कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २२५ )
भव कियो तब गुरुवालोग बतायो कि तुम्हीं ब्रह्म हौ, तुम्हारई जीवात्मा मालिकह
सब्रको । राम सबको खाय लेयहै रामको का भजो रामतौ मायिकहै । जो कुछ
उनकी श्रीरामचन्द्रमें वासनारही सोऊ छूटिगई । यही गुरुवाहै पक्षी वा रस
नहीं पावै है तबखेद होइ है औ या वही ज्ञानमें दृढ़ता करिके उड़त उड़त
नरकही में गिरै है नरकमें दुःख पावैहै ॥ २ ॥
कहा खजूर बढ़ाई तेरी फल कोई नहिंपावै ।
ग्रीषम ऋतु जब आय तलानी छाया काम न आवै॥३॥
अब धोखा ज्ञानवाले नको खजूरको दृष्टांतदैके कहै हैं । खजूरकी बड़ाई लै
कहा करै फल तो कोई पावतै नहीं है । ग्रीष्मऋतु में छायाकाहूके काम नहीं
आवैहै । वांके तरेही रहैहै, आतप तपतै रहै है । ऐसे हे गुरुवा लोगो ! तुम्हारी
बड़ी बड़ाई कि, मैंही ब्रह्महौं, मोते बड़ो कोई नहीं है,आत्मै मालिक है। सो न
कोई ब्रह्म भयो ना आत्मै मालिक भयो या फल कोई नहीं पायो । जो कोई
तुम्हारे मत में आवै है उनको जनन मरणरूप ग्रीष्म तापनहीं छूटै है या तुम्हारो
उपदेश रूप छाया काहूके काम नहीं आवै है ॥ ३ ॥
अपना चतुर औरको सिखवै कामिनि कनक सयानी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तो रामचरण रतिमानी ॥ ४ ॥
गुरुवालोग कनक कामिनीके मिलिबेको आप चतुर हैरहे हैं । कनक सुवर्ण
कहावै है सो आत्मा को सुवर्ण जोहै स्वस्वरूप सो मायारूपी कामिनीमें लप-
ट्योहै तेहिते शुद्धनहीं है । अथवा कनक जोहै सुवर्ण सो शुद्धहै औ सुवर्णके
जेहैं भेद कुण्डलादिक भूषण तिनके भेद मिथ्याहैं । ऐसे और सबको मिथ्या-
मानिके एकब्रह्म हीको मानिबो । औ कामिनीमें सयानी कहे ज्ञान करिकै
विचारै है कि, कामिनी माया हई नहीं है, मिथ्या है । यही सयानी कहे ज्ञान
आपऊ सिखै है औ औरहूको सिखावै है परन्तु जननमरण होतई जायहै माया
नहीं छूटै है सो कबीरजी कहै हैं कि, हेसंतो ! याहीते मैं ये बखेडनको छोड़ि-
के परमपरपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनके चरणनमें रतिमान्यो है । इहां संतनकों
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