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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

शब्द । (२३१)
अथ सोलहवां शब्द ॥ १६ ॥
रामरा झीझी जंतर बाजै । कर चरण विहूना राजै ॥ १ ॥
कर बिन बाजै श्रवण सुनै बिन श्रवणै श्रोता सोई ।
पाटन स्ववश सभाबिनु अवसर वूझौ मुनि जन लोई ॥ २ ॥
इन्द्रिय बिनु भोग स्वाद जिह्वा बिनु अक्षय पिण्ड विहूना ।
जागत चोर मंदिर तहँ मूसै खसम अछत घर मूना ॥ ३ ॥
बीज बिन अंकुर पेड़ बिनु तरुवर बिनु फूले फल फलिया ।
बांझ की कोखि पुत्र अवतरिया बिन पग तरुवर चढ़िया ॥ ४ ॥
मसि बिनु द्वाइत कलम बिनु कागज बिनु अक्षर सुधि होई ।
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिन ज्ञाता कहै कबीर जन सोई ॥ ५ ॥
पूर्व मायाको वर्णनकरिआये तौनी मायाते छूटिके जौने उपाय ते साहब को
पावै है सो उपाय कहैं ॥
रामरा झीझी जंतर बाजै । कर चरण विहूना राजै ॥ १ ॥
हे जीव! राम कहे रकार तोको मरौहै अर्थात् रकार बीज को तोको अभाव
है याहीते तैं अपने को ब्रह्म मानिके संसारी है गयोहै । झीझीकहावै झिंझिया
जो कुवार शुक्लचतुर्दशीको अनेक छिद्रकै जो मटुकी होयहै ताके मध्यमें दीप
वारिके धरैहै सो झिंझियानांव ढेढियाको कवि संप्रदायहूमेंहै ॥ ( रंध्र जाल मग
द्वै कदै तिय तन दीपति पुंज । झिंझियाके सो घट भयो दिनहूमें बनकुंज ) ॥
( सारीमूलामलसी फलकांति झरोखन की झझरी झिंझियासी ) सोझिंझिया रूप-
नव दुवारको । अथवा रोम रोम में छिद्र है जामें वोई छिद्रन द्वै पसीना निक-
सैहै यहिप्रकारको झींझी जौहै शरीर तौनेजन्तरबाजै है कहे ताहीको यह सोहं
शब्दहै काहेते कि, श्वासा कहैहैं सोवहीश्वासके कहेते करचरण बिहून जों
निराकार ब्रह्महै सो तेरे आगेराजै कहे शोभितं होन लग्यो । अथवा आंखिन के
आगे नाचन लग्यो, सर्वत्र ब्रह्मही देखि परनलग्यो । अथवा तैंहीं करचरण