कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २२७ )
ह्वै मसकीन कुलीन कहावौ तुम योगी संन्यासी ।
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥२॥
रामराकहे रकार जिनको मराहै अर्थात् रकार बीजको जिन को अभावहै,
रामोपासक नहीं हैं, तिनकी संशयकी गांठिनहींछूटै है, तेहितेपकरिपकरिके यम
लूटिलेइहैं अर्थात् याकोमारिकै नरकमें डारिदेइँ हैं । फिरिफिरि शरीर पावै है
फिरिलुटि जायहै मारो जायहै ॥ १ ॥ मसकीन कहे गरीब फकीर ह्वैकै कुलीन
कहावै है कहे भये तौ फकीर परन्तु कुलाभिमान नहीं छूटै है कहै हैं कि, हम-
फलाने गद्दीके मुरीदहैं । सो तुम योगी हौ संन्यासी हौ ज्ञानी हौ गुणी हौ
शूर हौ कविहौ दाताहौ इत्यादिक जो भेदकी मति हैं सो कोई न नाशकीयो
काहेते कि, हे संतो ! ये परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रके अंश हैं सो यह कोई नहीं
जान है औ यह जगत् चित् अचित् विग्रहकारिके साहबको रूपहै भेदकी बुद्धि
लगाइ राख्यो है ॥ २ ॥
स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब अनुभव भाव न दरशै ।
लोह हिरण्य होय धौं कैसे जो नहिं पारस परशै ॥ ३ ॥
स्मृति वेद पुराण सबै पढ़ै हैं परंतु परमपरपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं सबके तात्पर्य
तिनको अनुभव काहूको नहीं दरशै है । जो पारसको स्पर्श न होय तौ लोह
हिरण्य कहे सोन कैसेहोय न होय । तैसे स्मृति वेदपुराणनको तात्पर्य श्रीराम-
चन्द्रहैं तिनके चरणको जोलौं न परशै तौलौं मुक्ति नहीं होयहै पार्षद रूपत्व
वाको प्राप्ति नहीं होयहै ॥ ३ ॥
जियत न तरै मुयेका तरिहौ जियतै जो न तरै ।
गहि परतीति कीन जिनजासों सोई तहँ मरै ॥ ४ ॥
जो कछु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझि सयाना ।
कहै कबीर तासों का कहिये देखत दृष्टि भुलाना ॥ ५ ॥
सो जियतमें जो न तुम तरोगे तौ मुयेकैसे तरोगे । सो हे जीवो ! जियतै
काहेंनहीं तरिजाउहै । जासों कहे जौने साहबसों जाके स्पर्शकिये जीव शुद्ध