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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

( २२० ) बीजक कबीरदास ।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते माती शिवकी नारी ।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन अजहुं न छूटी खुमारी ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिन रे पिया तिनजाना।
कहै कबीर गूंगेकी शक्कर क्यों कर करै वखाना ॥ ६ ॥
संतो मते मात जन रंगी ।
पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी ॥ १ ॥
संतो मतेकहे संतनके जेमतहैं जिनमें रंगेजे जनहैं तेईमात कहे मातिरहे हैं ।
“रंगच्छतीतिरंगः रंगोस्यास्तिगुरुत्वेनेतिरंगी” रकार बीजको जो कोई प्राप्त होइ
है सो रंग कहावैसो रकार बीज रामोपासकनके होइहैते रामोपासक जाके गुरुहोइ
सोकहावैरंगी । अथवा सुरति कमल बैठे जे परम गुरुहैं ते रकार बीजको उच्चार
करै हैं, सो रकार बीजको जो कोई वहां जाइकै सुने सो रंगीहै।सोई रंगी संतनके
मतमें माते है । औ कबीरऊ रकारई बीजको जपत रहेहैं सोवंशावलीमें लिख्यो
है। श्रीराजारामसिंह बाबाकबीरजीते पूछ्यो कि आपका कौन सिद्धांतहै तब कबी-
रजी कह्यो ॥ “रा अक्षर घट रम्यो कबीरा।निज घर मेरो साधु शरीरा” ॥
सो पीछे लिखिआये हैं । अरु सुधाको मादकधर्म है सो श्रीरामचन्द्र के प्रेम-
रूपी प्यालामें भरचो जो है सुधारसरूपा भक्ति ताको जे पानकरै हैं तिनके
सत्संगी जे हैं तेऊ मतवाले हैनायेहैं कहेपरम सिद्धांतवालो जो मत है तेहि तें
युक्त हैंजाइहैं । अथवा रसरूपा भक्तिको नशा चढ़ोरहै दिनराति अर्थात् रस
आनन्दको कहै हैं सो आनन्दमें निमग्नरहैं तामें प्रमाण ॥ “रसोवैसःरसं-
ह्येवायंलब्ध्वानन्दीभवति ॥” इतिश्रुतेः इहां सुधारस को कह्यो ताको हेतु यह
है कि जे सुधारसको पीते हैं तेई जनन मरण छोड़िकै अमर होयहैं औरनको
जनन मरण नहीं छूटै है अरु वह रसरूपा भक्ति मधि उत्तत्ति भयो है ताको
रूपक करिके समुझावै हैं ॥ १ ॥
अर्ध ऊर्ध्व लै भाठी रोपी ब्रह्मअगिनि उदगारी ।
मूँदे मदन कर्म काटि कसमल सतत चुवै अगारी ॥ २ ॥