कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( २२२ ) बीजक कबीरदास ।
जो कह्यो ताते आनन्दरूप वे महल बर्त्तमान बने हैं । अमहल कह्यो याते
निर्गुणधर्म आयो औ महलकह्यो याते सगुणधर्म आयो । सगुणनिर्गुण में नहीं
होयहै । निर्गुण सगुणमें नहीं होयहै उन में दोनों धर्म बने हैं ताते वे निर्गुण
सगुणके परे विलक्षण महलमें हैं । तिनमें जायके दिवाने भये । माया ब्रह्ममें जो
दिवानेरहे सो छोड़ि दिये । अमहलमें दिवाना ह्वै गये महलन में साहबकी अनेक
प्रकारकी लीलनको ध्यान कैकै हंसरूप में स्थित ह्वैकै रसरूपाभक्ति पानकैकै
छकिरहे । रसरूपाभक्ति शांतशतक के तीसरे खंड में औ रामायणादिकमें
हमलिखे हैं सो देखिलेहु ॥ ४ ॥
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते माती शिवकी नारी ।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन अजहुं न छूटि खुमारी ॥५॥
औ ध्रुव प्रह्लाद विभीषण औ पार्वती मतिगई औ सगुण ब्रह्म जे साक्षात
नारायण श्रीकृष्ण हैं तेऊ वृन्दावन में मतिगये । अबहूं भरखुमारी नहीं छूटी
की भाव यहहै कि, जिनके शरीर छूटे तेतो साकेतहींमें जाय दिवानेभये कहे
प्रेम में छके । ओ जिनके शरीर बनेहैं तिनहूंकी खुमारी नहीं छुटी कहे अबहूं
भर श्रीरामचन्द्रहीकी उपासना करेहैं तामें प्रमाण ॥ ( पूजितोनंदगोपाद्यैःश्री-
कृष्णेनापिपूजितः । भद्रयामहिशीभिश्चपूजितोरघुपुङ्गवः ॥ ) यह ब्रह्मवैवर्त्त
को प्रमाण है जौने को प्रमाण सब आचार्य दियो है ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिनरे पिया तिन जाना।
कहै कबीर गूं गे को शक्कर क्यों करि करे बखाना ॥ ६ ॥
औ सुर नर मुनि जेते पीर औलिया हैं तिन में जे श्रीरामचन्द्र की उपासना
कियेहैं तेई रसभरी प्रेमकटोरी पियो है औ तेई मन बचनके परैहैं । जे साहब-
के नामरूप लीलाधाम तिनको जान्यो है । सो जिनजान्यो है तिनको वर्णन
करिवेको वह गूंगे को शक्कर है काहेते वह मन बचनकेपरे है, जब वहीभांति
उन्हौहै जाय तब बाको स्वाद पावै । काहू सों वाको कोई बखान नहीं करि
सकैहै । सो कबीरजी कहैहैं । जो कोई कहै यहअर्थ नहीं है वह प्रेमको पियाला
जो कबीरजी ब्रह्मको कहिआयेहैं वहीको पीपीकै सब मतवार ह्वैगये हैं,सांचपदार्थ