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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 766 में से

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पृष्ठ 283

शब्द । ( २३३ )
तुम वह साहब को कैसे समुझौ इंद्रिय बिना ह्वैकै साहब के लोक को जौहै
भोग सुख है ताको लेऊ औ बिना जिह्वा ह्वैकै अनिर्वचनीय जो राम नामहै
ताको स्वादलेऊ । औ पिंड बिहूनाकहे पांचौ शरीरते बिहीन ह्वैकै कहे पांचौ
शरीरनको छोड़िकैहंसस्वरूपमें स्थित ह्वैकै अक्षय कहे अक्षय ह्वै जाऊ । तुम्हारे
अंतःकरण रूपीघरको चोरजोहै धोखा ब्रह्म सो मूसि लेय है अर्थात् साहब को
ज्ञान चोराय लेयहै तुमहीं अहं ब्रह्म बुद्धि कराये देयहै। काहे ते कि खसम जे
हैं साहब ते अछत बने हैं औ तुम अपनो हृदय घरसून करि राख्यो है साहब
को नहीं राख्यो अर्थात् साहब को नहीं जान्यो ॥ ३ ॥
बीज बिनु अंकुर पेड़ बिनु तरुवर बिन फूलै फल फलिया।
बांझकी कोखि पुत्र अवतरिया बिन पग तरुवर चढ़िया॥४॥
इहां याकु अर्थ है बीज बिना कहूं अंकुर होय हैं ? औ पेड़बिना कहे बिना
जड़ कहूं तरुवरहोय हैं ? औ बिना फूलकहूंफल होय हैं ? अरु बांझके कोखिमें
कहूंपुत्रहोइहै ? औबिनापगकोईतरुवरमें चढ़ैहै ? सो बीज तौ वह ब्रह्मको कहौ-
हौ सोतो शून्य है, कोईपदार्थनहीं है अंकुर कैसे भयो कहे कैसेमाया सबलित
ब्रह्म भयो । औ पेड़ जड़ मायाको कहौ सो तो मिथ्या है संसार तरुवर कैसे
भयो । औज्ञानरूप जो फूल है ताहूको तो मूलाज्ञान कहौ हौ, सोऊ मिथ्या
है, कहो तो मुक्तिरूपी फल कैसे फरयो । औ मनको तौ जड़ कहौ हौ, ताको
अनुभव प्रबोधरूपी पुत्र कैसे भयो । औ आत्मा को तौ अकर्त्ता कहौ हौ मन
बुद्धि चित्तते भिन्न है सो बिना पांव संसार वृक्षको चढ़िकै कैसे चैतन्याकाशको
पहुंच्यो ॥ ४ ॥
मसि बिनु द्वाइत कलम बिनु कागद बिनु अक्षर सुधि होई ।
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिन ज्ञाता कहैं कबीर जन सोई॥५॥
बिना दुआइति मसि कैसे रहैगी अर्थात् मनको तो मिथ्या कहौ है। मनको
अनुभव कैसे रहैगो । वह मिथ्याई होयगो । औ बिना कागज कलम कहा करैगी
अर्थात् देहेन्द्रियादि अंतः करण तो मिथ्यै कहौ है ज्ञान केहिके आधारहोयगो
जहां बुद्धिरूपी कलमते लिखौगे निश्चय करौगै औ जो यहपाठ होय "बिनअ-