कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) बीजक कबीरदास ।
बिहून कहे निराकार ब्रह्म हैके नाचन लग्यो । अथवा राजै कहे शोभित भयो
सो तुम तो शरीरते भिन्नहो जैसे ढेढिया ते दीप भिन्न रहै है । वह सोहं शब्द
तो शरीरको है वाको कहे तुम काहे धोखा में परेहौ । तुम निर्गुण सगुणके
परे जो है साहब ताके हौ तिनमें लगौ । निर्गुण सगुणके परे कैसे साहबहैं
सो कहै हैं ॥ १ ॥
कर बिनु वाजै श्रवण सुनै बिन श्रवणै श्रोतासोइ ।
पाटन स्ववश सभा बिनु अवसर बूझौ मुनिजन लोइ ॥२॥
साहब के लोकके जेबाजाहैं ते बिन कर बाजैं हैं काहेते कि वहां के जे
बाजा हैं ते पांचभौतिक नहीं हैं, औ उहांके जे बासी हैं तिनके शरीर पांचभौ-
तिक नहींहैं अर्थात् मनवचन के परेहौ औ प्राकृतजे हैं प्रकृति संबंधी पदार्थ
साकार औ अप्राकृत जो हैं निराकार ब्रह्म लोक प्रकाश ताहूते विलक्षण है ।
कर बिना कह्यो याते साकारौ नहीं है औ सो बाजै है याते निराकारौ नहीं ह।
औ सोई श्रोता जे हैं लोकवासी ते श्रवणते सुनै हैं औ श्रवण नहीं हैं याते
साकारौ नहीं है औ श्रवणते सुनै है याते निराकारौ नहीं है । मायाब्रह्म जीव
को जो अरुझा लाग्योहै सो जीव साहबको स्मरण करै ताके पाटन कहे पटाइ-
लीवे को साहब स्ववशहैं अथवा नौकर जाको राखैहैं ताको पट्टा लिखि देइहैं
सो पाटा कहावै है सो इहां पाटन बहु बचन है सो जीव उनके शरण
जायहैं तिनको पाटन के लिखि दीबे में अपनायलीबे में स्ववश हैं तामें प्रमाण॥
( सकृदेवप्रपन्नायतवास्मीतिचयाचते । अभयंसर्वभूतेभ्योददाम्येतद्व्रतन्मम ) ॥
औ बिना अवसर कहे बिना काल उनकी सभा लागी रहैहै वहां कालकी
गति नहीं है औ बाजन सदाबाजैहैं अर्थात् सदा रास उहां होता रहैहै । सो हे
मनन शील मुनिलोगो! तुम उन्हीं को समझौ औ उन्हींको मनन करो वहधो-
खा ब्रह्म के मनन कीन्हेते तुम्हारो जनन मरण न छूटेगो ॥ २ ॥
इन्द्रि बिनु भोग स्वादु जिह्वा बिनु अक्षय पिण्ड बिहूना ।
जागत चोर मँदोर तहँ मूसे खसम अछत घरसूना ॥ ३ ॥