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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 766 में से

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पृष्ठ 280

( २३० ) बीजक कबीरदास ।
को विषय सुख चाहै हैं, आधेमुमुक्षू हैकै ईश्वरन के लोकको सुख चाहै हैं, औ
ब्रह्ममें लीनहैबो चाहै हैं, इनमें पूरीविषय भोगनहीं है, यातें आधाकह्यो अहंब्रह्म
तूलते नाना शरीर भ्रमरूप सूत निकस्यो एकते बहुत हैगयो । जोपट संसारमें
बिनिगयो सो पट जो है संसार सो रत्तीभर न घटैहै न बढ़ैहै घरहाई जोहैं
जीवैकौनारीमायासो यहीजीवको कच अपने करमें करिलियोहै अर्थात् यहजीवकी
चूँदीगहि लियोहै मायाको भोक्ताजीवहै यातेजीवहीकी स्त्री माया है ॥ ३ ॥
नित उठि बेठ खसमसों वरवस तापर लागु तिहाई ।
भीनी पुरिया काम न आवै जोलहा चला रिसाई ॥४॥
खसम जो जीवहै तासो नित उठिउठिके वरवस कहै जबरदस्ती बेठ कहैं
बेगारि लेयहै सोएकतो संसारमें माया बेगारिलेयहै दूसरो जोभागतें यह
संसारउठो तो आत्मा को तिहाईलगो कहे त्रिकुटीमें धोखा ब्रह्मको ध्यान लगा-
यो । जोनमें विनिजायहै तौन पुरिया कहावैहै । सों जब भीजिजायहै तब नहीं
काम आवैहै । ऐसे यह संसार पुरिया है नाना पदार्थ ते जो है राग तेहिकरिकें
जब शरीर भीज्यो तब यह संसारको असार जानिके कहे संसार कुछ कामको
न जानिके जोलाहा जोहै जीव सो रिसाय चल्यो, धोखाब्रह्ममें लगतभयों;
सोऊ ब्रह्मतो तांहीको अनुभव है वहअनुभव ब्रह्ममें कछु न पावतभयो ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जिन यह सृष्टि उपाई ।
छाडि पसार राम भजु वौरे भवसागर कठिनाई ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि, जामें तुम लग्यो है सोतो तिहारोई मन को अनु-
भवहै अरु यह संसारऊको तुम्हारो मनही रच्यो है. सो जिन सृष्टिवाली उपाय
कियोहै तेहि माया ब्रह्मते छोड़ि पसार परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र को भजन
करु, काहेते कि, यह भवसागर परमकठिनहै उनहींके भजन किये छूटैगों,
औरीभांति न छूटैगो, और तो सब याही में परैहैं अथवा यहकठिन भव-
सागरमें आयके श्रीरामचन्द्रही को भजन करि मनते छूटैगौ ॥ ५ ॥
इति पन्द्रहवां शब्द समाप्त ।