्युत्पत्तीरंवतेलोकाल्लोकांतं गच्छंति रववो-
जीवास्तेषांनाथः ) अर्थ लोकते और लोक जाय ते जीवरघु हैं तिनके नाथजे
हैं तेई रघुनाथ हैं ॥ ७ ॥
गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा ।
है मेहरवान सबनको साहब नहिं जीता नहिं हारा ॥ ८ ॥
औ गोपी ग्वाल गोकुल में कबहूं नहीं आये हैं वे उद्धारकर्त्ता साहब कंसको
करतेनहीं मारयो औ न मथुरागये काहेते कि ब्रह्म वैवर्त्तमें लिखा है। ( वृन्दावनं-
परित्यज्यपादमेकंनगच्छति ) ॥ वे साहब तो सबके ऊपर मेहरबानी करनवारे
हैं वे न काहूसों जीते हैं न हारे हैं न काहूको मारे हैं अर्थात् युद्धई नहीं कियो
वेतौ रासई करत रहे हैं ॥ ८ ॥
वे कर्त्ता नहिं बौद्ध कहावैं नहीं असुरको मारा ।
ज्ञानहीन कर्त्ता भरमे माया जग संहारा ॥ ९ ॥
वेकर्त्ता नहिं भये कलकी नहीं कलिगहि मारा ।
ई छल बल सब मायै कीन्हा यतिन सतिन सब टारा १०
अरु बौद्धरूप ह्वैकै दैत्यनको नास्तिक मतसिखै दैत्यनको संहार कराइ
डारयो है सो सबमाया कियो है बे मुक्तिकर्त्ता साहब नहीं कियो । काहेते कि
वे मुक्तिकर्त्ता साहब देवको निन्दा करिकै इनको अज्ञानी कैसे करेंगे । सो
ज्ञानहीन जे हैं भ्रमै, ते यह कहै हैं कि, यह सब उद्धार कर्त्ता जो है सोई सब
करै है सो कर्त्ता नहीं करै है यहमाया सब जगत्को संहारकरै है ॥ ९ ॥ अरु
वे उद्धारकर्त्ता परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र कलकी अवतार नहींलियो औ न
कलिंग देशी जे म्लेक्ष हैं तिनको मारयो है यह छलबल सबमायै कियो है ।
यतिनको जो है सत्य सबताको टारिदियो है अर्थात् यती जे रहे संन्यासी
गोरखादिक तिनकर सत्य जो है साहबको जाननवारो मत तौनेको टारिदियौ
योगादिकनमें लगाइदियो ॥ १० ॥

': it's 'ह' with two slants (ai), and at the bottom there's a loop... wait, is it 'ह्वै' or 'है'?
In line 11: "साकेतई प्रकटहोइ है" -> that's 'है'.
In line 16: "साकेतई ह्वै गयो" -> in Braj/Awadhi commentary, "ह्वै गयो" (became) is standard!
Wait, look at the bottom of 'ह': there is a small 'व' subscript! It is "ह्वै गयो"!
Wait, let's check line 20: "होइहै तब प्रकटह्वै जाइहैं" - look at "प्रकटह्वै": 'ह' with 'व' subscript and 'ै'!
Line 21: "तब गुप्त ह्वैजाइ हैं" - 'ह्वै'!
Line 22: "ह्वैजाइहै कैसे ?" - 'ह्वै'!
Yes! Vishwanath Singh consistently writes "ह्वै" (ह + ्र/व + ै = ह्वै)!
Now look at line 16: "साकेतई ह्वै गयो"! Yes, it has the 'व' conjunct: "ह्वै गयो"!

Wait, look at line 16 end:
"तौ साकेतको आइबो तौ आयौ"
Wait, "आयौ" or "भयौ"?
Look at

होइहैं, सो पीछेलिखि आये हैं । जबउद्धारकर्त्ता साहब प्रकटहोइ हैं तब जे
देखन वारे सुननवारे हंसरूप में स्थित हैं तेई वहीरूपते देखैहैं सुनै हैं सच्चिदा-
नन्दात्मको (भगवान् सच्चिदानन्दात्मिका अस्यव्यक्तिः ) यह श्रुति करिकै
एकरूपताकहि आये हैं । याहीते लोकहूको व्यापक कह्यो । औ नारायण जौं
रामावतारलै अशोकवाटिका में लीला कियो सो वर्णनकरि मन बचनके परे जे
साहबहैं तिनके लीलाको व्यंजित करै हैं । सो व्यंजित तो करै हैं परन्तु मनब-
चनके परे जेसाहब हैं तिनके नामरूप लीलाधाम मनबचनके परे साकल्य करि-
कैव्यंजितऊ नहीं करिसकै हैं । सो यह बातजो कोई साहब करिकै हंसरूपपाये
हैं, सोसाहबके मनकारिकै साहबको नामादिक जानै है। औ जपै है औ साहबके दिये
रूपकी आंखीते साहबको देखै है । तामें वेदसारोपनिषत् को प्रमाण ॥ ३७॥
( जनकोहवैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसृत्यपप्रच्छकोहवैमहान्पुरुषोयंज्ञात्वेहविमुक्तो-
भवतीति ॥ १ ॥ सहोवाचकौशल्योरघुनाथएवमहापुरुषः तस्यनामरूपधाम-
लीला मनो वचनाद्यविषयाः सपुनरुवाचेदृशं कथमहं शक्नुयां विज्ञातुंज्ञापकाज्ञा-
नादितिसपुनः प्रतिवक्ति अथैते श्लोकाभवंति ॥ विरजायाः परे पारे लोको वैकुण्ठसं-
ज्ञितः ॥ तन्मध्येराजतेयोध्या सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ ३ ॥ तत्रलोकेचतुर्बाहु
रामोनारायणः प्रभुः ॥ अयोध्यांयादचास्य अवतारोभवेदिह ॥ ४ ॥ तदा-
स्ति रामनामेदम्भव-रविधौविभोः ॥ तन्नाम्नोनामरहितस्यान्ना तं नाम तस्यहि
॥ ५ ॥ दशकण्ठवधाद्यादिलीलाविष्णोः प्रकीर्त्तिताः ॥ सकदाचिच्च कल्पेस्मिँ-
ल्लोकेसाकेतसंज्ञिते ॥ ६ ॥ पुष्पयुद्धंरघूत्तंसः करोति सखिभिः सह॥ ७॥ कस्मिन-
न्कल्पेतुरामोसौ बाणजन्यેચ્છया.विभुः ॥ तैरेवसखिभिः सार्द्धमाविर्भूय रघूद्वहः
॥ ८ ॥ रावणादिवधैलीला यथाविष्णुः करोतिसः ॥ तथायमपितत्रैवकरोति-
विविधाः क्रियाः ॥ ९ ॥ क्रियाश्च वर्णयित्वाथ विष्णुलीलाविधानतः ॥ लीला-
निर्वचनीयत्वंततोभवतिमूचितम् ॥ १० ॥ किंचायोध्यापुरोनामसाकेतइतिसो-
च्यते ॥ इमामयोध्यामाह्वाय सायोध्यावर्ण्यतेपुनः ॥ ११ ॥ अनिर्वाच्यत्व-
मेतस्याव्यक्तमेवानुभूयते ॥ रामावतारमाधत्तेविष्णुः साकेतसंज्ञिते ॥ १२ ॥
तद्रूपंवर्णयित्वानिर्वचनीयमभोः पुनः ॥ रूपमाख्यायतेविद्भिर्महतः पुरुषस्य हि
॥ १३ ॥ इत्यथर्वणवेदेवेदसारोपनिषदिप्रथमखण्डे ) श्रीकबीरजीका यहीमतहै
कि, साकेतछोड़िकहूं नहींजायहै नित्यबिहारी हैं ॥ ११ ॥
इति आठवां शब्द समाप्त ।

शब्द। ( २१३ )
अथ नवमशब्द ॥ ९ ॥
संतौ बोले ते जग मारै ।
अन बोलेते कैसे बनिहै शब्दै कोइ न विचारै ॥ १ ॥
पहिले जन्म पूतको भयऊ बाप जनमियाँ पाछे ।
बाप पूतकी एकै माया ई अचरज को काछे ॥ २ ॥
उंदुर राजा टीका बैठे विषहर करै खवासी ।
श्वान बापुरा घरनि ठाकुरो बिल्ली घरमें दासी ॥ ३ ॥
कागज कार कारकुडू आगे बैल करै पटवारी ।
कहहि कबीर सुनौ हो संतौ भैसैं न्याउ निवारी ॥ ४ ॥
संतौ बोले ते जग मारै ।
अनबोलेते कैसे बनिहै शब्दै कोइ न विचारै ॥ १ ॥
पहिले जन्म पूतको भयऊ बाप जनमिया पाछे ।
बाप पूतकी एकै माया ई अचरज को काछे ॥ २ ॥
हे संतौ! जो बोलौहौं कहे जोमैं बताउंहौं सोतो मानै नहीं है बोलेते जगमा-
रैहै कहे शास्त्रार्थकरैहै औ जो न बोलौं तो बनैकैसे शब्दको कोई नहीं बिचारै
॥ १ ॥ अरु पहिले पूतजो जीव है ताको जन्म हैलेइहै तब पिता जोहै जीव-
को अनुमान ब्रह्म ताको जन्म होइहै । पिताजीवको काहेते कह्यो कि, जब शुद्ध
जीव एकते अनेक ब्रह्मही द्वारभयोहै वह माया सबलित ब्रह्मपूतहै औ जीव
मायाहींमें परचोहै दोनों माया सबलितहैं सो बापजोहै जीव औ पूतजोहै ब्रह्म
तिनकी महतारी एक मायाही है अर्थात् यहीते अनादिकालते दोनों प्रकटहैं
वहींमें पैरहैं। सो तैं बिचारु तौ यह अचरजको काछैहै अर्थात् तैंहीं अपने
अज्ञानते यह अचरज काछे है औ नानारूप धेरैहै ॥ २ ॥

( २१४ ) बीजक कबीरदास ।
उंदुर राजा टीकाबैठे बिषहर करै खवासी ।
इवान बापुरा धरनिठाकुरा बिल्ली घरमें दासी॥ ३ ॥
उंदुर जोहे मूस सो तौ राजा भयो टीकामें बैठ्यो औ बिषहर सर्प सो खवा-
सी करैहै औ श्वान बापुरा जो है सोधरनि ठाकुरा कहे बस्तु लैके ढांकिके धरै
है कहे भंडारीहै औ बिल्ली घरमें दासी है सो खानवालिनि है । अर्थात् उंदुरकहैं
वह साहबको ज्ञान जाको दूरकै दियो है । उंदुरमूसको संस्कृतमें कहैं हैं सो
उंदर कहे मूसतो जीवहै सो उंदुर शरीरको आपनो मानिलियो है सोई राजाम-
यो अरु वाको खानवालो जोहै सर्पसो कालहै । सो खवास भयो कहे क्षण पल
घरी पहर वाको खात बीती तो होतनायहै सो खवास ह्वैकै यहकाल वाकी
आयुर्दायको खातई जायहै । औ नाना प्रकार की जो बिषयहैं तेई बीरा है ताको
खवावत जायहै । अरु श्वानकहे वह स्वानुभावानन्द जोहै सो बापुरा जो जीव
ताकोधारिकै ढांकि लियो है कहे साहबको ज्ञान नहीं होन देइहै औ बिल्ली जो है षट्
दर्शनकी बाणी सोघरमें दासी हैरही है कहे नाना मतन में लगावैहै साहबकी
भक्ति रस जो है सोई है गोरस ताको खाइ लेइ है ॥ ३ ॥
कागज कार कारकुड आगे बैल करै पटवारी ।
कहहि कबीर सुनो हो सन्तो भैंसै न्याउ निवारी॥४ ॥
कागज कार कहे लिखो कागज कार कुड जो बैलहै ताको आगे धरो है ।
सोई बैल पटवारी करैहै । सो कारो कागज कहे लिखो काजग जो गुरुवा
लोगनकी बनाई पोथी तिनको आगेधरिके बैलजे गुरुवा लोगन के चेलाहैं ते
पटवारी करैं हैं । अर्थात् कायानगरी के बसैया जे मन बुद्धि चित्त अहंकार
पृथ्वी अपू तेज वायु आकाश दशौ इन्द्रिय तिनको बिचारिके कि, कौन काके-
आधीनहै ज्ञानरूपी द्रव्य तहसील करैहै । वा पटवारीकैकै द्रव्य राजाके इहां
लेजाइहै । या ज्ञानरूपी द्रव्य आत्मा में राख्यो आइ अर्थात् काया नगरीकें
बसैया सब जीवात्मैते चैतन्यहैं याते आत्मै मालिकहै । यह निश्चयकियो ।
सो कबीरजी कहैं हैं हे संतो ! तुम सुनो वहां भैंसा जो है सोई न्याउ निबा-
रैहै, इहां भैंसाकहे गुरुवालोग जो हैं सोआपचहलामें परैहैं औ चहलामें परोजो